तीन तलाक: 5 जजों वाली संवैधानिक बेंच कर रही मुद्दे पर सुनवाई

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imaging: shagunnewsindia.com

सर्वोच्च न्यायालय में तीन तलाक के मसले पर चली सुनवाई की सार्थकता दिखने लगी है। न्यायालय का फैसला क्या होगा, यह तो बाद में पता चलेगा, पर आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के रुख में बदलाव साफ लक्षित किया जा सकता है। यह न्यायालय की सख्त टिप्पणियों का ही असर होगा। बोर्ड ने पहले तीन तलाक के मुद्दे को अदालत के न्यायाधिकार क्षेत्र से बाहर बताया था। यह भी कहा था कि इस मामले में दखल देना, संविधान-प्रदत्त धार्मिक स्वायत्तता का हनन होगा। बोर्ड की एक और प्रमुख दलील यह थी कि तीन तलाक कुरान और शरीअत से ताल्लुक रखने के कारण आस्था से जुड़ा मामला है। लेकिन अब बोर्ड के सुर बदल गए हैं। सोमवार को सर्वोच्च अदालत में दाखिल किए अपने नए हलफनामे में बोर्ड ने कहा है कि महिलाओं को तीन तलाक न मानने का अधिकार भी मिलेगा। दुल्हन निकाहनामे में संबंधित शर्त जुड़वा सकेगी। यही नहीं, काजी दूल्हा-दुल्हन को समझाएगा कि तीन तलाक न कहने की शर्त निकाहनामे में शामिल करें। बोर्ड तीन तलाक का बेजा इस्तेमाल रोकने के लिए जागरूकता मुहिम चलाएगा। इसके लिए अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया समेत सभी माध्यमों का इस्तेमाल करेगा। काजियों और मौलवियों को दिशा-निर्देश भेजे जाएंगे।
इस सब के अलावा बोर्ड ने तीन तलाक का एक संशोधित और अपेक्षया उदार स्वरूप भी पेश किया है। तीन तलाक पूरा होने से पहले समझौते के तीन प्रयास जरूरी हैं। पति-पत्नी पहले खुद आपसी विवाद को निपटाने की कोशिश करें। अगर विवाद फिर भी बना रहे तो दोनों परिवारों के मुखिया आपस में बैठ कर हल निकालने का प्रयास करें। यह भी नाकाम हो, तो बोर्ड की तरफ से मध्यस्थ नियुक्त किया जाएगा। तब भी विवाद न सुलझे, तो तलाक दे सकते हैं। अलबत्ता तलाक का अधिकार सिर्फ पति को होगा। बीवी अगर शौहर से अलग होना चाहे तो मुसलिम समुदाय में प्रचलित ‘खुला’ विकल्प का इस्तेमाल कर अलग हो सकती है। सर्वोच्च अदालत की कड़“ी टिप्पणियों के अलावा आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के रुख में आई नरमी की कुछ और भी वजहें होंगी। पहली बार इस मसले पर केंद्र सरकार का पक्ष बोर्ड से बिल्कुल अलग रहा है। अपने हलफनामे में सरकार ने तीन तलाक को मजहब के नजरिए से नहीं बल्कि स्त्री-पुरुष के समान अधिकार के नजरिए से देखने की वकालत की थी। इसके अलावा, मुसलिम समाज के भीतर से भी तीन तलाक की आलोचना के स्वर उठने लगे हैं, जिसकी एक बानगी कुछ मुसलिम महिलाओं की तरफ से दायर की र्गइं वे याचिकाएं ही हैं जिन पर सुनवाई चली।
ऐसे में अगर बोर्ड अपने पुराने ही रुख को जस का तस दोहराता रहता, तो उसके सामने अलग-थलग पड़ जाने का खतरा था। फैसला आने पर यह आरोप नहीं चल सकता था कि अदालत पूर्वग्रह से ग्रसित थी। इस मामले का संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च अदालत को पूरा अहसास था कि उसे एक बहुत नाजुक और विवादित विषय पर सुनवाई करनी है। इसलिए उसने मामला किसी सामान्य पीठ को सौंपने के बजाय पांच जजों की संवैधानिक पीठ को सौंपा, जिसमें अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि के जज शामिल किए गए।