अंकिता भंडारी मर्डर केस: सत्ता के नशे में चूर बेटे के लालच ने एक बेटी के सपने को तोड़ डाला

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पंकज चतुर्वेदी

महज 19 साल की बच्ची, जब कोविड में पिता की नॉकरी चली गई तो अपने युवा मन के सपने त्याग कर खुद काम की तलाश करने लगी ताकि परिवार का पेट पाल सके। उस बच्ची का शव जिस तरह पानी में डूबता मिला, असल में यह छोटे राज्य, क्षेत्रीय अस्मिता और उन्नति के भरम की असली विद्रूप तस्वीर है।


मेधावी छात्रा अंकिता भंडारी ने 12वीं कक्षा में 88 फीसदी अंक हासिल किए थे, बता दें कि पौड़ी के छोटे से गांव की एक लड़की ने बड़े सपने देखे, होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया, अभी 1 महीने पहले रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करना शुरू किया था कि कुछ राक्षसों ने न केवल अंकिता भंडारी और उसके सपनों को बल्कि हजारों लड़कियों के सपनों को मार डाला। कहते हैं भीड़ के पावं नहीं होते जब वह सड़क पर न्याय के लिए उतरती है तो बड़े बड़े खामोश हो जाते है। रिसोर्ट में पहले आग लगायी गयी और अब बुलडोजर चल गया।


पढ़ाई में लगनशील, मेहनती व अनुशासित छात्रा थी। इंटरमीडिएट की परीक्षा उसने 88 फीसदी अंकों से उत्तीर्ण कर देहरादून से एक वर्षीय होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया था। वह नौकरी मिलने के बाद बहुत खुश थी। ज्वाइनिंग के दिन वह अपने पिता के साथ गंगा भोगपुर के वनतारा रिजॉर्ट भी गई थी।

ग्राम पंचायत श्रीकोट में राजस्व गांव धूरों स्थित हैं। यहां के निवासी बीरेंद्र सिंह भंडारी व सोनी भंडारी की बेटी थी 19 वर्षीय अंकिता। सामाजिक कार्यकर्ता भुवन डोभाल ने बताया कि अंकिता के पिता पहले एक एनजीओ में कार्य करते थे लेकिन कोविडकाल के बाद से गांव में ही रह रहे थे और खेती व पशुपालन करते थे।

अब उजागर हो चुका है कि सत्ता के नशे में मदमस्त पिशाचों ने उससे देह व्यापार करवाना चाहा, जब उस बच्ची ने आत्म सम्मान से समझौता नहीं किया तो उसके साथ न जाने क्या क्या हुआ और फिर वह लापता हो गई।

सामने आया है कि अंकिता पर वह यहां आने वाले ग्राहकों से संबंध बनाने को कहते थे। यह बात अंकिता सबको बता रही थी। वह बार-बार रिजॉर्ट की हकीकत सामने लाने की धमकी दे रही थी। इस बात को लेकर विवाद चल रहा था। घटना वाले दिन दो अलग-अलग वाहनों पर चारों लोग चीला बैराज के पास गए। वहीं उसे पानी में फेंक दिया गया।

उत्तराखंड देश का एक अकेला राज्य है जहां राजस्व पुलिस है। लड़की के पिता ने पटवारी को सूचित किया। कहा जाता है कि बात डीएम तक गई लेकिन रिसोर्ट और उसके मालिक सत्ता के प्रबल भागीदार थे औऱ अफसरान के कई राज के साझेदार सो किसी ने ध्यान नहीं दिया। जब पहाड़ जागा और सड़क पर आया तो खोज हुई और बच्ची की लाश मिली।

अब बीजेपी ने पार्टी से निकालने की घोषणा कर दी। याबी पार्टी से तो नूपुर शर्मा नवीन जिंदल अरुण यादव सहित कई निष्कासित हैं।

यही नहीं जब जनाक्रोश बढ़ा तो पुलिस ने आरोपियों की हत्या जनता से करवाने की जुगत लगाई ।यही नहीं जिस रिसोर्ट में इस कांड के राज और सबूत थे, उस पर बुल्डोज़र चलवा दिया। दिखाया कि जनता ने भी तोड़फोड़ की।
आज ऋषिकेश एम्स में बच्ची का पोस्टमार्टम हुआ और उधर पुलिस ने तीन आरोपियों को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया है।

यह कांड उत्तराखंड के नाम पर कलंक है। पहाड़ की औरत जीवट का प्रतीक है। वहां का समाज बलात्कार जैसे अपराध में शामिल होता नहीं।

एक राज्य किन सपनों को ले कर बना? अंकिता के पिता की बेरोजगारी, उसका छोटी उम्र में नोकरी के लिए घर से निकलना, रिसोर्ट में देह व्यापार, सत्ताधारियों की निरंकुश हरकतें, साजिशों में प्रशासन का शामिल होना – सब कुछ उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिये अपना सब कुछ न्योछावर करने वालों की आत्मा पर चोट है।
बेहद दुखद है एक राज्य के सपनो का अंकिता की हर में तैरती लाश बन जाना।

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