बाबाओं के बाज़ार में चमत्कार की चाह लिए जॉम्बी बनता जा रहा आधुनिक सनातनी समाज
राहुल कुमार गुप्ता
आधुनिक सनातनी समाज की सबसे बड़ी कमी और दोष यह है कि जिसने कभी ‘तत्वमसि’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और उपनिषदों की दार्शनिक ऊँचाइयों को गढ़ा था, वह आज अंधविश्वास, भटकाव और त्वरित चमत्कारों के सस्ते बाज़ार में भटक रहा है। धर्म का वास्तविक स्वरूप आत्म-बोध, विवेक, निष्काम कर्म और आत्म-मंथन पर आधारित है, किंतु आज का कथित सनातनी ईश्वर या आत्म-ज्ञान की तलाश में नहीं, बल्कि केवल अपनी संकीर्ण मनोकामनाओं की तात्कालिक पूर्ति और भीड़ के उन्माद का हिस्सा बनने में लगा है। यह एक ऐसी दिशाहीन भीड़ बन चुकी है जो आत्म-चिंतन से भागती है और किसी न किसी चमत्कारी ‘अवतार’ या ‘शॉर्टकट’ की तलाश में दर-दर की ठोकरें खाती है।
इतिहास और सामाजिक विकासक्रम गवाह है कि इस देश में ‘बाबा संस्कृति’ का उत्थान और पतन एक तय चक्रव्यूह की तरह चलता आ रहा है, जहाँ जनता की अज्ञानता को ढाल बनाकर बाज़ार और मीडिया मिलकर एक नया भगवान गढ़ते हैं और फिर ज़रूरत खत्म होते ही या विवाद उठते ही उसे धाराशायी कर देते हैं।
इस भटकाव के इतिहास को क्रमबद्ध तरीके से देखें तो एक समय था जब हर दूसरे नुक्कड़ और चौराहे पर साईं बाबा के मंदिरों की बाढ़ आ गई थी। जो समाज कभी वैदिक मंत्रों का उच्चारण करता था, वह हर गुरुवार को साईं संध्या के नाम पर घंटों लाइन में खड़ा होने लगा। स्थानीय मजारों में भी चमत्कार का नाम सुन वहां भी अचानक भीड़ बढ़ने लगती। लोगों को लगा कि यहाँ मन्नत की चादर चढ़ाने से किस्मत रातों-रात बदल जाएगी। जब वह नशा थोड़ा उतरा, तो समाज आशाराम बापू के चरणों में जा गिरा। दिव्य आत्म-ज्ञान और साधना का दावा करने वाले आशाराम का साम्राज्य देश-विदेश में फैल गया। करोड़पति व्यापारी से लेकर आम नागरिक तक उनके चरणों की धूल माथे से लगाने लगे, लेकिन जब यौनाचार और आपराधिक कृत्यों का सत्य सामने आया, तो वही भक्त रातों-रात गायब हो गए और आशाराम जेल की सलाखों के पीछे पहुँच गए।
आशाराम के पतन के बाद खाली हुए स्थान को भरने के लिए राम रहीम जैसा रंगीन मिज़ाज और नाटकीय ‘संत’ सामने आया। सिरसा के आश्रम में लाखों की भीड़ इकट्ठा होती थी, जहाँ धर्म को सिनेमा, स्टंट और रॉक कंसर्ट का रूप दे दिया गया। लोग अपनी बेटियां और जीवन उनके हवाले कर चुके थे। किंतु हत्या और दुष्कर्म के मामलों में जब कोर्ट ने सजा सुनाई, तो उस ‘रॉकस्टार बाबा’ का पूरा साम्राज्य भरभराकर ढह गया और उसकी जय-जयकार करने वाली भीड़ दूसरे दरवाजे खटखटाने निकल पड़ी।
इसी क्रम में निर्मल बाबा का दौर आया, जहाँ ‘समोसे के साथ हरी चटनी खाने’ और ‘पर्स में गुलाबी नोट रखने’ से कृपा आने के नाम पर करोड़ों का कारोबार किया गया। तर्क और विज्ञान को ताक पर रखकर लाखों पढ़े-लिखे लोग टीवी के सामने बैठकर अपनी किस्मत बदलने की उम्मीद करने लगे।
हाल के वर्षों में डिजिटल मीडिया और जनसंपर्क के नए हथियारों के साथ बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का उभार हुआ। पर्ची निकालकर भूत, भविष्य और मनोकामना बताने के इस तमाशे ने पूरे देश में एक नया उन्माद पैदा किया। ‘ओ भाईसाब, असली ताकत तो यहाँ है’ का ढोल पीटती हुई वही भीड़ अब धामों में रैलियां करने लगी। जहाँ विवेक और शास्त्र-ज्ञान होना चाहिए था, वहाँ ‘पर्ची तंत्र’ को धर्म का सर्वोच्च शिखर मान लिया गया।
इसी पी.आर. और सेलिब्रिटी कल्चर के दौर में प्रेमानंद जी महाराज का नाम भी चरम पर पहुँचाया गया। विराट कोहली और अनुष्का शर्मा जैसी हस्तियों के पहुँचते ही कैमरों के लेंस घूम गए और रातों-रात उन्हें सोशल मीडिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक सितारा बना दिया गया। रात के दो बजे लोग वृंदावन की गलियों में ‘दर्शन’ और ‘चरण-रज’ के लिए किलोमीटर लंबी लाइनों में खड़े होने लगे। लेकिन जैसे ही आश्रम में किसी शिष्य की संदिग्ध मृत्यु का प्रकरण सामने आता है या मीडिया की निष्ठा बदलती है, वही जनता और व्यवस्था ‘यूज एंड थ्रो’ की तर्ज पर किनारे हटने लगती है। अब वही भीड़ वृंदावन से रुख मोड़कर नीम करोली बाबा के कैंची धाम में मंडराने लगी है। न तो इन्हें नीम करोली बाबा के एकांत और त्याग से मतलब है, ना प्रेमानंद जी के नाम-जप की साधना से; इन्हें बस उस स्थान पर हाजिरी लगानी है जो इस समय ट्रेंडिंग है।
वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह आचरण गंभीर ‘भीड़-उन्माद’ और सहमति का क्लासिक उदाहरण है। मानव मस्तिष्क जब अपने जीवन के तनावों, आर्थिक असुरक्षाओं और असफलताओं से भागना चाहता है, तो वह आत्म-सुधार के कठिन मार्ग के बजाय चमत्कारी अवलंब की ओर भागता है। डिजिटल युग में सोशल मीडिया एल्गोरिदम और पीआर एजेंसियां इस मानसिक दुर्बलता का जमकर फायदा उठाती हैं। आज सनातनी समाज में उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता और दर्शन का स्वाध्याय बंद हो चुका है, अब यहां केवल उथली अंधभक्ति और अंधविश्वास ही पनप रहा है।
संत कबीर ने इस ढोंग पर तीखा प्रहार करते हुए कहा था कि
“पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार।।”
आज का सनातनी कबीर, तुलसी और स्वामी विवेकानंद की अंतर्मुखी और तार्किक साधना को भूलकर केवल बाहरी आडंबर और प्रदर्शनप्रियता का गुलाम बन चुका है।
इसके विपरीत, यदि निष्पक्षता और तटस्थता के साथ देखें तो इस्लाम धर्म को मानने वाले अपने बुनियादी अकीदे, इबादत के तय नियमों और धार्मिक अनुशासन के प्रति अत्यंत दृढ़ और एकनिष्ठ दिखाई देते हैं। वे रुझानों, चमत्कारों, टीवी शो या सामाजिक हवाओं के बदलने पर अपने मूल धार्मिक सिद्धांतों और इबादत के तरीकों को नहीं बदलते। नमाज़ का समय हो या रोज़े का अनुशासन, वे अपनी मान्यताओं पर अडिग रहते हैं। उनका यह अनुशासन और अपने मूल सिद्धांतों पर टिके रहना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि धर्म का वास्तविक अर्थ सिद्धांतों और नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना है, न कि हर रोज़ नए बाबाओं, पर्चियों और चमत्कारी स्थानों के पीछे पागलों की तरह भागना।
इस भटकाव और आत्मिक पतन का एकमात्र समाधान यही है कि कथित सनातनी इस ‘जॉम्बी’ मानसिकता और अंधभक्ति से बाहर निकलें। धर्म को धर्म की तरह जीना होगा, इसे चमत्कार का मंच और मन्नत माँगने की दुकान बनाने के बजाय शास्त्र-ज्ञान, स्वाध्याय और चरित्र-निर्माण का माध्यम बनाना होगा। जब तक व्यक्ति विवेक की कसौटी पर अपनी आस्था को नहीं कसेगा और स्वाध्याय नहीं करेगा, तब तक वह बाज़ारवाद और ढोंगियों का शिकार बनता रहेगा। सनातन की वास्तविक पुनर्प्रतिष्ठा किसी बाबा के दरबार की भीड़ में नहीं, बल्कि उपनिषदों के ज्ञान और गीता के निष्काम कर्मयोग के मार्ग पर लौटने में है। ईश्वर पर अडिग विश्वास, प्रेम, कर्म, निर्मल मन और सहजता इन गुणों को आत्मसात कर लेने मात्र से ही हर जीवन में सकारात्मकता का प्रकाश उसे सही राह दिखाता रहेगा और जीवों का ईश्वर से मिलन का एकमात्र लक्ष्य साकार होता नजर आयेगा।







