मौत का इंतजार

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अविश्वसनीय सत्य कथा
मैं अपने आफिस में था कि टेलीफोन की घंटी बजी। दिन के सवा बारह बजे थे। मेरी बड़ी बहन के बेटे ने बताया कि उसकी मम्मी जी को डाक्टरों ने जवाब दे दिया है और उन्होंने कहा है कि इनका शरीर अधिक से अधिक दस घंटे ही रहेगा। सभी रिपोर्ट खराब हैं। सभी संबंधियों को सूचित कर दिया है। मम्मी से आपके बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि आप लखनऊ से दो बार मत आना । आप शोक सभा के समय ही आ जाना। बड़ा झटका लगा। सबसे बड़ी बहन थी।  सबको प्यार भी बहुत करती थीं। मैं अपने आपको रोक न पाया और जल्दी से दोपहर तीन चालीस पर चलने वाली हावड़ा अमृतसर मेल पकड़ ली। सुबह छः बजे लुधियाना पहुंचा। टैक्सी कर बहन के घर की ओर रवाना हो गया।
कुछ साल पहले मैं वाराणसी गया था। सांय काल तक काम निपटा कर दशाश्वमेध घाट पर चला जाता और लहरों के संगीत को सुनता। एक दिन अचानक एक सिद्ध पुरुष ने मुझे पास बुलाया और कहा कि मैं तुझे एक मंत्र देना चाह रहा हूं क्योंकि मैं समझता हूं कि तुम उसे जन कल्याण के लिए प्रयोग करोगे। उन्होंने कहा कि यह मंत्र किताबों में नहीं मिलता।  यह गुरु परम्परा से आगे आगे किसी सुपात्र को ही दिया जा रहा है। सिद्ध करने की पूरी विधि बताई और प्रयोग करने का तरीका और कई प्रतिबंध भी लगाये। उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति यदि बहुत बीमार र्है तो इस मंत्र के जाप से वह ठीक होना शुरू हो जायेगा और यदि उसका समय नहीं आया तो स्वस्थ हो जायेगा। मैंने विधिवत उसे सिद्ध कर लिया था।
घर की घंटी बजाई। नौकर ने दरवाजा खोला और मैं अन्दर गया। अंदर जाते ही जोर का एक झटका लगा। बहन बिस्तर पर लेटी थी और तीन ओर सभी भाई बहनें भाभियां बहनोई सोफों पर बैठे थे। बस मौत का इंतजार कर रहे थे। मेरे पहुंचते ही बहन को बताया कि लखनऊ वाले मामा जी भी आ गये हैं तो उन्होंने अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाया मुझे गले लगाने के लिए और कहा अब मैं शान्ति से मर सकूंगी। बहुत ही दर्दनाक दृश्य था। पता नहीं उन संतों की कृपा थी या विधि का विधान जुबान पर सरस्वती बैठी थी कि अचानक मुंह से निकला मैं मरने दूंगा तब न। इन शब्दों को बोलते ही मैं चौंक यह क्या निकला। पर अहसास हुआ यह मैं नहीं बोला था।
खैर मैंने एक कुर्सी खैंची और उनके चरणों की ओर बैठा। अंगूठे को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया तो एक डाक्टर बहन बोली अंगूठे में जान नहीं है। बात ठीक कही थी क्योंकि उन्हें शरीर के निचले आधे हिस्से में फालिज हुआ था। मैंने अंगूठा पकड़ा और उनके द्वारा बताए मंत्र को पढ़ना शुरू कर दिया। दस मिनट मैं खो गया कहीं। इतने में आवाज आई चाय पी लीजिए। चाय पीने साथ के कमरे में गया तो अभी कप उठाया ही था कि बड़ी जोर की चींख सुनाई दी। वापस आया। बहन कह रही थी भाई तुमने मुझे ठीक कर दिया। डाक्टर बहन बोली इनकी टांगों का फालिज खत्म हो गया है। इन्होंने टांगें इकट्ठी कर लीं अभी अभी। उसके बाद वह ठीक होकर कई साल जीवित रह कर परलोकवासी हुईं। यह सब प्रभु का ही आशीर्वाद था और कुछ नहीं। – लखनऊ कनेक्शन वर्ल्ड वाइड फेसबुक से साभार 

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