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    उस घटना के बाद राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा को खत्म करने का प्रण लिया

    ShagunBy ShagunNovember 10, 2021 Featured No Comments4 Mins Read
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    सती प्रथा जैसी कुरीति को समाप्त करने में राजा राम मोहन राय की अहम भूमिका थी। अपने जीवन में एक घटना के बाद उन्होंने इस प्रथा को खत्म कराने की ठान ली और उनका प्रयास सफल रहा इस प्रथा के बारे में कुछ अनसुनी बातेंतत्कालीन ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा 4 दिसंबर, 1829 को बंगाल सती रेग्युलेशन पास किया गया था। इस कानून के माध्यम से पूरे ब्रिटिश भारत में सती प्रथा पर रोक लगा दी गई। रेग्युलेशन में सती प्रथा को इंसानी प्रकृति की भावनाओं के विरुद्ध बताया। राजा राम मोहन राय और वह घटना- राजा राम मोहन राय किसी काम से विदेश गए थे और इसी बीच उनके भाई की मौत हो गई। उनके भाई की मौत के बाद सती प्रथा के नाम पर उनकी भाभी को जिंदा जला दिया गया। इस घटना से वह काफी

    आहत हुए और ठान लिया कि जैसा उनकी भाभी के साथ हुआ. वैसा अब किसी और महिला के साथ नहीं होने देंगे। क्या थी सती प्रथा?- यह एक ऐसी प्रथा थी जिसमें पति की मौत होने पर पति की चिता के साथ ही उसकी विधवा को भी जला दिया जाता था। कई बार तो इसके लिए विधवा की रजामंदी होती थी तो कभी-कभी उनको ऐसा करने के लिए जबरन मजबूर किया जाता था। पति की चिता के साथ जलने वाली महिला को सती कहा जाता था जिसका मतलब होता है पवित्र महिला। मुगलों के शासनकाल में सबसे पहले हुमायूं ने इस प्रथा पर रोक के लिए कोशिश की। उसके बाद अकबर ने सती प्रथा पर रोक लगाने का आदेश दिया। चूंकि महिलाएं स्वेच्छा से भी ऐसा करती थीं, इसलिए उन्होंने यह भी आदेश दिया कि कोई भी महिला अपने मुख्य पुलिस अधिकारी से विशिष्ट अनुमति लिए बगैर ऐसा नहीं करती हैं।

    यूरोपीय औपनिवेशिक शासन में रोक- 18वीं सदी के अंत तक इस प्रथा को ऐसे कुछ इलाकों में बंद कर दिया गया जहां यूरोपीय औपनिवेशिक शासन था। पुर्तगालियों ने 1515 तक गोवा में इस प्रथा पर रोक लगा दी थी। डच और फ्रेंच ने इसे हुगली चुनचुरा और पुड्डुचेरी में बंद किया। 21वीं सदी में भी कुछ मामले21वीं सदी में भारत के कुछ ग्रामीण इलाकों में सती के मामले सामने

    आए। आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, 1943 से 1987 तक भारत में सती के 30 मामले सामने आए। राजा कि उपाधि कैसे मिली- कम ही लोग जानते हैं कि राममोहन राजा शब्द के प्रचलित अर्थों में राजा नहीं थे। उनके नाम के साथ यह शब्द तब जुड़ा जब दिल्ली के तत्कालीन मुगल शासक बादशाह अकबर द्वितीय 1806-1837 ने उन्हें राजा की उपाधि दी। अकबर द्वितीय ने ही 1830 में उन्हें अपना दूत बनाकर इंग्लैंड भेजा। इसके पीछे उनका उद्देश्य इंग्लैंड को भारत में जनकल्याण के कार्यों के लिए राजी करना और जताना था कि बैंटिक के सती होने पर रोक संबंधी फैसले को सकारात्मक रूप में ग्रहण किया गया है। 1833 में 27 सिंतबर को इंग्लैंड के ब्रिस्टल में ही मेनेजाइटिस से पीड़ित होने के बाद राममोहन की मुत्यु हो गई। उनका वहीं अंतिम संस्कार कर दिया गया।

    उनकी बाबत कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा है, राममोहन राय के युग में भारत में कालरात्रि-सी उतरी हुई थी। लोग भय व आतंक के साये में जी रहे थे। मनुष्य और मनुष्य के बीच भेदभाव बनाये रखने के लिए उन्हें अलग-अलग खानों में बांट दिया गया था। उस कालरात्रि में राममोहन ने अभय-मंत्र का उच्चारण किया और प्रतिबंधों को तोड़ फेंकने की कोशिश की। 22 मई. 1772 को हुगली के राधानगर गांव के एक बंगाली हिंदू परिवार में जन्में राममोहन के पिता रमाकांत राय वैष्णव थे तो उनकी माता तारिणी देवी शैव।

    आगे के जीवन में राममोहन क्या बनें, इसे लेकर उन दोनों में गहरे मतभेद थे। कहते हैं कि उपनिषदों के वेदांतदर्शन की शिक्षाओं व सिद्धांतों के गहरे तक प्रभावित राममोहन के मन में एक समय साधु बनने की इच्छा प्रबल हुई तो वह मां के प्रेम के कारण ही उसे पूरी करने की दिशा में प्रवृत्त नहीं हो पाए। यह बात और है कि उपनिषद व वेदांत के विशद अध्ययन का उनपर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे ही पूरे जीवन उनके चिंतन की दिशा तय करते रहे।

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