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    आशा पारेख: तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है… 

    ShagunBy ShagunSeptember 30, 2022Updated:October 2, 2022 बॉलीवुड No Comments5 Mins Read
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    वीर विनोद छाबड़ा

    आशा पारेख को मिला दादा साहेब फाल्के पुरूस्कार, अजय देवगन और सूर्या बेस्ट एक्टर, 68वें राष्ट्रीय फिल्म वितरण समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया सम्मनित


    फिल्म वालों के जीवन में बड़े उतार-चढ़ाव आते हैं। अब आशा पारेख को ही देख लें। विजय भट्ट ने ‘गूंज उठी शहनाई’ के लिए उन्हें रिजेक्ट कर दिया – प्रेम विषयों के लिए यह तो अभी बच्ची है. सही बात भी थी। तब आशा महज़ 16 साल की थीं। कुछ दिन बाद आशा नासिर हुसैन निदेशित की ‘दिल देके देखो’ के सेट पर थी। अभी शॉट रेडी होने में टाइम था। वो लड़की हेरोल्ड रॉबिंस का नावेल ‘दि कारपेट बैगर्स’ पढ़ रही थी। उधर से गुज़रते एक नौजवान ने कमेंट किया – तुम्हारी उम्र इसे पढ़ने की नहीं है. बहुत छोटी हो… आशा उस नौजवान को पहली बार देख रही थी। चिड़ कर बोली – जी चाचा जी… यह नौजवान शम्मी कपूर थे।
    उन्होंने भी आशा को पहली बार देखा था। फिर ज़िंदगी भर उनका रिश्ता चाचा-भतीजी का बना रहा। इस मुलाकात से पहले शम्मी कपूर की पसंद आशा की जगह वहीदा रहमान थी। लेकिन निर्माता शशधर मुखर्जी की पहली पसंद आशा नहीं साधना थी। संयोग से साधना को तब तक शशधर की ही ‘लव इन शिमला’ मिल चुकी थी। अब यह संयोग है कि आशा के पहले निर्देशक नासिर हुसैन थे, और साधना के आर.के. नैय्यर. ये नियति का खेल ही है कि कालांतर में साधना और नैय्यर और आशा और नासिर ज़िंदगी भर साथ रहे, लेकिन हर किसी को मुक्कमल जहां नहीं मिलता. आशा होम ब्रेकर नहीं कहलाना चाहती थीं। उन्होंने नासिर से शादी नहीं की। सारी ज़िंदगी उनके इंतज़ार में बैठी रहीं।
    आशा की उस दौर के तीन प्रसिद्ध स्टार के साथ काम करने की हसरत थी। मगर सिर्फ देवानंद का साथ ही नसीब हो पाया। ‘जब प्यार किसी से होता है’ और फिर बरसों बाद ‘महल’ में. राजकपूर के साथ ‘चोर मंडली’ की शूटिंग शुरू हुई। लेकिन कुछ दिन बाद डिब्बे में बंद हो गयी। दिलीप कुमार के साथ ‘ज़बरदस्त’ शुरू हुई. लेकिन नामालूम वजहों से फिल्म बीच में ही रुक गयी।
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    शक्ति सामंत की ‘कटी पतंग’ आशा की सबसे पसंदीदा फिल्मों में से है। उन्हें श्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरुस्कार भी मिला। शक्ति दा के साथ ‘आराधना’ और ‘अमर प्रेम’ कर चुकी शर्मीला टैगोर का उन दिनों दावा था कि ‘कटी पतंग’ उनकी छोड़ी हुई फ़िल्में हैं। इसके उलट आशा का दावा था, कि उन्होंने कतिपय कारणों से शक्ति दा की कश्मीर की कली, ऐन इवनिंग इन पेरिस और आराधना ठुकरा दी थीं जिन्हें बाद में शर्मीला ने लपक लिया। आशा का यह भी दावा है कि ‘शराफत’ और ‘सीता और गीता’ सर्वप्रथम उन्हें ऑफर हुई थी लेकिन पेमेंट के कारण बात बनी नहीं। इसे हेमा मालिनी ने हड़प लिया और वो रातों-रात स्टार बन गयीं।
    ‘बहारों के सपने’ जब आशा को ऑफर हुई तो नवागंतुक हीरो राजेश खन्ना का सामने देख कर वो असहज हुई। वो स्थापित नामी कलाकार थी, उन दिनों की सबसे महंगी नायिका। लेकिन निर्माता-निर्देशक नासिर हुसैन के कहने पर वो मान गयीं। बाद में आशा ने राजेश के साथ ‘कटी पतंग’ और ‘आन मिलो सजना’ की। किस्मत की मार देखिये कि कुछ साल बाद ‘धर्म और कानून’ में राजेश खन्ना हीरो थे और सामने आशा पारेख की माँ के रूप में चरित्र अभिनेत्री समकक्ष छोटी सी भूमिका।
    आशा पारेख की फिर वही दिल लाया हूं, ज़िद्दी, बहारों के सपने, प्यार का मौसम, आये दिन बहार के, आया सावन झूम के, तीसरी मंज़िल, कारवां, शिकार, पत्थर और पायल, समाधि, उपकार, साजन आदि अन्य यादगार फ़िल्में हैं। आशा पारेख को राजखोसला ने यकीन दिलाया कि उसकी ग्लैमर की दुनिया से अलग पहचान है, एक बहुत ही उम्दा और संजीदा बड़ी आर्टिस्ट की। और आशा ने भी उनके इस यकीन को दो बदन, चिराग़, मेरा गांव मेरा देश और मैं तुलसी तेरे आंगन में कायम रखा। मगर उन्हें सर्वश्रेष्ठ नायिका का अवार्ड नहीं दिला सके। आशा की ज़िंदगी में ‘साहिब बीवी और गुलाम’, ‘मदर इंडिया’ और ‘साहिब बीवी और गुलाम’ जैसी कालजयी फ़िल्में भी नहीं आयीं। फिल्म उद्योग की जुबली गर्ल आशा पारेख का निक नेम टॉमबॉय था। उनकी स्वयं की पसंदीदा फ़िल्में हैं – दो बदन, चिराग़, कटी पतंग और पगला कहीं का।
    आशा ने टीवी के पर्दे पर भी कमाल दिखाया था। कोरा काग़ज़ की 52 कड़ियां निर्देशित की थीं। लेकिन परदे के बाहर आशा को बड़ी भूमिकाएं मिलीं। 1994 से 1998 तक सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन की प्रेसीडेंट और फिर 1998 से 2001 तक सेंसर बोर्ड की पहली महिला चीफ़ रहीं। बताया जाता है कि इसके लिए उन्होंने कोई सैलरी नहीं ल। इस दौरान कुछ विवाद भी हुए। उन पर आरोप लगा कि जिन फिल्मों को सर्टिफिकेट नहीं देना चाहिए था उन्हें दे दिया मगर शेखर कपूर की ‘एलिज़ाबेथ’ को नहीं दिया।
    आशा का पसंदीदा फिल्मांकित गाने हैं – जाईये आप कहां जाएंगे, यह नज़र लौटके फिर आएगी…(मेरे सनम) और तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है… (चिराग़), जबकि मेरी नज़र में सर्वश्रेष्ठ है ‘दो बदन’ का – मत जइयो नौकरिया छोड़ कर.…
    आशा पारेख को भारत सरकार ने 1992 में पदमश्री से नवाज़ा तो फिल्मफेयर ने 2002 में लाइफ टाइम दिया। हाल ही में उन्हें भारत सरकार ने 2020 के दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाज़ा गया है। ये फ़िल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़ा अवार्ड है। इस पर भी बहस हो रही है, वहीदा उनसे बेहतर एक्ट्रेस है। बहसें चलती रहेंगी। जो अवार्ड ले गया सो ले गया। आशा जी कुल 94 फ़िल्में की।
    आज की तारीख में लगभग 80 बरस की हो चुकी आशा पारेख इन दिनों अपनी डांस एकेडेमी में व्यस्त हैं। उनकी ऑटोबायोग्राफी ‘हिट गर्ल’ भी उनकी फिल्मों की तरह हिट रही है। बहुत दिलचस्प किताब है।

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