दूसरों के पंख बाँधे, उड़ रहा आकाश में: भावुक

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ग़ज़ल – छः

दूसरों के पंख बाँधे , उड़ रहा आकाश में 

वो परिन्दा दम्भ पाले , है बड़े उल्लास में |
दूसरों के पंख बाँधे उड़ रहा आकाश में |

ख़ून के आँसू रुलायी जा रही है भावना ,
हादसे ही जन्म लेते आजकल विश्वास में |

राजसी सुख त्यागने का तो तभी औचित्य है ,
जी सके जब राम जैसी ज़िन्दगी वनवास में |

देखिये कब दिन फिरें दीपावली के दोस्तों !
तिमिर ने कब्ज़ा जमाया ज्योति के आवास में ,

मोल हँसने का , मुझे रो – रो अदा करना पड़ा ,
आँसुओं की जीवनी है , दर्द के इतिहास में |

सिर्फ़ अपनी त्रासदी की क्या करें चर्चा यहाँ ,
जब सदी पूरी कि पूरी जी रही संत्रास में |

है तक़ाज़ा वक़्त का , कोई ग़ज़ल ऐसी कहो !
प्राण फिर से भर सके जो टूटते विश्वास में |

भावुक, सन्नाटे में सरगम से

ज़िन्दगी क्या है 

सोलह 

ज़िन्दगी असफल प्रणय की पीर जैसे |
ज़िन्दगी रूठी हुई तक़दीर जैसे |
अश्रु यादों के चढ़े हों नित्य जिस पर ,
ज़िन्दगी वो मोहिनी तस्वीर जैसे |

भावुक, आस्था की फ़सल से