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    अब नोटबंदी के भ्रम-निवारण की कवायद!

    By November 8, 2017 Hot issue No Comments4 Mins Read
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    जी. के.चक्रवर्ती
    देश में हुए नोटबंदी को लेकर एवं उससे उत्पन्न हुए आर्थिक स्थिति के संकट को लेकर देश में फैले भ्रामक तथ्यों को स्पष्ट करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि मौजूद समय में देश की अर्थव्यवस्था को लेकर विपक्ष द्वारा एक निराशाजनक माहौल बनाने की कोशिश की गई है। उसमे विपक्षियों के साथ-साथ ही साथ मौजूदा सत्ताधारी भाजपा के कुछ असंतुष्ट नेताओं ने भी ऐसे लोगों के साथ मिलकर नोट बंदी के खिलाफ वातावरण बनाने में अपनी पूरी शक्ति लगा रखी है। वर्तमान समय में इस वित्तीय वर्ष की प्रथम तिमाही में जीडीपी विकास दर नीचे गिरकर 5.7 प्रतिशत पर पहुंचने से भी ऐसे प्रचारों को और बल मिला गया है। जहां वस्तु एवं सेवाओं पर लगने वाले कर (जीएसटी) को लागू करने में पेश आ रही शुरुआती दिक्कतों को भी इसके साथ जोड़ने की कोशिश कि गई है कि जिससे लोगों में ऐसी धारणाओं को मजबूती प्रदान करने की असफल प्रयास भी किये जा रहे हैं।
    ऐसी अवस्था में तो यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है कि इस प्रकार के दुष्प्रचार राजनीतिक उद्देश्यों के पूर्ति के लिए ही किये जाते हैं। इस प्रकार के व्यवहार करने से पहले विपक्षी नेता लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि इस प्रकार की उनके द्वारा बनाई गई निरर्थक धारणाओं से न तो उनको इससे कोई स्थायी फायदा मिलने वाला है इसके उलट देश में आर्थिक निवेशकों के साथ ही साथ देशवासीयों को क्षति पहुंचने वाली ही बात होगी। देश में आर्थिक निवेश करने वाला विश्व बाजार का भी विश्वास उठाने लगेगा है, जबकि विश्व बाजार में अपनी शाख़ एवं विश्वसनीयता को बनाने में एक लंबा समय लग जाता है।
    यह बहुत ही अफसोसजनक बात है कि राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित हो कर इस तरह के बातों को तुल देते हुए नेतानगरी के लोग इस बात पर से एकदम अपना ध्यान हटा लेते हैं। इन्ही कारणों से सरकार का यह परम कर्तव्य बनता है कि वह जान-बूझकर फैलाई जा रही इस तरह की दुष्प्रचारों का प्रभावी ढंग से खंडन कर इसका मुहतोड़ जबाब दे। शायद अभी हालही में वित्त मंत्री अरुण जेटली इसी मकसद के चलते सरकारी वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मीडिया से रूबरू होते हुए अफसरों ने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुतियों से भारतीय अर्थव्यवस्था की मूलभूत कारणों एवं ऐसे शक्तियों की तरफ देश का ध्यान खींचने का प्रयास करते हुए, यह बताया कि मुद्रास्फीति लगातार नियंत्रण में है, और राजकोषीय सेहत भी दिनो दिन बेहतरी की ओर अग्रसर होते हुए वर्त्तमान समय में देश की विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है। देश में निजी निवेशको की संख्या में इजाफा न होना और बैंकों के डूबते कर्ज का मसला अर्थव्यवस्था से जुड़ी दो प्रमुख चिंताएं  हैं।
    अधिकारियों ने तथ्यों को प्रस्तुत कर के बताया कि इन दोनों मोर्चों पर सरकार क्या कदम उठाने जा रही है। फिर बुनियादी ढांचे का विकास एवं पुनर्निर्माण में सरकार की मुख्य प्राथमिकता हैं। उससे जुड़ी हुई परियोजनाओं पर भारी धन खर्च हो रहा है। इसके जरिए आर्थिक गतिविधियों को एक खाश स्तर पर बनाए रखने का प्रयास किया गया है।  चूंकि अब धिरे धिरे देश में निजी निवेश की रफ्तार भी बढ़ने की स्थितियां बनती नजर आ रही हैं, तो हमारे यह मानने का ठोस आधार मौजूद है कि देश की आर्थिक विकास दर अब और नहीं गिरेग पायेगी वल्कि इसके स्थान पर अब इसके केवल आगे बढ़ने की ही संभावना बनती है। दरअसल, नोटबंदी और जीएसटी जैसे वैयवाहरिक माध्यमों से देश की अर्थव्यवस्था को और अधिक पारदर्शी एवं स्वच्छ बनाने में ही मदद मिलेगी। और यह लाजिमी ही है कि इसका लाभ जल्द से जल्द ही मिलेगा।
    यदि हम इसकी इन्ही हकीकतों पर नजर डालें तो हमें मायूसी की कहीं कोई वजह नहीं दिखती है, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण ही बात है कि जनमत तथ्यों से नहीं, बल्कि विभिन्न् कारणों से बनी या बनाई गई धारणाओं से निर्मित होती है। फिलहाल, हमें यह लगता है कि देश में एक मायूसी जैसे माहौल बनाने की कोशिश हो रही थी। इसके मद्देनजर वित्त मंत्री और उनके सहयोगियों ने तार्किक रूप से इन सभी भ्रमों को दूर करने का पुरजोर प्रयास किया। यह कहना अभी से निर्थक होगा कि यह कितना सार्थक और फलिभूत होगा, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि इस संदेश को आमजनों के मध्य कितने प्रभावी ढंग से पहुंचाने में हम कितना कामियाब होते है। फिलहाल, हम यह अवश्य कह सकते है कि जागरूक जनमत को आश्वस्त करने में केंद्र सरकार सफल रही है।

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