अब तो चोटीकटवा का शोर बढ़ता ही जा रहा

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चोटीकटवा का शोर बढ़ता ही जा रहा है। टीवी चैनलों के साथ कुछ अखबारों ने पूरा पेज इसी को समर्पित कर दिया है। करीब डेढ़ दशक पहले इसी तरह मुंहनोचवा और मंकीमैन भी आया और मीडिया में खूब प्रकाशित और प्रसारित हुआ था। लेकिन कभी मामले का खुलासा नहीं हो सका था।

संयोग देखिये, तब भी यूपी और केंद्र में एनडीए की ही सरकार थी। एक दशक बाद केंद्र में और डेढ़ दशक बाद यूपी में जिस तरह एनडीए की सरकार लौटी है, उसी तरह डेढ़ दशक बाद मुँहनोचवा भी चोटीकटवा बनकर लौटा है। वैज्ञानिक कहते हैं, भूत-वूत केवल भ्रम होता है। कुछ लोग इस भ्रम को फैलाते हैं। एक शहर में केवल एक परिवार ही हल्ला मचाये, इतना काफी है। बाकि अपने आप हल्ला मचाते हैं।

वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि जब इस तरह खौफ़ आपके जेहन में तारी होता है तो बाकि सब उसी जेहन से फना हो जाता है। किसी को चीन/पाकिस्तान, आतंकवाद, सिलेंडर/दाल/सब्जी की महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी, घटते रोजगार आदि इत्यादि नजर नहीं आते। बोले तो ये सब जेहन से फना हो जाते हैं। और कुछ महीने बाद जब मुँहनोचवा या चोटीकटवा का आतंक खत्म होता है…सबकुछ अच्छा-अच्छा लगने लगता है…फील गुड टाइप। उस समय घर ही नहीं मुहल्ला और सिटी शाइनिंग, इंडिया शाइनिंग जैसा भी फील होता है। अभी फील होगा…डेढ़ दशक पहले भी हुआ था।

योगेश यादव

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