गंदगी के समंदर में गर्क होती जिंदगी

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पंकज चतुर्वेर्वेदी

सीवर सफाई में लगे श्रमिकों के बीच किए गए सर्वे से मालूम चलता है कि उनमें से 49 फीसदी लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं। 11 प्रतिशत को डरमैटाइसिस, एक्जिमा और ऐसे ही चर्म रोग हैं।

अभी बीते शनिवार को दिल्ली के घिटोरनी में एक फार्म हाउस के सीवर की सफाई के दौरान चार लोग काल के गाल में समा गए। इसी साल अप्रैल महीने में दिल्ली एनसीआर के फरीदाबाद और गाजियाबाद में सीवर की जानलेवा गैस से दम घुटने के चलते छह लोग मरे हैं। एक अप्रैल को उदयपुर में एक ही स्थान पर पांच लोग मारे गए। ऐसी मौतें हर साल हजार से ज्यादा होती हैं। हर मौत का कारण सीवर की जहरीली गैस बताया जाता है।

हर बार कहा जाता है कि यह लापरवाही का मामला है। पुलिस ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। यही नहीं अब नागरिक भी अपने घर के सैप्टिक टैंक की सफाई के लिए अनियोजित क्षेत्र से मजदूरों को बुला लेते हैं और यदि उनके साथ कोई दुर्घटना होती है तो न तो उनके आश्रितों को कोई मुआवजा मिलता है और न ही कोताही करने वालों को कोई समझाईश। शायद यह पुलिस को भी नहीं मालूम है कि सीवर सफाई का ठेका देना हाईकोर्ट के आदेश के विपरीत है। समाज के जिम्मेदार लोगों ने कभी महसूस ही नहीं किया कि नरक-कुंड की सफाई के लिए बगैर तकनीकी ज्ञान व उपकरणों के निरीह मजदूरों को सीवर में उतारना अमानवीय है।

विडंबना है कि सरकार व सफाई कर्मचारी आयोग सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने के नारों से आगे इस तरह से हो रही मौतों पर ध्यान ही नहीं देते। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मुंबई हाईकोर्ट ने सात साल पहले सीवर की सफाई के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनकी परवाह और जानकारी किसी को नहीं है। सरकार ने भी सन 2008 में एक अध्यादेश लाकर गहरे में सफाई का काम करने वाले मजदूरों को सुरक्षा उपकरण प्रदान करने की अनिवार्यता की बात कही थी। नरक कुंड की सफाई का जोखिम उठाने वाले लेागों की सुरक्षा-व्यवस्था के कई कानून हैं और मानव अधिकार आयोग के निर्देश भी। (पंकजबुक्स ब्लॉग से साभार)

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