नेपथ्य से: जब ग्रामीणों ने बचाया था इस अदभुत जीव को !

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1982
बहुत दिनों बाद दिखा दुर्लभ जीव सल्लू सांप
 बात सन 30 अक्टूबर, 2010 की है जब अपने अस्तिस्व के संकट से जूझ रहा ’’सल्लू सांप’’ (Pangolin) जनपद लखीमपुर-खीरी निघासन तहसील के ढखेरवा नानकार गांव में 27 अक्तूबर 2010 की रात दिखाई दिया। करीब ढाई फिट लंबा और पौन फिट ऊंचा खतरनाक सा दिखने वाला यह जीव इस गांव के दौलतराम के घर के आंगन में रात करीब दस बजे दौड़ लगा रहा था। पड़ोस के घर से करवाचौथ की पूजा करके लौटी दौलतराम की बीवी रूपरानी ने अपने आंगन में इधर से उधर दौड़ लगा रहे पूरे शरीर पर पत्थर सरीखे शल्क (Scales) जिनको ग्रामीण अपनी गंवई भाषा में ’खपटे’ कहते हैं, लपेटे इस विचित्र जीव को देखा तो इस महिला की चीख निकल गई। बीवी की चीख सुनकर दौलतराम बाहर निकल आया।
देखते-देखते वहां आसपास के लोगों की भीड़ लग गई। लोग लाठी-डंडे निकाल लाए। वे इस बेजुबान सीधे-सादे जीव को मारने जा रहे थे। भला हो गांव के उन बुजुर्गां का जिन्होंने इसकी पहचान सल्लू सांप के रूप में की और इसको बेहद सीधा जीव बताते हुए इसकी जान बचाई। तब जाकर ग्रामीणों ने इस जीव को एक नांद के नीचे ढक दिया। धन्यवाद तो हम वन्यजीव प्रेमियों को ग्राम प्रधान मनोज पाण्डेय का भी होना चाहिए जिन्होंने इसकी खबर तत्काल पुलिस और वन विभाग को दी। वन क्षेत्राधिकारी धौरहरा एन एन पाण्डेय ने अलसुबह वन दरोगा रफीक खां और वन रक्षक अरूण कुमार को गांव भेजा। एस आई तुलसीराम भी मौके पर पहुंचे।
रात में इस जीव की जान लेने को आमादा ग्रामीणों ने जब इसको किसी को कोई नुकसान न पहुंचाते देखा तो वे इसके साथ खेलने लगे। इसे जहां छोड़ा गया, इसने बहुत तेजी से जमीन खोदनी शुरू कर दी। काफी देर तो वह इसको वनकर्मियों से छिपाते घूमे। आखिर इसको वनकर्मियों ने अपनी अभिरक्षा में ले लिया। पहले तो दुर्लभ प्रजाति के इस जीव को चिड़ियाघर भेजने का प्लान बना पर बाद में वन्यजीवों से आंतरिक लगाव रखने के लिए मशहूर प्रभागीय वनाधिकारी कार्तिक कुमार सिंह के निर्देश पर इसे धौरहरा क्षेत्र के जंगल में छोड़ दिया गया।
आखिर क्या है और कहां से आया था सल्लू सांप ?
एक अरसे से लोगों की निगाहों से गायब सल्लू सांप बीते 27 अक्तूबर की रात ढखेरवा नानकार गांव में पास के एक नाले से आया बताया जाता है। वन्यजीव विशेषज्ञ और विश्व प्रकृति निधि के डॉ0 वीपी सिंह बताते हैं कि नदियों के किनारे, नम और जंगली इलाकों, घास के सूखे मैदानों में बिल बनाकर रहने वाला यह जीव चींटी आदि छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़ों को खाता है। इसी वजह से इसको चींटीखोर (Ant-Eater) कहा जाता है। डॉ0 सिंह कहते हैं कि यह भारतीय जीव है। इसकी तकरीबन नौ प्रजातियां होती हैं। अमेरिका आदि देशों में भी इसकी कुछ प्रजातियां मिलती हैं। यह सरीसृप (Reptiles) और स्तनधारी (Mammal) जीवों के बीच का जंतु है। यह अंडे देता है लेकिन अपने बच्चों को दूध पिलाता है।
प्रभागीय वनाधिकारी उत्तर खीरी वन प्रभाग केके सिंह बताते हैं कि यह दुर्लभ जीव है। लुप्तप्राय इस जीव को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत इसी कारण श्रेणी-1 में रखा गया है। सभ्यता के विकास के साथ ही इनज जीव-जंतुओं को आवास की किल्लत तो होती ही जा रही है, इसके साथ ही लोगों की जीव-जंतुओं के साथ लगाव भी कम हो रहा है। इसके शरीर पर मौजूद शल्क इसके सुरक्षा कवच का काम करते हैं। बाघ आदि जानवर इसको बहुत पसंद करते हैं लेकिन खुद पर हमला होते ही यह खुद को गोलाकार लपेट लेता है। तब इसके शल्क इसको बचाते हैं।
लोगों का मानना है कि पिछले दिनों इलाके में आई भीषण बाढ़ के चलते खाने की किल्लत के चलते यह जीव भटककर इस गांव में आ गया होगा।
कैसे-कैसे खतरे
सीधे-सादे और दुर्लभ प्रजाति के इस जीव को सबसे ज्यादा खतरे मानव से ही हैं। घुमन्तू कुचबंधिया बिरादरी के लोग न केवल सल्लू सांप को मारकर खा जाते हैं, बल्कि इसके शरीर पर लगे शल्कों को भी उखाड़कर उनमें छेद करके रस्सी से अपने मवेशियों के गले में डाल देते हैं। उनमें यह भ्रांति है कि इससे उनके जानवर न केवल बीमारियों से बचे रहेंगे बल्कि उनके ऊपर भूत-प्रेतों का साया भी नहीं पड़ेगा। उनकी इस सोच ने गांवों में रहने वाले तमाम अशिक्षित लोगों को प्रभावित किया और इसने सल्लू सांप के जीवन को खतरे में डाल दिया।
आइए, हम पढ़े-लिखे और सभ्य कही जाने वाली मानव जाति के लोग इस दुर्लभ और धरती से विलुप्त हो रहे इस जीव की सुरक्षा के लिए काम करें और इसके लिए औरों को भी जागरूक करें। धरती का सौंदर्य महज आलीशन मकान, पार्क, शानदार गाड़ियां ही नहीं, इस पर घूमने वाले छोटे-बड़े जीव और जैव विविधता भी है। हमारी तरह इन जीवों को जो हमसे कुछ मांगने की बजाय हमेशा कुछ देते ही हैं, भी हमारी तरह अपनी जिंदगी जीने का पूरा हक है।
साभार: सुबोध पाण्डेय
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