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    पर्व और राजधर्म कर्म

    By November 9, 2018 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    भारतीय पर्वो के सामाजिक सरोकार भी होते है। खासतौर पर समाजसेवा से जुड़े लोगों की गतिविधियों से उनके विचार उजागर होते है। देश की सबसे पुरानी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष दीपावली के पहले खास अंदाज में थे। उन्होंने प्रधानमंत्री पर अमर्यादित शब्दों के साथ हमला किया, इसके बाद छुट्टी बिताने विदेश चले गए। इधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दिन भी छुट्टी न करने का अपने रिकार्ड पर अमल किया। दीपावली के दिन उन्होंने साधना, सुरक्षा और शासन तीनों पर अमल किया। वह केदारनाथ दर्शन हेतु गए। यह उनकी व्यक्तिगत साधना मानी जा सकती है।
    उन्होंने उत्तरंखण्ड में चल रहे विकास कार्यो की भौतिक समीक्षा की, संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक की, यह उनका शासकीय कर्म था। इसके बाद वह देश की सुरक्षा में लगे जवानों के बीच चले गए। यह देश के जवानों के प्रति उनका दायित्व निर्वाह था। ऐसा नहीं कि मोदी यह सब पहली बार कर रहे थे। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उनका त्योहार मनाने का यही अंदाज रहा है।
    उन्होंने अपने को कभी सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकारों से अलग नहीं किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इसी मार्ग का अनुसरण करते हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद से वह प्रमुख पर्वों की पौराणिक भव्यता और पहचान लौटने का प्रयास कर रहे हैं। मथुरा, गोकुल,बरसाने से होली और अयोध्या से दीपावली का सद्भव हुआ। विदेशी शासन के समय यहां के पर्वों की भव्यता कम हुई। योगी उस कमजोरी को दूर कर रहे हैं। हैलीपैड से करीब आधे किलोमीटर चलकर मोदी मंदिर में पहुचें थे। पूजा अर्चना के बाद केदारनाथ धाम के चल रहे पुनर्निर्माण का निरीक्षण किया। दो हजार तेरह में आयी आपदा के बाद सरस्वती नदी पर बने घाट समेत कई धार्मिक जगह पर नुकसान पहुंचा था, जिसके बाद पुनर्निर्माण का कार्य किया गया था। मोदी ने केदारनाथ धाम के दर्शन के बाद इन जगहों पर लोकर्पण किया।
    मई दो हजार सत्रह और इसी वर्ष अक्टूबर में मोदी उत्तरंखण्ड गए थे। दो हजार तेरह में उत्तराखंड में विनाशकारी आपदा आई थी, जिसके बाद केदार घाटी को फिर से सजाने-संवारने के प्रयास किए जा रहे दो हजार पन्द्रह  में दिवाली पर मोदी पंजाब सीमा पर गए थे। उनकी यह यात्रा उन्नीस सौ पैसठ में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध की अर्ध सदी साल पूरे होने पर हुई थी। दो हजार सत्रह की दिवाली में प्रधानमंत्री हिमाचल प्रदेश गए थे, जहां उन्होंने एक चौकी पर भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस के कर्मियों के साथ वक्त बिताया था। मोदी ने पिछले साल दिवाली जम्मू कश्मीर के गुरेज में सैनिकों के साथ मनाई थी।
    नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब भी सीमा पर जाकर जवानों के साथ दीवाली मनाते रहे थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद वह अपनी इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। मोदी ने आइटीबीपी के साथ अपना अनुभव साझा किया। जब कैलाश मानसरोवर यात्रा यात्रा शुरू हुई तो वह शुरुआत में गए थे।  करीब पैंतालीस दिनों तक आइटीबीपी के जवानों के साथ रहे। भले ही जवानों का काम कंधे पर बंदूक रखकर सुरक्षा करने का था, फिर भी  जवान कभी यात्रियों का भारी सामान उठाते थे तो कभी बीमार लोगों को चढ़ाई में मदद करते थे। खाने पीने की व्यवस्था करते थे।इतना ही नहीं भोलेबाबा का मनोहारी गीत भी यात्रियों के साथ बैठकर जवान गाते थे। करीब पैंतालीस दिनों की यात्रा में लगा कि जैसे मैं आइटीबीपी परिवार का सदस्य बन गया हूं। सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के साथ प्रधानमंत्री भारत चीन सीमा के पास हर्षिल पहुंचे।
    यहां उन्होंने अपने हाथों से कुछ जवानों को मिठाई खिलाई। भारतीय सशस्त्र बलों के जवानों को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि सुदूर बर्फीली चोटियों पर आपका अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण भाव पूरे देश को ताकत देता है और यह भारतीयों के सपनों और भविष्य को सुरक्षित कर रहा है। रक्षा के क्षेत्र में भारत बड़े कदम उठा रहा है। उन्होंने वन रैंक, वन पेंशन समेत पूर्व सैनिकों के कल्याण के कई मसलों पर बात की। संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों को लेकर भारतीय सशस्त्र बलों की पूरी दुनिया में सराहना होती है। यह पूरे देश के लिए गर्व की बात है। नरेंद्र मोदी के यह कार्य और विचार आदर्श शासक की अवधारणा के अनुकूल है। जिसमें शासक से निजी सुखों को महत्व न देने की अपेक्षा की गई।
    नरेन्द्र मोदी की यही विशेषता उन्हें भारतीय राजनीति के अन्य नेताओं से अलग करती है। उन्होंने सार्वजनिक सेवा के लिए परिवार का त्याग किया। इसके लिए उन्होंने अपनी माँ का आशीर्वाद और अन्य परिजनों की सहमति भी प्राप्त की थी। उसके बाद वह ईमानदारी और समर्पित भाव से समाजसेवा में लगे है।

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