भारतीय बेटियों की राजनीति में उड़ान

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समय तेजी से बदल रहा है। हर क्षेत्र में भारतीय महिलाएं अपनी प्रतिभा और लगन से सफलता-दर- सफलता हासिल कर रही हैं। अब कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां महिलाओं के पदचाप न सुनाई दे रहे हों। भारतीय बेटियां जहां नील गगन में स्वच्छंद उड़ान भर रही हैं वहीं वह राजनीतिक चेतना के रथ पर सवार होकर संसद की देहरी तक भी पहुंच रही हैं। सत्रहवीं लोकसभा के चुनावी परिदृश्य को देखें तो आधी आबादी ने संसद में अपनी मौजूदगी का एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। बावजूद इसके यदि दुनिया भर के राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो भारत में महिला सांसदों का औसत सबसे कम है। भारत में जहां पूरे संसद की संख्या का केवल 14 फीसदी महिला सांसद हैं वहीं दक्षिण अफ्रीका में 43 फीसदी, ब्रिटेन में 32 फीसदी, अमेरिका में 24, बांग्लादेश में 21 और रवांडा में 61 फीसदी महिला सांसद हैं। हमारे देश में महिलाएं बेशक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकसभा में विपक्ष की नेता और लोकसभा अध्यक्ष के साथ-साथ अन्य कई महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर आसीन रही हों लेकिन राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर उन्होंने भी कभी ठोस पहल नहीं की।

मौजूदा लोकसभा में जो महिला सांसद चुनकर आई हैं,  उनमें हर विधा का सामंजस्य देखा जा सकता है। दिलचस्प पहलू तो यह है कि इस बार जमीन से जुड़ी कई कद्दावर महिलाओं ने संसद की देहरी पर कदम रखे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में जहां 62 महिला सांसद संसद तक पहुंची थीं वहीं इस बार इनकी संख्या 78 हो गई है। 2019 में पुरुष उम्मीदवारों की अपेक्षा महिला उम्मीदवारों की संख्या सिर्फ 715 थी लेकिन इनकी सफलता का ग्राफ पुरुषों से कहीं बेहतर है। इस मर्तबा उड़ीसा में 21 में से सात महिला सांसद चुनी गई हैं जिनमें से बीजेडी की पांच और भारतीय जनता पार्टी की दो सांसद हैं। राजनीति में महिलाओं को 33 फीसदी प्रतिनिधित्व देने की मांग लम्बे समय से हो रही है लेकिन इस दिशा में अब तक ठोस प्रयास नहीं देखे गए हैं।

देश में बीजू जनता दल ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने टिकट बंटवारे में 33 फीसदी महिलाओं को तवज्जो दी थी तो तृणमूल कांग्रेस ने भी 42 में से 17 महिला उम्मीदवारों को टिकट देकर आधी आबादी पर अपना विश्वास जताया था। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने 423 में से 54 महिलाओं तो भारतीय जनता पार्टी ने 437 में से 53 महिलाओं को ही टिकट दिया था। सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों में कई ऐसे नाम हैं जिसे जनता ने नकार दिया है। जनता जनार्दन ने टीआरएस की के. कविता, पी.डी.पी. की महबूबा मुफ्ती, समादवादी पार्टी की डिम्पल यादव और पूनम सिन्हा, भाजपा की जया प्रदा, कांग्रेस की प्रिया दत्त और उर्मिला मातोंडकर तथा तृणमूल कांग्रेस की मुनमुन सेन को इस मर्तबा संसद जाने से रोक दिया है। संसद पहुंची महिलाओं में ओड़िशा से बीजू जनता दल से जीतीं चंद्राणी मुर्मू (25) सबसे कम उम्र की सांसद हैं। इसी तरह ओड़िशा से ही भाजपा के टिकट पर जीतीं अपराजिता सारंगी आईएएस थीं तो बीजू जनता दल की प्रमिला बिसोई पांचवीं तक पढ़ी हैं और खेती करती हैं। केरल की रेम्या हरिदास कांग्रेस से जीती हैं जो टैलेंट हंट विजेता हैं।

सत्रहवीं लोकसभा के परिदृश्य को देखने के बाद भी राजनीति में महिलाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि संसद में 33 फीसदी आरक्षण दिलाने के लिए लाया गया महिला आरक्षण विधेयक कुछ पार्टियों के रवैये के चलते कई वर्षों से लम्बित है। इससे ज्यादा अफसोस की बात तो यह है कि राष्ट्रीय पार्टियां (कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी) भी महिलाओं को टिकट देने के मामले में संजीदा नहीं हैं। अफसोस की बात है कि राजनीतिक भागीदारी की अहम प्रक्रिया मतदान में भी शहरों के बनिस्बत ग्रामीण महिलाएं अपने परिवार के पुरुषों की राय के मुताबिक ही मतदान कर रही हैं। आधी आबादी की राजनीतिक उपेक्षा के बावजूद महिलाएं राजनीति में न सिर्फ आगे आ रही हैं बल्कि अपनी सफलता से पुरुष मानसिकता को भी बदल रही हैं। आज महिलाएं संसद और विधानसभा में जहां गंभीर मुद्दों पर अपनी बात रख रही हैं वहीं अपने निर्णयों से लगातार वाहवाही लूट रही हैं। यह खुशी की बात है कि महिलाएं न केवल राजनीति में दिलचस्पी ले रही हैं बल्कि मतदान के मामले में भी पुरुषों को ठेंगा दिखा रही हैं।

देखा जाए तो भारतीय राजनीति में अभी भी पुरुषवादी सोच ही हावी है। हर पार्टी आम आदमी की बात तो करती है लेकिन आम औरत के बारे में कतई नहीं सोचती। गौरतलब है कि स्वतंत्रता से पहले ही (1917) देश में महिलाओं की राजनीति में भागीदारी की मांग उठी थी, उसके बाद वर्ष 1930 में पहली बार महिलाओं को मताधिकार मिला। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट पर गौर करें तो भारत जैसे देशों में यदि महिलाओं की भागीदारी इसी तरह से कम रही तो लिंग असंतुलन को पाटने में कम से कम 50 साल लग जाएंगे। महिला आरक्षण विधेयक की जहां तक बात है यह अब तक चार बार संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन पारित नहीं हुआ। इस विधेयक के कानून बनने के बाद लोकसभा की 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। इस विधेयक को लेकर कुछ पार्टियों में हिचक है तो कुछ का तर्क है कि इससे शहर और उच्च समाज की महिलाओं का संसद में दबदबा हो जाएगा तथा ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं हाशिए पर चली जाएंगी।

भारतीय राजनीति में महिलाओं के दबदबे को देखें तो इंदिरा गांधी, सुचेता कृपलानी, विजय लक्ष्मी पंडित, सरोजनी नायडू, सोनिया गांधी, मेनका गांधी, जयललिता, सुषमा स्वराज, मायावती, उमा भारती, ममता बनर्जी, प्रतिभा पाटिल, स्मृति ईरानी आदि के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं। इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। वह वर्ष 1966 से 1977 तक लगातार तीन बार प्रधानमंत्री रहीं। इसके बाद वह चौथी बार वर्ष 1980 से 1984 तक इस पद पर रहीं। सुचेता कृपलानी की जहां तक बात है वह 1963 में उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। सुचेता स्वतंत्रता सेनानी के साथ संविधान सभा के लिए चुनी जाने वाली कुछ महिलाओं में शामिल थीं। इसके अलावा वह कई उप-समितियों में भी शामिल रहीं जिन्होंने स्वतंत्र भारत का संविधान तैयार किया। विजयलक्ष्मी पंडित वर्ष 1953 में संयुक्त राष्ट्र संघ आमसभा की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनी थीं। विजयलक्ष्मी पंडित 1962 से 1964 तक महाराष्ट्र की राज्यपाल भी रहीं। विजयलक्ष्मी पंडित उत्तर प्रदेश के फूलपुर से लोकसभा सदस्य भी रहीं।

भारत कोकिला सरोजनी नायडू की बात करें तो वह आजादी से पहले संयुक्त प्रांत की राज्यपाल थीं। आजादी के बाद भी वह राज्य की गवर्नर रहीं यानी वह स्वतंत्र भारत की पहली महिला राज्यपाल थीं। आजादी से पहले वह कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष भी रहीं। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया था। इटली में जन्मीं और रायबरेली से सांसद सोनिया गांधी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष के साथ लगभग डेढ़ दशक तक कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं। सूचना अधिकार कानून और मनरेगा लागू कराने में सोनिया गांधी की बड़ी भूमिका रही है। भारतीय जनता पार्टी की कद्दावर नेता सुषमा स्वराज दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं। पेशे से वकील सुषमा स्वराज कुशल वक्ता होने के साथ ही उनका भारतीय राजनीति में विशेष स्थान है। प्रतिभा पाटिल भारत की पहली महिला राष्ट्रपति रह चुकी हैं।

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। मायावती किसी पद पर हों या नहीं उनका असर उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्पष्ट देखा जा सकता है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने राज्य से वाम दलों के 34 वर्षीय राज को खत्म किया था। वह देश की पहली महिला रेल मंत्री भी रहीं। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की थी लेकिन आज वह तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा हैं। स्मृति ईरानी ने अमेठी से राहुल गांधी को पराजित कर इस बात के संकेत दिए कि जनता के सुख-दुख में सहभागी रहने वाला ही असली राजनीतिज्ञ है।

नि:संदेह पितृसत्ता की सीमाओं को लांघते हुए जिन 78 महिलाओं ने संसद में कदम रखा है उससे महिला सशक्तीकरण की दिशा में देर से ही सही परिवर्तन जरूर होगा। आज जब संसद में करोड़पति सांसदों का वर्चस्व हो ऐसे में ओड़िशा की प्रमिला जैसी गरीब तबके की महिला का संसद तक पहुंचना निम्न-मध्यमवर्गीय लोगों की उम्मीदों को ही पंख लगाता है। प्रमिला ने महिलाओं में विश्वास जगाया है कि वे मेहनत व लगन से अपने सपनों को पूरा कर सकती हैं। राजनीति में लैंगिक भेदभाव आज भी है। लोकसभा हो या फैसले लेने वाली अन्य जगह, महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व सीधे-सीधे राजनीतिक ढांचे से उनको सुनियोजित ढंग से बाहर रखने और मूलभूत लैंगिक भेदभाव को ही रेखांकित करता है।

सत्रहवीं लोकसभा में बेशक 78 महिला सांसद पहुंची हों लेकिन अभी भी उनके लिए ‘शीशे की छत’ तोड़ पाना आसान नहीं है। भारत में महिलाओं ने दलितों या मुसलमानों जैसे ‘किसी खास वर्ग’ के रूप में कभी मतदान नहीं किया, न ही किसी राजनीतिक दल ने राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोशिश की कि उन्हें उनसे जुड़े किसी मुद्दे पर आंदोलित किया जाए। राजनीतिक दलों को महिला मतदाताओं की याद सिर्फ चुनाव के दौरान ही आती है। भारत में महिला आंदोलन इस वक्त संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के सवालों पर सकारात्मक कार्रवाई को लेकर बंटा हुआ है। हम उम्मीद करते हैं कि मोदी सरकार महिला आरक्षण विधेयक पास करवा कर आधी आबादी के चेहरे पर जरूर मुस्कान लाएगी।

  • श्रीप्रकाश शुक्ला, http://khelpath.blogspot.com से साभार

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