हमारे विवेर्स के लिए दो बातें जीवन में आवश्यक होती हैं। एक तो जीवन में गतिशीलता होनी चाहिए और दूसरा, जीवन की उस गति को सही दिशा मिलनी चाहिए। यदि हमारा जीवन गतिशीलता खो देगा तो जीवन, जीवन नहीं रह जाएगा बोझ बन जाएगा। जीवन बहती गंगा की भांति होना चाहिए। नदी गतिशील है और उसकी गतिशीलता ही उसका आकर्षण है। चरैवति, चरैवति। जीवन में गति नहीं रही तो फिर हम जीएंगे नहीं, जीवन को ढोएंगे। किसी ने पूछा, क्यों जी रहे हो भैया ? बोले, ‘मर नहीं रहे हैं इसलिए। ‘अब जो मर नहीं रहा है इसलिए जी रहा है, वह क्या खाक जी रहा है! जीवन परमात्मा का दिया हुआ एक गीत है, उसे प्रेम से गुनगुनाएं।

तो, पहली चीज- जीवन में गतिशीलता होनी चाहिए। किंतु यदि गति की दिशा गलत होगी तो अधोगति होगी , हम अवनति की ओर जाएंगे। आजकल लोगों में गति तो है , लेकिन गति की दिशा सही नहीं है। दिशा गलत है इसलिए दशा बिगड़ी हुई है। किसी चिंतक ने बहुत ठीक कहा है कि परमात्मा की ओर जाने का मार्ग वहीं से शुरू होता है , जहां तुम खड़े हो। यदि वेश्यालय में पड़ा हुआ आदमी भी जग जाए और इस बात की कामना करने लगे कि ‘ मुझे बैकुंठ जाना है ‘ तो उसके लिए बैकुंठ का मार्ग वहीं से शुरू होता है।
इसलिए तुम गतिशील बनो और सही दिशा पकड़ो। हमें मोक्ष की ओर जाना है, मंगल की ओर जाना है। निश्चित रूप से सफलता मिलेगी। जहां खड़े हो उससे आगे बढ़ो। यह जो इंकलाब का नारा लगाते हैं, उसका भी यही अर्थ है- गतिशील बनो, आगे बढ़ो, जीवन को गति दो। लेकिन किस ओर ? जिंदाबाद की ओर, आबाद होने की ओर, कल्याण की ओर। कल्याण शब्द का अर्थ है- नवप्रभात, जो जीवन में एक नई भोर ला दे। जीवन को खुशियों के उजाले से भर दे।







