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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    माल्या, मेहरबानियां और मजाक

    By September 14, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    अरुण जेटली पर दिए गए बयान से विजय माल्या पलट गया, लेकिन कांग्रेस इस बात से बेखर रही। उधर माल्या सफाई दी रहा था, इधर राहुल गांधी सांसद पी एल पुनिया को चश्मदीद के रूप में पेश कर रहे थे। पुनिया ने जेटली और पुनिया को देखने की बात कही, राहुल एक कदम आगे बढ़ गए। बोले कि माल्या लंदन भागने की बात कर रहा था। राहुल ने इस कथित बात को कैसे सुना, इसका कोई जबाब नहीं है। ऐसे बे सिरपैर के बयान राहुल की स्थिति को हल्का बनाते है। लेकिन वह इनसे कोई सबक लेने को भी तैयार नहीं है। इस तरह कांग्रेस ने खुद ही अपना मजाक बनाया है।
    बात यहीं तक सीमित नहीं है। इस प्रकरण पर कांग्रेस में यदि नैतिक बल होता तो यह शर्मिन्दी न उठानी पड़ती। विजय माल्या जैसे लोगों पर यूपीए सरकार मेहरबान थी। यह अजीब था कि पुनिया को ढाई वर्ष बाद जेटली और माल्या की मुलाकात याद आई। ऐसा भी नहीं कि यह प्रकरण अभी सामने आया है। पिछले वर्ष माल्या पर मनमोहन सिंह और चिदंबरम का दस्तावेजी संवाद सामने आया था। इसमें उस समय का प्रसंग था, जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री और चिदंबरम वित्त मंत्री थे। उस समय भी पुनिया को यह सपना नहीं आया था। गनीमत है कि उन्होंने कथित रूप में जेटली और माल्या की मुलाकात संसद भवन में देखी। इस पर भी जेटली की सफाई आ चुकी है। पुनिया यह बखूबी जानते है कि संसद में किसी सांसद का मंत्री से मिलना आसान रहता है। उस समय माल्या सांसद था।
    विजय माल्या ने कहा कि मीडिया ने उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया। अरुण जेटली से उनकी कभी भी अधिकारिक मुलाकात नहीं हुई। माल्या को अपने बयान पर फिर सफाई देने के लिए आना पड़ा। लंदन की वेस्टमिन्स्टर मजिस्ट्रेट कोर्ट में सुनवाई के बाद बाहर आए माल्या ने अपनी सफाई पेश की। माल्या ने कहा कि जेटली से उनकी कोई औपचारिक मुलाकात नहीं हुई । बतौर सांसद वो उनसे संसद के सेंट्रल हॉल में मिले थे और अपनी बातें उनके सामने रखी थी।
    इधर नई दिल्ली में राहुल गांधी और पीएल पुनिया अपनी धुन में थे। वह माल्या के पहले वाले बयान पर मोर्चा खोले बैठे थे।
    लंदन में वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश होने के बाद माल्या ने संवाददाताओं को बताया था कि उसने मंत्री से मुलाकात की थी।  बैंकों के साथ मामले का निपटारा करने की पेशकश की थी।  वित्त मंत्री ने माल्या के बयान को झूठा करार देते हुए कहा कि उन्होंने  दो हजार चौदह के बाद उसे कभी मिलने का समय नहीं दिया।
    राहुल गांधी के अनुसार पीएल पुनिया ने देखा कि दोनों संसद के केंद्रीय कक्ष में मिले थे। पहला सवाल कि वित्त मंत्री भगोड़े से बात करते हैं।वह उनसे लंदन जाने के बारे में बताता है। लेकिन माल्या के बारे में वित्त मंत्री ने किसी एजेंसी को क्यों नहीं बताया। राहुल ने यह भी पूछा कि सीबीआई पर दबाव डालकर रेस्ट्रेंड नोटिस  को इन्फॉर्म्ड नोटिस में किसने बदलवाया। इस आरोप में कोई सच्चाई नहीं थी। गत वर्ष भाजपा ने आरोप लगाया था कि माल्या ने मनमोहन सिंह और चिदंबरम को दो-दो पत्र लिख कर मदद मांगी थी। माल्या ने लिखा था कि बैंक कंजोर्शियम से उन्हें साठ दिन के लिए कर्ज दिलाया जाए ताकि एयरलाइंस की ईंधन आपूर्ति बंद ना हो।
    रिपोर्ट में दावा किया गया है कि माल्या ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के बड़े अफसरों से भी मदद मांगी थी, लेकिन उसने इनकार कर दिया था। मनमोहन और चिदंबरम ने माल्या की मदद की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, विजय माल्या उस समय लगातार प्रधानमंत्री कार्यालय के संपर्क में थे। दो हजार दस से तेरह के कई ईमेल प्रधानमंत्री कार्यालय ने वित्त मंत्रालय को प्रेषित कर दिए थे। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वायलार रवि ने बेल आउट पैकेज की घोषणा की थी। दो हजार चार  में पहली बार माल्या को ऋण दिया गया, फिर  दो हजार आठ में ऋण दिया गया।  माल्या की कंपनी को नॉन-परफॉर्मिंग एसेट घोषित कर दिया गया था लेकिन इसके बाद भी दो हजार दस में पुनः ऋण दिया गया।
     माल्या पर भारतीय बैंकों का नौ हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। भारत में उसके खिलाफ भगोड़ा आर्थिक अपराधी कानून के तहत मामला चल रहा है। प्रवर्तन निदेशालय  नए कानून के तहत माल्या को भगोड़ा घोषित करने और साढ़े बारह हजार करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त करने की कार्यवाई कर सकेगा। कांग्रेस इस समय गलतफहमी की शिकार है। उसे लगता है कि नरेंद्र मोदी सरकार पर गड़बड़ी के आरोप लगाने से उंसकी छवि सुधर जाएगी। लेकिन इस संबन्ध में उसके सभी दांव उल्टे पड़ रहे है।
    दो हजार पन्द्रह में विजय माल्या के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया था। उस वक्त माल्या विदेश में रहते थे। जब माल्या भारत लौटे तो ब्यूरो ऑफ इमीग्रेशन ने  लुक आउट नोटिस के तहत सीबीआई से माल्या को हिरासत में लेने की बात कही।
    तब सीबीआई ने यह कहकर माल्या को हिरासत में लेने से इंकार कर दिया कि अभी माल्या एक सांसद हैं और उनकी खिलाफ कोई वॉरेंट भी जारी नहीं है। उस दौरान सीबीआई ने सिर्फ माल्या के आने और जाने की सूचना मांगी। उस के अनुसार किसी का पासपोर्ट तभी जब्त किया जा सकता है जब उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई हो या फिर उसके खिलाफ कोई जांच चल रही हो।
    यह सुप्रीम कोर्ट का आदेश है। माल्या जांच में सहयोग कर रहा था। इसलिए उनके विदेश जाने पर रोक लगाने की आवश्यकता नहीं समझी गई। एजेंसी माल्या के विदेशी दौरों पर नजर रखे हुए थी, लेकिन कभी भी हस्तक्षेप नहीं किया क्योंकि वह हर बार वापस  लौट आता था। यह संभव है कि सीबीआई उसके भागने का अनुमान नहीं लगा सकी।  उसका सांसद होना भी इसका बड़ा कारण था। लेकिन इससे कांग्रेस सरकार की उसके ऊपर की गई मेहरबानियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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