गांव की पुरवइया

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यादगार: अमराई
यादें कौंधती हैं। काया की मानस कोठरी में कहीं बिजलियाँ  गिरती हैं तो कहीं नम मौसम है। आँखें अनंत को निहारती हैं। कुछ खोया सा है। कुछ हाथ से फिसलता नजर आया है। मोटी धूल के उस पार कुछ बहुत साफ सा दिखता है।
आम के मौसम ने समूची अमराई को गुलजार कर दिया है। जो थोड़े दिन पहले वीरान वन प्रदेश के निष्फल बिरवा कहे जाते थे आज फलदार वृक्षों में शुमार है। दुनिया भी अजीब है। यह सिर्फ उपयोगी की सहयोगी बनती है। सब समय का फेर है। जड़ जगत भी आज चेतन हो चला है। बाग में जगह जगह रखवैयों की टोलियाँ घूमने लगीं हैं। क्या बच्चे क्या बड़े। सब अपनी अपनी बाग के निगहबान हैं।
यह ऐसा मंच था जहाँ पड़ोसी गाँव के लोग भी आ जुटते। कोई अपरिचित नहीं, कोई पराया नहीं। सब अपने से लगते। इसी बहाने बच्चे पीढ़ियों के अंतराल को समझते, सहज होते और रिश्तों की बारीकियों का सबक सीखते। गाँव की यह वह प्रयोगशाला थी जो नौनिहालों को दिशा और दर्शन दोनों देती। सुबह से शाम हो जाती पर उस रौनक का सूर्यास्त न था। चेहरे बदलते, बतकही बदलती, खेल कौतुक बदलते, परछाईयों की आकार आकृति बदलती, ऊपर सुरुज देवता की तपन बदलती पर जीवन आनंद वहीं टिका रहता.. बराबर! बाग के समूचे विस्तार में मौज मनोरंजन की यह अपनी ही दुनिया थी।
बाग के बीच सरपत सरकंडे की छोटी सी मड़इया बड़ी चुहिल लगती है। तीन तरफ टाटी से घिरी दीवारों से बयार झुर झुर करती तो पुरवइया में टूटता बदन कोई गीत छेड़ देता। रमजू तेवारी झुंड में बड़े रसिया थे। पुरवा की रौ में दिल में यूं हिलोर मचती कि दुपहरिया गीत से गूँज उठती-
आवै दा अगहनवा, कटै दा जड़हनवा,
चिरई तोहका लइकै ना,
डरबै डँड़वा पै मड़इया
चिरई तोहका लइकै ना !
मड़इया के नीचे लिपी जमीन और जमीन पर एक खटिया। यहाँ बँसखट बड़े काम की चीज है। एक कोने में करीने से गहरा गड़बड़ा खुदा है जिसमें टपके आमों को सुरक्षित रखा जाता मिट्टी की ठंडक में। यही फ्रीज था, यही गोदाम था ! गड़बड़े के पास ही कोसे से ढकी ठंडे पानी की ठिलिया है। जो स्वाद उस माटी की ठिलिया वाले पानी में था वह आज बिसलेरी वाले बोतल में भी नहीं ! एकदम जूड़..तरावट भरा जल। ऊपर मड़इया के कोरव में कुछेक जगह बच्चों ने कच्चे आम छुपा रखे हैं पकने के लिए। यही सारी पूँजी थी उनकी। प्रायः हर बच्चे के नाड़े में एक छिदी सुतुही लटकी मिलती ताकि वक्त जरूरत आम के छिलके के लिए औजार ढूँढना न पड़े।
यहाँ हर जबान को पता है पेड़ों की मिठास। मालदहवा इतना दलगर है कि मुँह से काटो तो नाक गूदे में डूब जाय पर दाँत किसुली तक न पहुँचे। रोहनिया सबसे पहले पकना शुरू होता। रोहिनी नखत लगते ही उसकी सीपर गिरने लग जाती। खट्टहवा सिर्फ खटाई अचार के लिए ही ठीक था। पिछले साल अम्मा ने लोहरू के बड़के बेटवा से इसी में से आम तुड़वाया था बिटिया के बिआह में तलखा बनवाने के लिए। सब बहुत बखान कर रहे थे। मिठउवा का आम एक दिन रख दो तो कीड़े रेंगने लग जाते हैं अंदर। चिनियहवा, चोपियहवा, टोड़हवा, कोनहवा, मिरिचहवा, सेनुरहवा, दुधहवा, चिटकहवा, सेनुरहवा आदि कितने मेर मेर के तो स्वाद थे वहाँ। आम खाने का अपना ही मजा था। बाल्टी के पानी में विभिन्न स्वाद वाला आम और निचोड़ निचोड़ के चूसते जाते.. एक खूबी थी जो हर फल को मयस्सर नहीं, गुठली बार बार मुँह डालते खाते पर घिन न लगती जरा। वह आनंद अब फाँकें प्लेट में रख कर खाने में कहाँ!
पर बाग की रौनक मड़इया की मोहताज नहीं। चारों ओर घनी छाँव का आलम है। नीचे धूप के पैबंद जहाँ तहाँ बिखरे पड़े हैं। और इन्हीं के बीच छाँवों में रौनक का आवाहन होता। कहीं गुट्टी, कहीं लँगड़ी तो कहीं सियर-डंडी का आयोजन ! समूची बाग खेल की एक कार्यशाला लगती। गुट्टी के यकड़ा-दुकड़ा खेल में उरमिला बहिनी सिध्दहस्त खिलाड़िन हैं। एक बार शुरू हो जाँय तो मजाल है कि किसी और का नंबर आ जाय।बस गद्दे पर गद्दे चढ़ाती जातीं। लोग अपने दाँव को तरस जाते। गाँव की बुढ़िया फुआ कहती हैं सतघरवा खेलने से पानी बरसता है। ऐसा हुआ भी है कई बार पर आज तक पता न चला कि पानी सतघरवा से बरसा या मानसून से। सतघरवा में गुट्टी को, दोनों तरफ चीन्हा खींच के सात सात घरो में सजाया जाता… और फिर शुरू हो जाता गुट्टी कमाने गवाँने का मनोरंजक सिलसिला। बिना हर्रै फिटकरी के चोखा रंग आना इसे ही कहते हैं। एक पैसा भी खरच नहीं। गुट्टियों का छाँटी वाला खेल भी चलता। लिंग भेद से परे सारे खेल सारे के लिए।
रात, रोमांच का नव उत्सव ले आती.. बाग के किनारे खुले आसमान के नीचे एक लाइन से रखवैयों की खटिया बिछी है.. राम उजागिर, मेवालाल, जयराम, बिसराम, बहोरे, भाला बाबू.. सब के सब अपनी अपनी खटिया पर मुस्तैद हैं। लाठी गोजी चोरबत्ती के साथ सब ने रात में आम बीनने की व्यवस्था पूरी कर रखी है। भाला बाबू सोने से पहले तमाम देवी देवताओं की दोहाई मनाते हैं – “दोहाई साँखबीर बाबा, दोहाई आस्टीकन महराज, दोहाई डीह बाबा की…!” तब जाकर कहीं उन्हें नींद आती। मानो सुरक्षा में खड़ी सारी फौज को चाक-चौबंद कर रहे हों। देर रात तक बतकही चलती। व्यक्तिगत विषयों से लेकर सामाजिक सरोकार तक के मुद्दे बतकही में शामिल होते। विश्व पटल पर बड़े बड़े दिग्गज व्यवस्थाकार भी तनावग्रस्त जीवन का आज वो समाधान न दे पाये हैं जो गाँव की उस छोटी इकाई के पूर्वजों ने विरासत में दी थी।
आधी रात को बिसराम, बहोरे को खोद के जगाते, “देखा हो ! तोहरे मिठउआ तरे केव बत्ती मारत बा।” और फिर बहोरे वहीं से उस घुसपैठिए को ललकारते हुए जुध्द छेड़ देते।… ललाइन काकी अकेले ही अपनी बाग सँभालती हैं। मजाल कि किसी को एक आम भी छूने दें। साधू तेवारी और बंसीधर ने ललाइन को आज रात छकाने का पुख्ता इंतजाम कर लिया है.. नंग धड़ंग शरीर में  कालिख लगाये लुक्काड़ा जलाये दोनो ललाइन के सामने प्रकट होते हैं और हूऽ.. हूऽ.. करते भूतिया नाच शुरू ! इधर ललाइन काकी को तो काटो खून नहीं। हाथ जोड़े इन भैरव बाबाओं के सामने दंडवत मुद्रा में आ गयी हैं.. दोहाई काली माई की, दोहाई भगवती माई की, दोहाई.. दोहाई.. दोहाई ! और भय का भूत कुछ इस तरह चढ़ा कि दो दिनों तक काकी बुखार में तपती रहीं…!
हम जिंदगी की यात्रा में मगन रहे; वासना की कीमत में नैतिकता बेच कर आ गये। अनाड़ी जौहरी ने पत्थरों के मोल में हीरा भाव कर दिया। समय लम्हों का हिसाब माँगता है, दिन महीनों वर्षों में हमने वक्त को किस्तों में गँवाया है.. ऋतुओं के हिसाब में सिर्फ पतझड़ पल्ले पड़ा है…
बसंत तो अमराई में ही छोड़ आये हैं।
– अरुण कुमार तिवारी की वॉल से

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