संवेदनहीनता की ओर बढ़ते कदम

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  • विकास के दौर में आज भी मूलभूत समस्याएं बनीं हैं श्राप
  • सुझाव: प्रारंभिक उपचार व चिकित्सा की मूलभूत जानकारी जूनियर क्लासेज से स्नातक तक कर दी जाये अनिवार्य, जिससे अस्पतालों को भारी भीड़ से मिले निजात
राहुल कुमार गुप्त
भारत जहाँ एक तरफ विकास के चरम को बुलेट ट्रेन, चंद्रयान, डिजटिलाईजेशन और भी बहुत सी आधुनिकताओं के रूप में छूने की कोशिशें कर रहा है वहीं अधिकतर भूभाग में मूलभूत समस्यायें इंसान को इंसान होने का अभिशाप ही बता रही हैं।
बहुत से मार्मिक और दर्दनाक हादसे इन्हीं मूलभूत समस्याओं के चलते होते हैं जिन्हें मानव द्वारा रचित विकास चिढ़ाता नजर आता है। विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिये यह बहुत ही दुःखद स्थिति है कि शासक व प्रशासक के बड़े-बड़े वायदों के बीच जन समुदाय लगातार रोता नज़र आ रहा है।
बेशक विकास के पथ पर अग्रसर होना जहाँ वक्त की माँग है वहीं मूलभूत समस्याओं को जड़ से खत्म करना लोकतांत्रिक सरकारों का मूल कर्तव्य!
सरकारें इन समस्याओं से निपटने के लिये लगातार प्रयास तो कर रही है लेकिन इन समस्याओं के निपटारे के लिये भागिरथी प्रयास की सख्त जरूरत है।
जब इन मूलभूत समस्याओं की वजह से एक बड़े भूभाग की एक बड़ी जनसंख्या परेशान रहती है तब तक इनकी तरफ देश का ध्यान भी नहीं जाता। जब इनकी जानें जाती हैं तब कुछ संवेदनशील लोगों की संवेदनाएं जाग्रत होती हैं और देश को वस्तुस्थिति का फिर एक बार अनुस्मरण होता है। मीडिया में चर्चाएं चलती हैं, डीबेट होता है लोगों में व्यवस्था के खिलाफ हारा हुआ आक्रोश दिखाई देता है। तमाम लोग आर्थिक मदद कर नाम और पुण्य कमाते हैं। पर जिन पर इन अव्यवस्था की गाज गिरती है उनका तो सबकुछ लुट जाता है फिर यह मदद उनके आँसू नहीं थाम पाती, दुःख नहीं कम कर सकती। उनके खोए हुए अपनों को वापस नहीं करा सकती।
गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी से मरने वाले मासूम हों या अभी वर्तमान में मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से मरने वाले मासूम हों, या बरेली में सरकारी अस्पतालों की अव्यवस्थाओं का ग्रास बने मासूम हों!
या गरीबों और वंचितों को ‘आयुष्मान’ के आने के बाद भी एक सही इलाज मयस्सर न हो तो इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। लगता है इस अध्यात्म प्रधान रहे देश में अब संवेदनहीनता के दौर का आगाज हो चुका है। हादसे हुए नहीं कि उसका राजनीतिकरण शुरू। पहले सबको मिलकर समस्याओं से निपटना चाहिये न कि उन समस्याओं से आँख कान नाक बंद कर दोषारोपण का फुटबाल मैच खेलना चाहिये।
यहाँ अब ऐसा वातावरण तैयार हो चुका है कि मीडिया और समर्थक सत्ता पक्ष के हर गलत में मजबूती के साथ खड़ा नजर आता है। ऐसे हालात में जनसमस्याओं का कोई समाधान जल्द कहाँ होने वाला है।
एक बड़े चैनल की बड़ी एंकर की क्रूरता ही कहेंगे आईसीयू में जहाँ बच्चे मर रहे थे जो हर मिनट किसी न किसी बच्चे का कालगृह बना हुआ था वहाँ घुसकर अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने में लगीं थीं। अगर संवेदना थीं तो जरूर अपनी लाखों की सैलरी में कुछ रुपयों से ओआरएस व दवाओं की मदद कर सकतीं थीं। जितने मंत्री नेता उस अस्पताल दिखावा करने गये थे, अगर थोड़ा-थोड़ा मदद राशि दवाओं, ओआरअस पोषण व अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिये देते तो काफी जानें बचायी जा सकतीं थीं व बचायी जा सकतीं हैं। मुजफ्फरपुर के अलावा यह संक्रामक बुखार बिहार के अन्य क्षेत्रों में भी हाहाकार मचाने में लग गया है। हमारी सचेतता और संवेदनशीलता ही ऐसे संक्रामक रोगों को निष्प्रभावी कर सकती है।
हमारे यहाँ चिकित्सकों की गिनती एलोपैथ चिकित्सकों से की जाती है। एलोपैथ त्वरित लाभदायक जरूर है किन्तु साईड इफेक्ट से अन्य रोगों की उत्पत्ति का भी कारक है। ऐसी संक्रामक बीमारियों के प्रभाव को कम करने या खत्म करने के लिये आयुर्वेद में बहुत सी दवाओं का जिक्र है। बस उन पर शोध और प्रयोग से हम कई खतरनाक बीमारियों को नियंत्रण में ला सकते हैं।
एलोपैथ में रिसर्च चलते रहते हैं देखने और सुनने में भी आता है पर यह जिम्मेदारी सब न लेकर बड़े संस्थानों के बड़े डाॅक्टरों तक सीमित हो जाती है। आयुर्वेद, युनानी और होम्योपैथ में
चिकित्सा की डिग्री पाते ही सारे चिकित्सक खुद को अपनी कमाई तक के लिये सीमित कर लेते हैं। फिर शोध के लिये वक्त किसके पास बचता है।
मरीजों की संख्या प्रति डाॅक्टर इतनी अधिक है की डाॅक्टर को वास्तव में अपने विषय में शोध के लिये समय अपर्याप्त हो जाता है।
सरकार को इस पहाड़ से बड़े अनुपात को बहुत छोटा करना पड़ेगा, मेडिकल काॅलेजों में काफी सीटें बढ़ाना पड़ेगा जिससे चिकित्सकों की संख्या प्रतिवर्ष अधिक से अधिक निकले। जिससे मरीजों और चिकित्सकों के बीच का अनुपात संतुलित हो सके।
चिकित्सा के कुछ बेसिक फंडे, चिकित्सकीय जागरूकता, इंजेक्शन लगाना, ड्रिप चढ़ाना  या कहिये प्रारंभिक उपचार की जानकारी कक्षा 6 से इंटरमीडिएट तक की क्लासों में अनिवार्य कर दी जायें तो अस्पतालों की भीड़ भी स्वतः नियंत्रित हो जायेगी। जिससे इमरजेंसी वाले केसेज को देखने के लिये वक्त के साथ पर्याप्त स्थान भी मिल सकेगा। गोरखपुर रहा हो या मुजफ्फरपुर यहाँ संक्रामक रोगों से मरने वाले बच्चे अधिक्तर गरीब परिवारों से ही थे। पोषक तत्वों की कमी और इम्यूनसिस्टम कमजोर होने के चलते एई और जेई जैसे रोग और भयानक रूप ग्रहण कर लेते हैं।
बच्चों के पोषण के लिये सरकार कई प्रयास लगातार कर रही है पर शायद भागिरथी प्रयास नहीं! बाल विकास परियोजना के लिये तो सरकार ने अलग से विभाग व मंत्रालय तक बना रखा है पर फिर भी पूरे विश्व में हमारे यहाँ कुपोषित बच्चों का प्रतिशत ज्यादा है। यह हमारे यहाँ का दुर्भाग्य कहिए या सरकार की नरमी!  लगभग सभी जनहित से संबंधित योजनाएं बंदरबाँट का शिकार हो जाती हैं। आखिर ऐसा कब तक होगा? आखिर हम कब चेतेंगे?

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