अब कौन करेगा गंगा की परवाह?

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गंगा को बचाने के लिए समर्पित स्वामी सानन्द का जाना सबको चौंका गया, फिलहाल तो वह गंगा तो नहीं बचा पाएं लेकिन वह खुद देश के लिए एक पहेली बन गए।

क्या वास्तव में जीडी अग्रवाल ‘स्वामी सानन्द’ की हत्या हुयी थी? पहली नजर में देखा जाये तो आप सभी इस सवाल को खारिज कर देंगे, क्योकि इतनी अधिक उम्र वाले व्यक्ति का इतना लंबा अनशन करने बाद जीना सम्भव नहीं होता, लेकिन यदि इस घटना की आप गहराई में उतरेंगे तो आप के सामने ऐसे ऐसे तथ्य आयेंगे। जिसे सुनकर आप भी एक बार चौक जायेंगे।

स्वामी सानन्द के गुरु कहे जाने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उनकी मृत्यु के तुरंत बाद हत्या की आशंका जताते हुए जो कहा है वह समझने योग्य है। उन्होंने कहा कि यह कैसे हो सकता है कि जो व्यक्ति आज सुबह तक स्वस्थ अवस्था में रहे और अपने हाथ से ही प्रेस विज्ञप्ति लिखकर जारी करे, 111 दिनों तपस्या करते हुए आश्रम में तो स्वस्थ रहे पर अस्पताल में पहुंच कर एक रात बिताते ही उनकी उस समय मृत्यु हो जाये?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आगे कहते हैं कि स्वामी सानन्द ने आमरण अनशन जरूर किया था लेकिन उन्होंने अस्पताल में उनके स्वयं के शरीर में आयी पोटेशियम की कमी  दूर करने के लिए मुंह से और इन्जेक्शन के माध्यम से पोटेशियम लेना स्वीकार कर लिया था। शिवानंद सरस्वती कहते हैं कि हमारा यह प्रश्न है कि हार्टअटैक आये व्यक्ति को अस्पताल के आईसीयू में शिफ्ट किया जाता है अथवा एम्बुलेंस में लादकर कहीं और ले जाया जाता हैं ?

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देश के माथे पर कलंक:

बता दें, गुरु दास अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद की मृत्यु विचलित करने वाली है। एक महान इंजीनियर और वैज्ञानिक, जो पर्यावरण के लिए अपना पूरा चोला बदल लेता है और संन्यास लेकर गंगा को समर्पित हो जाता है, उसकी ऐसी मृत्यु समूचे देश के माथे पर कलंक है। हालांकि इस बार उनका संकल्प ऐसा था, जिसमें उनके जीवित बचने की संभावना कम थी। वे गंगा पर ऐसे विशेष कानून बनाने की मांग कर रहे थे, जिसमें सारे बांधों को खत्म करने और नये बांध नहीं बनाने की बात शामिल हो।

गंगा की अविरलता और पवित्रता के लिए यह आवश्यक है। किंतु आज के आर्थिक ढांचे में यह संभव ही नहीं कि आप जल विद्युत की सारी परियोजनाओं को नष्ट कर दें और नई परियोजनाएं खड़ी ही नहीं करें। इसलिए उनकी मांग से कोई सरकार पूरी तरह सहमत नहीं होगी। किंतु जो व्यक्ति इस पूरे आर्थिक ढांचे को मनुष्य विरोधी मान चुका हो उसे आप बीच का रास्ता निकालकर समझौते के लिए विवश नहीं कर सकते। 86 वर्ष की उम्र में 112 दिनों का अनशन कोई सामान्य बात नहीं है।

पिछले तीन दिनों से उन्होंने जल तक का त्याग कर दिया था। इसका मतलब है कि उन्होंने गंगा के लिए अपने जीवन की बलि चढ़ाने का निश्चय कर लिया था। हालांकि उमा भारती एवं नितिन गडकरी ने उनको मनाने की कोशिश की, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने भी कोशिश की, किंतु ऐसे संकल्पवान शख्स को बिना उसकी मांग माने मना पाना संभव नहीं, जिसने जिन्दगी का मोह त्याग दिया हो।

प्रशासन ने बीच में भी उनको जबरन उठाया था किंतु उच्च न्यायालय का आदेश आ गया। अभी तक यही होता है कि जब अनशन करते किसी व्यक्ति के जीवन पर जोखिम हो जाए, पुलिस उन्हें उठाकर अस्पताल में भर्ती कराती है और डॉक्टर नाक के माध्यम से पेट में जीने लायक पेय पदार्थ पहुंचाते हैं। वह कुछ लेने के लिए तैयार नहीं थे तो बेहोश करके उनको फीडिंग कराई जा सकती थी। प्रश्न यह भी है कि इतने दिनों तक अनशन करने के बावजूद जनता की शक्ति उनके साथ नहीं दिखी।

उनके पहले के अनशनों के दौरान भी यही हुआ। कुछ सक्रियतावादियों एवं छोटे-मोटे संगठनों को छोड़कर आम जनता उनके साथ नहीं आई। कई वर्ष पूर्व एक अनशन के दौरान तो उन पर यह कहते हुए हमला तक किया गया कि आप हमारे विकास को बाधित कर रहे हैं। जिन लोगों के भविष्य की वे चिंता कर रहे थे उनको भी समझ नहीं कि हमारा वास्तविक हित किसमें है तो फिर उनके बलिदान पर आंसू बहाने वाले कितने लोग होंगे?

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