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    Shagun News India
    Home»इंडिया»Crime News

    क्यों नहीं रहा पुलिस का डर

    By October 9, 2018 Crime News No Comments7 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी
    लखनउ में एक निजी कंपनी के अधिकारी को आधी रात में दो पुलिस वालों द्वारा बेवजह गोली मार देने की नृशंस घटना के तथ्य जैसे-जैसे सामने आ रहे हैं, पता चल रहा है कि एक सिपाही यदि अपनी पर आ जाए तो क्या कर सकता है। चूंकि यह मामला बड़े राज्य की राजधानी का था, एक मध्य वर्ग का था सो इतना हल्ला, सहायता, जांच भी हो गई। वरना उसके ही कुछ दिनों पहले अलीगढ़ पुलिस ने बाकायदा पत्रकारों को न्यौता भेजा कि चलो मुठभेड़ में बदमाश मारते हैं और दो लेागों को ठोक दिया। मारे गए लोगों के सफेद-काले रिकार्ड बनाए गए, लेकिन जिस तरह सारा गांव बता रहा है कि कथित मुठभेड के तीन दिन पहले ही पुलिस उन दोनों को घर से उठा कर ले गई थीं, मामला संदिग्ध ही प्रतीत होता है। एक तरफ पुलिस का रिकार्ड उन्हें बाहुबली, अपराध होने से पहले ही पहुंचने वाला और जनता का सेवक बताता है तो दूसारी तरफ आम लेाग अपराधियों के भय और पुलिस के प्रति अविश्वसनीयता के देाहरे चक्र में पिसते दिखते हैं।
    पिछले कुछ सालों से दिल्ली और करीबी एनसीआर के जिलों- गाजियाबाद, नोएडा, गुडगावं व फरीदाबाद में सरेआम अपराधों की जैसे झड़ी ही लग गई है। भीड़भरे बाजार में जिस तरह से हथियारबंद अपराधी दिनदहाड़े लूटमार करते हैं, महिलाओं की जंजीर व मोबाईल फोन झटक लेते हैं, बैंक में लूट तो तो सुना ही था, अब तो एटीएम मशीन उखाड़ कर ले जाते हैं, इससे साफ है कि अपराधी पुलिस से दो कदम आगे हैं और उन्हें कानून या खाकी वर्दी की कतई परवाह नहीं है। पुलिस को मिलने वाला वेतन और कानून व्यवस्था को चलाने के संसाधन जुटाने पर उसी जनता का पैसा खर्च हो रहा है जिसके जानोमाल की रक्षा का जिम्मा उन पर है। दिल्ली और एनसीआर बेहद संवेदनशील इलाका है और यहां की पुलिस से सतर्कता और अपराध नियंत्रण के लिए अतिरिक्त चौकस रहने की उम्मीद की जाती है। विडंबना है कि एनसीआर की पुलिस में कर्मठता और व्यावसायिकता की बेहद कमी है। उनकी रात की गश्त लगभग बंद है और डायल 100 की गाड़िया, हाईवे पर नाके लगा कर वाहनों से वसूली को ही अपना मूल कार्य मानती हैं।
    वैसे यहां पुलिस की दुर्गति का मूल कारण सरकार की पुलिस संबंधी नीतियों का पुराना व अप्रासंगिक होना है। ऐसा नहीं है कि पुलिस खाली हाथ हैं, आए रोज कथित बाईकर्स गेंग पकड़े जाते हैं, बड़े-बड़े दावे भी होते हैं लेकिन अगले दिन ही उससे भी गंभीर अपराध सुनाई दे जाते हैं। लगता है कि दिल्ली व पड़ोसी इलाकों में दर्जनों बाईकर्स-गैंग काम कर रहे हैं और उन्हें पुलिस का कोई खौफ नहीं हैं। अकेले गाजियाबाद जिले की हिंडन पार की कालोनियों में हर रोज झपटमारी की दर्जनों घटनाएं हो रही हैं और अब पुलिस ने मामले दर्ज करना ही बंद कर दिया है। जिस गति से आबादी बढ़ी उसकी तुलना में पुलिस बल बेहद कम है। मौजूद बल का लगभग 40 प्रतिशत नेताओं व अन्य महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में व्यस्त है। खाकी को सफेद वर्दी पहना कर उन्हीं पर यातायात व्यवस्था का भी भार है। अदालत की पेशियां, अपराधों की तफ्तीश, आए रोज हो रहे दंगे, प्रदर्षनों को झेलना। कई बार तो पुलिस की बेबसी पर दया आने लगती है। हर महीने में तीन से चार बार तो मुख्यमंत्री गाजियाबाद में हिंडन हवाई अडडडे पर आते हैं और उनके लिए सुरक्षा, रास्ते बंद करने व सफाई करवाने मं ही सारा फोर्स लगा रहता है।
    मौजूदा पुलिस व्यवस्था वही है जिसे अंग्रेजों ने 1857 जैसी बगावत की पुनरावृत्ति रोकने के लिए तैयार किया था।  अंग्रेजों को बगैर तार्किक क्षमता वाले आततायियों की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने इसे ऐसे रूप में विकसित किया कि पुलिस का नाम ही लोगों में भय का संचार करने को पर्याप्त हो। आजादी के बाद लोकतांत्रिक सरकारों ने पुलिस को कानून के मातहत जन-हितैषी संगठन बनाने की बातें तो कीं लेकिन इसमें संकल्पबद्धता कम और दिखावा ज्यादा रहा। वास्तव में राजनीतिक दलों को यह समझते देर नहीं लगी कि पुलिस उनके निजी हितों के पोषण में कारगर सहायक हो सकती है और उन्होंने सत्तासीन पार्टी के लिए इसका भरपूर दुरुपयोग किया। परिणामतः आम जनता व पुलिस में अविश्वास की खाई बढ़ती चली गयी और समाज में असुरक्षा और अराजकता का माहौल बन गया।
    शुरू-शुरू में राजनैतिक हस्तक्षेप का प्रतिरोध भी हुआ। थाना प्रभारियों ने विधायकों व मंत्रियों से सीधे भिड़ने का साहस दिखाया पर जब ऊपर के लोगों ने स्वार्थवश हथियार डाल दिये तब उन्होंने भी दो कदम आगे जाकर राजनेताओं को ही अपना असली आका बना लिया। अन्ततः इसकी परिणति पुलिस-नेता-अपराधी गठजोड़ में हुई जिससे आज पूरा समाज इतना त्रस्त है कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने पुलिस में कुछ ढांचागत सुधार तत्काल करने की सिफारिशें कर दीं। लेकिन लोकशाही का शायद यह दुर्भाग्य ही है कि अधिकांश राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को नजरअंदाज कर रही हैं। परिणति सामने है- पुलिस अपराध रोकने में असफल है।
    कानून व्यवस्था या वे कार्य जिनका सीधा सरोकार आम जन से होता है, उनमें थाना स्तर की ही मुख्य भूमिका होती है। लेकिन अब हमारे थाने बेहद कमजोर हो गए हैं। वहां बैठे पुलिसकर्मी आमतौर पर अन्य किसी सरकारी दफ्तर की तरह क्लर्क का ही काम करते हैं। थाने आमतौर पर शरीफ लोगों को भयभीत और अपराधियों को निरंकुश बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज जरूरत है कि थाने संचार और परिवहन व अन्य अत्याधुनिक तकनीकों से लैस हो। बदलती परिस्थितियों के अनुसार थानों के सशक्तीकरण महति है। आज अपराधी थानें में घुस कर हत्या तक करने में नहीं डरते। कभी थाने उच्चाधिकारियों और शासन की प्रतिष्ठा की रक्षा के सीमावर्ती किलों की भांति हुआ करते थे। जब ये किले कमजोर हो गये तो अराजक तत्वों का दुस्साहस इतना बढ़ गया कि वे जिला पुलिस अधीक्षक से मारपीट और पुलिस महानिदेशक की गाड़ी तक को रोकने से नहीं डरते हैं।
    रही बची कसर जगह-जगह अस्वीकृत चौकियों, पुलिस सहायता बूथों, पिकेटों आदि की स्थापना ने पूरी कर दी है। इससे पुलिस-शक्ति के भारी बिखराव ने भी थानों को कमजोर किया है। थानों में ”स्ट्राइकिंग फोर्स“ नाममात्र की बचती है। इससे किसी समस्या के उत्पन्न होने पर वे त्वरित प्रभावी कार्यवाही नहीं कर पाते हैं । तभी पुलिस थानों के करीब अपराध करने में अब अपराधी कतई नहीं घबराते हैं।
    पुलिस सुधारों में अपराध नियंत्रण, घटित अपराधों की विवेचना और दर्ज मुकदमें को अदालत तक ले जाने के लिए अलग-अलग  विभाग घटित करने की भी बात है।  सनद रहे अभी ये तीनों काम एक ही पुलिस बल के पास है, तभी आज थाने का एक चौथाई स्टाफ हर रोज अदालत के चक्कर लगाता रहता है। नियमित पेट्रोलिंग लगभग ना के बराबर है। यह भी एक दुखद हकीकत है कि पुलिस को गष्त के लिए पेट्रोल बहुत कम या नहीं मिलता है। पुलिसकर्मी अपने स्तर पर इंधन जुटाते हैं, जाहिर है कि इसके लिए गैरकानूनी तरीकों का सहारा लेना ही पड़ता ।
    सुप्रीम कोर्ट भी इस बारे में निर्देश दे चुका हैं, लेकिन देश का नेता पुलिस का उपनिवेशिक चेहरे को बदलने में अपना नुकसान महसूस करता है। तभी विवेचना और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग-अलग एजेंसियों की व्यवस्था पर सरकार सहमत नहीं हो पा रही है ।  वे नहीं चाहते हैं कि थाना प्रभारी जैसे पदों पर बहाली व तबादलों को समयबद्ध किया जाए।  इसी का परिणाम है कि दिल्ली एनसीआर में अपराधी पुलिस की कमजोरियों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं।
    पुलिस की मौजूदा व्यवस्था इन कारकों के प्रति कतई संवेदनषील नहीं है। वह तो डंडे और अपराध हो जाने के बाद अपराधी को पकड़ कर जेल भेजने की सदियों पुरानी नीति पर ही चल रही है। आज जिस तरह समाज बदल रहा है, उसमें संवेदना और आर्थिक सरोकार प्रधान होते जा रहे हैं, ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी, कार्य प्रणाली व चेहरा सभी कुछ बदलना जरूरी है।आज जरूरत डंडे का दवाब बढ़ाने की नहीं है, सुरक्षा एजेंसियों को समय के साथ आधुनिक बनाने की है।

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