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    Home»खेल

    हिन्दी कमेंट्री: गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा

    By February 3, 2019 खेल No Comments4 Mins Read
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    वालाजा रोड एंड से कपिल देव ने गेंदबाजी का मोर्चा संभाला है। आज सुबह भारत ने टॉस जीता और पिच के मिजाज को भांपकर पहले क्षेत्ररक्षण करने का फैसला किया…मौसम क्रिकेट के लिए मुफीद और मैदान दर्शकों से खचाखच भरा हुआ….मैं सुशील दोषी अपने साथी कमेंटेटर जसदेव सिंह और मुरली मनोहर मंजुल के साथ सभी श्रोताओं का स्वागत करता हूं…।
    अस्सी के दशक में रेडियो की हिन्दी कमेंट्री में इस तिकड़ी की जादुई आवाज मुझे बेहद रोमांचित करती थी। इनमें मैं रवि चतुर्वेदी का नाम भी जोड़ना चाहूंगा। मैं इन सभी के आवाज की दुनिया में खोया रहता था। घर से निकलता था स्कूल के लिए लेकिन रूक जाता था किसी पान की दुकान पर। रेडियो का आकर्षण मेरे कदम थाम लेते थे। यह सिलसिला गुजरते वक्त के साथ परवान चढ़ता गया। पहले स्कूल, फिर कॉलेज तक रेडियो कमेंट्री सुनना मेरी आदत में शामिल हो गया। यह भी सच है कि क्रिकेट की बारीक समझ मुझे हिन्दी कमेंट्री लगातार सुनते रहने की वजह से ही मिली।
    वैसे तब एक दिनी क्रिकेट का आगाज हो चुका था, लेकिन यह खेल आज जितना पेशेवर नहीं था। लोग असली क्रिकेट के ही दीवाने थे। यानि टेस्ट मैच। पांच दिन का क्रिकेट। आज की तुलना में तब टेस्ट मैच कम होते थे। साल में चार या पांच। लेकिन होते जोरदार थे। बीस मेंडेटरी ओवर तक मैच चलते थे। शायद इस वजह से भी स्टेडियम खचाखच भरे रहते थे। टिकटों के लिए मारामारी रहती थी।
    कोलकाता के इडन गार्डन्स का ही जिक्र करें तो यहां एक लाख दर्शक मैदान के भीतर मैच देखते थे तो शायद इतने ही मैदान के बाहर रेडियो से चिपके रहते थे। यही हॉल मुंबई (तब बंबई) के वानखेड़े स्टेडियम और चेन्नई के चेपॉक स्टेडियम का भी रहता था।
    टेस्ट मैचों में दर्शकों की भीड़ तब सामान्य बात थी। आज जैसे हालात नहीं थे। उस दौर में हिंदी कमेंट्री खास मुकाम हासिल कर चुकी थी। एक बात का मैं जिक्र करना चाहूंगा, मुझे कमेंट्री सुनकर ऐसा महसूस होता था कि मैं भी मैदान के आसपास ही हूं, और मैच देख रहा हूं। मैं शादी के बाद पहली बार कोलकाता गया, लेकिन जब मैंने हावड़ा ब्रिज और हुगली नदी से सटे इडन गार्डन्स को करीब से देखा तो यही महसूस हुआ कि मैं यहां अकसर आता रहा हूं। हावड़ा ब्रिज के बाद इडन गार्डन्स के पास से दक्षिण कोलकाता की तरफ जब-जब रुख करता हूं तो यही लगता है, यहां से मेरा पुराना नाता है। शायद इस वजह से क्योंकि हिन्दी कमेंट्री के जरिये मैदान के आसपास का खाका बचपन से ही मेरे जेहन में एक शक्ल अख्तियार कर चुका था।
    जाड़े के इन दिनों में टेस्ट मैच होते थे और मैं खोया रहता था, हिन्दी कमेंट्री में। बीच-बीच में एक्सपर्ट कमेंटेटर के तौर पर लाला अमरनाथ भी होते थे। मैच पर उनका आकलन लाजवाब था। असल में हिन्दी कमेंट्री ही नहीं क्रिकेट का असली मजा उस दौर में ही था।
    भारत-पाकिस्तान की सीरीज के क्या कहने, रेडियो से दिनभर कान गड़ाए रहता था। कॉलेज बंक करके रोडियो की रनिंग कमेंट्री सुनता था।
    हिन्दी कमेंट्री के हसीन दौर की यादों को लिखने की जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि रनिंग कमेंट्री का चलन अब खत्म हो चुका है।
    टेलीविजन में लाइव कमेंट्री सुनना सुखद अनुभूति का अहसास नहीं कराता है। शायद इसका हसीन दौर भी खत्म हो गया है। चैनल नाइन से लम्बे समय तक जुड़े रहे टोनी ग्रेग, रिची बेनो को सुनने में अच्छा लगता था। विंडीज क्रिकेट के जानकार मार्क निकोलस भी कम नहीं थे। भारतीय उपमहाद्वीप की अगर बात करें तो गावस्कर, हर्ष भोगले, रमीज राजा, वसीम अकरम, रवि शास्त्री (भारतीय टीम का कोच बनने से पहले) ने मंजे हुए कमेंटेटर की भूमिका निभाई।
    लेकिन अब सब कुछ थम सा गया है लगता है। भारतीय क्रिकेट टीम इन दिनों न्यूजीलैंड के दौरे पर है। इससे पहले टीम ने आस्ट्रेलिया में अच्छे दिनों की याद दिलाई। कुछ को छोड़ दें तो टेस्ट मैचों और वन डे में टीवी कमेंट्री सुनकर बेहद निराशा हुई। मुझे लगता है यह एक खास विधा है और इसमें खास लोगों की ही जरूरत है…मैं तो यही कहूंगा गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा।
    – सुफल भट्टाचार्य की वॉल से

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