संस्मरण: उपेंद्र नाथ राय
साइकिल छोड़ खेत से भागे थे पिता जी, थानेदार भी करते रहे ताज्जूब: आस्था में कहीं तर्क-वितर्क का स्थान नहीं होता। भक्ति जब चढ़ कर बोलने लगती है तो वह एक नशा की तरह अपने वश में कर लेती है। मीरा की भक्ति को तो सब जानते हैं। कुछ इसी तरह की भक्ति, दिल में जज्बा था 1990 में रामभक्तों में। राम के काम बिना मोही कहां विश्राम, उसमें न कोई स्वार्थ था, न ही उसके बदले कुछ पानी की उतकंठा। सिर्फ और सिर्फ भक्ति थी, लोगों के जेहन में, जिसे सरकारी जेल की दीवारें भी नहीं रोक संकी। कारवां बढ़ता ही गया और तत्कालीन सीएम का अहम टूट गया, जो उन्होंने कह रखा था कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता। उसी समय पिता जी जब जेल की चहारदीवारी फांदकर घर आये थे, उसी समय ईदगाह टूट गयी और आगे—–
गाजीपुर के पीजी कालेज में बनी अस्थायी जेल में पिता जी, मनोज सिन्हा जी सहित तमाम लोग बंद थे। वहीं हर हरी कीर्तन चलता रहता था। इस बीच घर से भी कुछ लोग नास्ता वगैरह ले जाकर दे देते थे। अस्थायी जेल एक तरह से कहें तो सिर्फ बंदी की औपचारिकता मात्र थी, क्योंकि पहरेदारों से ज्यादा तो बंदी वहां पर ताकतवर थे, ज्यादा संख्या में भी थे।
उसमें कुछ लोग खैनी, बीड़ी, सिगरेट, गांजा वाले भी लोग थे। (अमूमन हर जगह कुछ संख्या रहती ही है।) उनका नशा आदि समाप्त हो चुका था। इस कारण पिता जी वहां से गांव आए, नशा-पत्ति ले जाने। अभी शाम को आये ही थे कि हमारे गांव के बगल में सोनाड़ी कि ईदगाह उसी रात को टूट गयी। पिता जी सुबह साइकिल से रा मैटेरियल झोले में रखकर ले जा रहे थे। ईदगाह पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात थी। वहां लोग भी काफी संख्या में थे। इसी बीच दूर से ही किसी ने दिखा दिया कि इन्होंने ही तोड़वाया है। उस समय कोई मिश्रा जी भावरकोल के एसओ थे।
उन्होंने दूर से ही बोला। इसके बाद तो पिता जी साइकिल छोड़कर ही खेत में ही फुरुगुद्दी (तेज दौड़) हो गये। बहुत दूर बाद मिश्रा जी ने बोला, राय साहब रूक जाइए। इसके बाद पिता जी रूके, फिर पुलिस पकड़कर थाने ले गयी लेकिन पुलिस इस कारण भी कोई धारा नहीं लगा सकती कि जेल से भागे व्यक्ति का 24 घंटे बाद भी क्यों नहीं सूचना दी गयी। इसके बाद पुलिस ने अपनी ही कस्टडी में उन्हें गाजीपुर पहुंचाया। इधर पूरे इलाके में यह होता रहा कि केशव राय ने ईदगाह को तोड़वा दिया। पिता जी बताते हैं कि उस समय एसओ यही कहते रहे कि आप हमने अंडर ग्राउंड के समय बहुत पकड़ने की कोशिश की लेकिन आप हाथ नहीं लग पाये।
खैर, उसकी गहराइयों में नहीं जाना चाहते, लेकिन वह मंजर आज भी याद है कि उधर पिता जी के पकड़ने की बात ज्योहि गांव में आयी। सब लोग थाने पर पता लगाने लगे। जब पिता जी गाजीपुर पहुंचा दिये गये तो लोगों ने राहत की सांस ली।







