हमें चाहिए नए जमाने के शिक्षक

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  • पंकज चतुर्वेदी

कोरोना संकट के दौरान स्कूली शिक्षा को लेकर भारत में एक नई बहस खड़ी हुई- क्या डिजिटल प्लेटफार्म की कक्षाएं, आस्तविक क्लासरूम का विकल्प हो सकती हैं? अब इसे मजबूरी समझें या अनिवार्यता कोरोना से बचाव के एकमात्र उपाय – ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ के साथ यदि बच्चों को पढ़ाई से जोड़ कर रखना है तो फिलहाल घर बैठे मोबाईल या कंप्यूटर पर कक्षाएं ही विकल्प हैं। नई शिक्षा नीति के दस्तावेज में तो कम व्यय में अधिक छात्रों तक प्रभावी तरीके से पहुंचने के लिए ई लर्निंग पर अधिक जोर दिया गया है। उधर दिल्ली से सटे महानगर नोएडा के सरकार स्कूलों में 42 ऐसे शिक्षक हैं जिन्हें दो बार प्रशिक्षण दिया लेकिन वे अभी भी आनलाईन नहीं पढ़ा पा रहे हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि पढ़ाने का यह नया अंदाज फिलहाल शहरी, सक्षम आर्थिक स्थिति वाले और अधिकांश निजी विद्यालय के बच्चों तक ही सीमित है, लेकिन बारिकी से गौर करें तो यह भविष्य के विद्यालय की परिकल्पना भी है। दूरस्थ अंचलों तक पाठशाला भवन बनवाने, वहां शिक्षकों की नियमित हाजिरी सुनिश्चित करने, स्कल भवनों में मूलभूत सुविधांए एकत्र करने, हमारे देश के विशम मौसमी हालातों में स्कूल संचालित करने जैसी कई चुनौतियों को जोड़ लें तो एक बच्चे तक गजट पहुंचाने और उसकी मनमर्जी की जगह पर बैठ कर सीखने की प्रक्रिया पूरी करने का कार्य ना केवल प्रभावी लगता है, बल्कि आर्थिक रूप से भी कम खर्चीला है।

जिस देश में मोबाईल कनेक्शन की संख्या देश की कुल आबादी के लगभग करीब पहुंच रही हो, जहां किशोर ही नहीं 12 साल के बच्चे के लिए मोबाईल स्कूली-बस्ते की तरह अनिवार्य बनता जा रहा है, वहां बच्चों को डिजिटल साक्षरता, जिज्ञासा, सृजनशीलता, पहल और सामाजिक कौशलों की ज़रूरत है। हालांकि यह भी सच है कि स्कूल में बच्चों को मोबाईल का इस्तेमाल शिक्षा के रास्ते में बाधक माना जाता है, परिवार भी बच्चों को अनचाहे तरीके से कड़ी निगरानी (जहां तक संभव हो) के बीच मोबाईल थमाते हैं। वास्तविकता यह है कि सस्ते डाटा के साथ हाथों में बढ़ रहे मोबाईल का सही तरीके से इस्तेमाल खुद को शिक्षक कहने वालों के लिए एक खतरा सरीखा है। हमारे यहां बच्चों को मोबाईल के सटीक इस्तेमाल का कोई पाठ किताबांें में हैं ही नहीं।

भारत में शिक्षा का अधिकार व कई अन्य कानूनों के जरिये बच्चों के स्कूल में पंजीयन का आंकड़ा और साक्षरता दर में वृद्धि निश्चित ही उत्साहवर्धक है लेकिन जब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात आती है तो यह आंकड़ा हमें शर्माने को मजबूर करता है कि हमारे यहां आज भी 10 लाख शिक्षकों की कमी है। यदि इस नई फौज का प्रशिक्षण महज दूरस्थ शिक्षा के लिए किया जाए तो देश में प्राथमिक शिक्षा की तस्वीर को बदला जा सकता है।

आज स्कूली बच्चे को मिडडे मील लेना हो या फिर वजीफा हर जगह डिजिटल साक्षरता की जरूरत महसूस हो रही है। हम पुस्तकों में पढ़ाते हैं कि गाय रंभाती है या शेर दहाड़ता है। कोई भी शिक्षक यह सब अब मोबाईल पर सहजता से बच्चों को दिखा कर अपने पाठ को कम शब्दों में सहजता से समझा सकता है। मोबाईल पर सर्च इंजन का इस्तेमाल, वेबसाईट पर उपलब्ध सामग्री में यह चीन्हना कि कौन सी पुष्ट-तथ्य वाली नहीं है, अपने पाठ में पढ़ाए जा रहे स्थान, ध्वनि, रंग , आकृति को तलाशना व बूझना प्राथमिक शिक्षा में शमिल होना चाहिए। किसी दृश्य को चित्र या वीडिया के रूप में सुरक्षित रखना एक कला के साथ-साथ सतर्कता का भी पाठ है। मैंने अपने रास्ते में कठफोडवा देखा, यह जंगल महकमे के लिए सूचना हो सकती है कि हमारे यहां यह पक्षी भी आ गया है। साथ ही आवाजों को रिकार्ड करना, भी महत्वूपर्ण कार्य है।

दुखद है कि जब डिजिटल गजेट्स हमारे लेन-देन, व्यापार, परिवहन, यहां तक कि अपनी पहचान के लिए अनिवार्य होते जा रहे हैं हम बच्चों को वहीं घिसे-पिटे विषयों पर ना केवल पढ़ा रहे हैं, बल्कि रटवा रहे हैं। हाथ व समाज में गहरे तक घुस गए मोबाईल का इस्तेमाल छोटेपन से ही सही तरीके से ना सिखा पाने का ही कुपरिणाम है कि बच्चे पोर्न, अपराध देखने के लिए इस ज्ञान के भंडार का इस्तेमाल कर रहे हैं। यूट्यूब ऐसे वीडियो से पटी पड़ी है जिनमें सुदूर गांव-देहात में किन्हीं लड़के-लड़कियों के मिलन के दृश्य होते हैं। काश अपने पाठ के एक हिस्से से संबंधित फिल्म बनाने जैसा कोई अभ्यास इन बच्चों के सामने होता तो वे काले अक्ष्रों में छपी अपनी पाठ्य पुस्तक को दृश्य-श्रव्य से सहजता से प्रस्तुत करते। जान लें इस यंत्र को जागरूकता के लिए इस्तेमाल करने का प्रारंभ स्कूली स्तर से ही होना है।

हमारे शिक्षक आज भी बीएड, एलटी या बीएलएड पाठ्यक्रम को उर्त्तीण कर आ रहे है जहां कागज के चार्ट, थर्माकोल के मॉडल या बेकार पड़ी माचिस, आईसक्रीम की डंडी से कुछ बना कर बच्चों को विषय समझाने की प्रक्रिया से गुणवत्ता का निर्धारण होता है। रंग और परिकल्पना के क्षेत्र में वैचारिक रूप से कंगाल हो रहे बच्चों को नकल या नदी-झोपड़ी-पहाड़ वाली सीनरी खींचने से उबारने के लिए शिक्षकों को नई तकनीक का सहारा लेना होगा। एक मोटा अनुमान है कि अभी हमें ऐसे कोई साढ़े छह लाख शिक्षक चाहिए जो कि सूचना-विस्फोट के युग में तेजी से किशोर हो रहे बच्चों में शिक्षा की उदासी व उबासी दूर कर, नए तरीके से, नई दुनिया की समझ विकसित करने में सहायक हों। यह भी कुटु सत्य है कि अभी इस तरह का कोई पाठ्यक्रम शिक्षकों के लिए ही उपलब्ध नहीं है, तो बच्चों की बात कौन करे।

किसी सुदूर गांव के ऐसे विद्यालय का गंभीरता से आकलन करें तो पाएंगे कि वहां की शिक्षा व्यवस्था की धुरी पाठ् पुस्तक है। बिल्कुल हमारी व्यवस्था को औपनिवेषिक चरित्र प्रदान करती एक किताब । इस किताब से उपजते हैं भय- बच्चे का भय कम अंक लाने का और शिक्षक का भय अच्छा रिजल्ट ना आने का। शिक्षक भी अनमने मन से उसे पढ़ाता है क्यों कि उसे तो किताब पूरी तरह रट गई है, उसका कोई रस या आनंद बचा नहीं है।

बच्चे का अपना विस्तारित अनुभव जगत, बच्चे का ज्ञान, बच्चे के अपने अनुभव उन सबका यहां ना तो कोई अर्थ है ना ही कदर। ऐसे में डिजिटल साक्षरता के उद्देश्य से किए गए कुछ प्रयोग बच्चों को हर दिन कुछ नया करने के उत्साह में स्कूल की ओर खींच लाएंगे।

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