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    Home»इंडिया

    उपचुनाव में सपा की हार: अस्तित्व बचाने के लिए अखिलेश को निकलना होगा बाहर

    ShagunBy ShagunJune 26, 2022 इंडिया No Comments6 Mins Read
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    त्वरित टिप्पणी: उपेन्द्र नाथ राय

    एक ऐसी पार्टी, जिसके पास 80 लोक सभा सीटों में बसपा से गठबंधन के बावजूद पांच सीटें थी। उसमें भी उप चुनाव में दो सीटें खोने का डर था। इसके बावजूद पार्टी मुखिया का किसी लोकसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार करने न जाना। यहां तक कि जिसको उन्होंने खुद छोड़ा, उनके घर की सीट मानी जाती रही है, वहां भी एक बार भी नहीं पहुंचे। इसको तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि उप्र में समाजवादी पार्टी की हार सिर्फ अखिलेश यादव के अहम की हार है।

    इस उप चुनाव में यह भी देखने को पहली बार ही मिला कि सत्ता पक्ष इन दो सीटों को जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है और जिसके साथ अस्तित्व बचाने का सवाल है, वह आराम फरमा रहा है। शायद अखिलेश यादव इसी ख्याल में रह गये कि आजमगढ़ में मुस्लिम और यादव मिलकर पचास फीसदी मतदाता हैं,जो समाजवादी पार्टी से इतर नहीं जा सकते। वहीं रामपुर में सिर्फ मुसलमान 50 फीसदी से ज्यादा मतदाता हैं। ऐसे में अखिलेश यादव इस गर्व में बैठे रहे कि इस माहौल में मुसलमान और यादव के बीच भाजपा अपनी पैठ कत्तई नहीं बना सकती।

    वहीं दूसरी तरफ भाजपा ने रामपुर और आजमगढ़ की सीट को जीतने के लिए पूरा जोर लगा दिया। स्वयं योगी आदित्यनाथ इन दोनों सीटों के लिए प्रचार अभियान में लगे रहे। आखिर जनता के मूड को तो कोई भाप नहीं सकता। विशेषकर आजमगढ़ को देखा जाय तो जहां स्वयं दो बार लोकसभा चुनाव अखिलेश यादव जीते हैं। उन्होंने खुद इस सीट को खाली किया था और वहां पर एक बार भी चुनाव में न जाना शायद आम जन को खल गया। कुछ लोगों को यह भी लगा कि अखिलेश यादव की इस चुनाव में दिलचस्पी नहीं है और वे स्वयं धर्मेंद यादव की जीत देखना नहीं चाहते।

    उधर अखिलेश यादव के इस बर्ताव से धीरे-धीरे धारणा बनती जा रही है कि अखिलेश यादव एसी में बैठकर राजनीति करने वालों में प्रमुख हैं। बसपा प्रमुख मायावती की तरह वे भी मैदान में नहीं जाना चाहते, जबकि सपा हमेशा लड़ाकू पार्टी के रूप में जानी जाती रही है। यहां तक कि सत्ता में रहते हुए भी मुलायम सिंह यादव के इशारे पर समाजवादियों ने प्रेस के खिलाफ हल्ला बोल दिया था और उप्र के एक बड़े अखबार के दफ्तरों में जमकर तोड़फोड़ की थी। राजनीतिक विश्लेष्कों की मानें तो अखिलेश यादव का आगे का रास्ता और कठिन होने जा रहा है। यदि उप्र की राजनीति में उनको अपनी पकड़ मजबूत करनी है तो उन्हें अपने पुराने ढर्रे पर आना होगा।

    रामपुर में वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर इस लोकसभा सीट पर 50.57 फीसदी आबादी मुस्लिम मतदाताओं की है। 45.97 फीसदी हिंदुओं की जनसंख्या है। इस चुनाव में भाजपा की जीत ने यह तय कर दिया है कि मुस्लिम मतदाताओं ने भी भाजपा उम्मीदवार घनश्याम लोधी को मत दिया। रामपुर की सीट आजम खान का गढ़ माना जाता है। उन्होंने इस बार भी खुद प्रत्याशी की घोषणा कर पार्टी पर अपने वर्चस्व बरकार रहने की जनता में मैसेज दिया था। वे चुनाव में सपा उम्मीदवार के प्रचार में जुटे भी रहे। जनता के बीच अपनी जेल प्रताड़ना का उल्लेख कर सहानुभूति बटोरने का प्रयास भी करते रहे लेकिन जनता ने नकार दिया।

    रामपुर लोकसभा सीट को देखें तो यहां से वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी जीते थे। यहां से इस बार आजम खान के एक साथी घनश्याम लोधी को उतार दिया था। कभी घनश्याम लोधी को आजम खान के नजदीकी लोगों में गिनती होती थी। इस कारण वे आजम खान के एक-एक कार्य से वाकिफ थे। किस दाव का प्रयोग आजम खान कहां करते हैं, इसको ध्यान में रखकर रामपुर में अपने चुनावी प्रचार की शुरूआत की और विकास का वादा करते हुए आज के दिन विजयी हुए।

    वहीं आजमगढ़ को अखिलेश-मुलायम का गढ़ माना जाता है। 2019 लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ से अखिलेश यादव जीते थे। वहीं, 2014 में मुलायम सिंह यादव यहां से सांसद चुने गए थे। उधर, 2019 के लोकसभा चुनाव में आजम खां रामपुर में सांसद बने थे। अब ये दोनों सीटें भाजपा के खाते में चली गई हैं।

    आजगढ़ उपचुनाव में भाजपा ने मशहूर भोजपुरी गायक दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ पर एक बार फिर भरोसा जताया। 2019 में भी निरहुआ इस सीट से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए थे। तब सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें हराया था। इस बार धर्मेंद्र को हराकर निरहुआ ने हार का बदला ले लिया।

    आजमगढ़ लोकसभा सीट के तहत मेंहनगर, आजमगढ़ सदर, मुबारकपुर, सगड़ी और गोपालपुर विधानसभा सीटें आती हैं। यहां यादव और मुस्लिम वोटर्स की संख्या सबसे ज्यादा है। दलित और कुर्मी वोटर्स भी निर्णायक भूमिका में हैं। आमतौर पर यादव वोटर्स सपा के साथ जाते हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी स्थानीय स्तर पर निरहुआ जनता के बीच रहकर काम कर रहे थे। इसका फायदा उन्हें मिला और सपा के कोर वोटर्स भी भाजपा में शिफ्ट हो गए। वहीं, मुस्लिम वोट शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली और सपा के धर्मेंद्र यादव में बंट गए।

    रामपुर में सबसे ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। इसके बाद लोधी, सैनी और दलित मतदाताओं की संख्या भी काफी है। कहा जाता है कि घनश्याम लोधी इन जातियों पर अच्छी पकड़ रखते हैं। इसके अलावा अन्य ओबीसी और सामान्य वर्ग ने भी भाजपा का साथ दिया। चूंकि इस बार बसपा और कांग्रेस ने भी चुनाव नहीं लड़ा, इसलिए हिंदुओं का वोट भी एकजुट हो गया और लोगों ने भाजपा को समर्थन दे दिया। वहीं, कांग्रेस नेता और 2019 लोकसभा में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे नवाब काजिम अली खान ने भी भाजपा के समर्थन का एलान किया था। ऐसे में उनके समर्थक भी भाजपा के लिए प्रचार कर रहे थे।

    हार के कुछ अन्य कारणों पर नजर दौड़ाएं तो आजम खां और अखिलेश यादव के बीच मतभेद की खबरें खूब सामने आईं। इसके चलते दोनों के समर्थक भी कई बार खुलकर एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए दिखे। विधानसभा चुनाव के बाद आजम खां के समर्थकों ने आरोप लगाया कि यादव वोटर्स ने सपा को वोट ही नहीं दिया। वहीं, बुलडोजर व अन्य मामलों में मुस्लिमों का साथ न देने का भी आरोप सपा पर लगा। यूपी की राजनीति पर अच्छी पकड़ रखने वाले प्रो. अजय सिंह कहते हैं कि इसके चलते मुस्लिमों का सपा से मोह भंग हुआ। आजमगढ़ में मुस्लिमों ने बसपा के शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली पर ज्यादा भरोसा जताया। इसके चलते मुस्लिम वोट बंट गए। वहीं, निरहुआ पर यादव के साथ-साथ दलित और कुर्मी वोटर्स ने भी विश्वास जताया।

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बुलडोजर रूप यूपी समेत पूरे देश में छाया हुआ है। रामपुर और आजमगढ़ में भी इसका असर देखने को मिला। रामपुर में आजम खां के कई ठिकानों पर सरकार का बुलडोजर चला। वहीं, आजमगढ़ के कई अपराधियों पर यूपी पुलिस ने शिकंजा कसा। इसका सकारात्मक संदेश वोटर्स के बीच गया। इसके अलावा मुफ्त राशन, पीएम आवास योजना जैसी नीतियां भी भाजपा के लिए कारगर साबित हुईं।

    Shagun

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