साफ- सफाई रखना एक संस्‍कार है

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दक्षिणा पथ: रामधनी दिवेदी 
कई साल पहले की बात है-1998-99 की, तब मैं लखनऊ अमर उजाला में था। इलाहाबाद से बस से लखनऊ आ रहा था। रायबरेली के पास मेरी बस से कुछ यात्री उतरे तो मैंने अपने बगल की सीट पर  बैग रख दिया जिससे उसपर कोई बैठने न पाए। थोड़ी देर में ही एक मौलाना आए तो मैने सीट से बैग हटाया और उन्‍हें बैठने के लिए कहा।
उन्‍होने बैठते हुए शुक्रिया कहा। मैने कहा कि मैं सोच रहा था कि कोई भला व्‍यक्ति आए तो उसे सीट दूं। वह मुस्‍कराए और बोले कि शुक्रिया कि आपने मुझे भला समझा। मैं निरुत्‍तर था। इतमीनान से बैठने के बाद उन्‍होंने अपनी शेरवानी की ऊपरी जेब से इत्र की शीशियां निकालीं और मेरे हाथ और कपड़े पर लगाते हुए बोले कि जब तक इसकी सुगंध रहेगी, आप मुझे याद रखेंगे।
इत्र की सुगंध तो कुछ घंटे रही लेकिन उनकी एक बात मुझे अब तक याद है और आज उसी के लिए  उनका उल्‍लेख कर रहा हूं। उन्‍होंने बताया कि वह हैदराबाद से हैं और अली मियां को देखने आए हैं। दोनों उस्‍ताद भाई हैं। महान इस्‍लामिक विद्वान अली मियां उन दिनों अस्‍वस्‍थ थे।
 बस जब रायबरेली शहर के बाहर निकली तो सड़क के दोनों ओर कूड़े के ढेर देख कर उन्‍होंने कहा- उत्‍तर में शहर बहुत गंदे हैं। कभी आप हैदराबाद आएं देखें कितने साफ शहर हैं,दख्‍खन के। मुझे उनकी बात सुनकर बहुत झेंप लगी,लेकिन वह सच कह रहे थे। पिछले दिनों मुझे लगभग पूरे तमिलनाडु की ट्रेन और सड़क मार्ग से यात्रा करने का अवसर मिला, तो मैने उत्‍तर और दक्षिण का अंतर देखा।
ट्रेन और सड़क से यात्रा करने पर स्‍थानीय शहरों के बारे में बहुत कुछ पता चल जाता है। बड़े शहरों को तो छोडि़ए तमिलनाडु के छोटे शहर भी उत्‍तर की तुलना में काफी साफ-सुथरे हैं। कहीं भी सड़क के किनारे मुझे कूड़े के ढेर नहीं दिखे। रामनाथपुरम की कुछ घने बाजार से भी हम गुजरे लेकिन वे भी अपेक्षाकृत साफ दिखे।चेन्‍नई से तिरुपति जाते समय भी सड़क के किनारे गंदगी नहीं के बराबर दिखी। तिरुपति की सफाई तो कहने ही क्‍या।  किसी शहर या राज्‍य की साफ-सफाई सभी के मन पर अनुकूल प्रभाव छोड़ती है। जब प्रधानमंत्री मोदी ने देश में सफाई अभियान की शुरूआत की और खुले में शौच से मुक्‍त कराने का अभियान चलाया तो उनके मन में देशी और विदेशी पर्यटकों के मन पर गंदगी को लेकर पड़ने वाले प्रभाव ही प्रमुख रूप से था। वह देश में पर्यटन की प्रचुर संभावनाओं को देखते हैं लेकिन गंदगी पर्यटकों के मन को खिन्‍न कर देती है।
स्‍टेशनों की गंदगी भी पर्यटकों के मन में अरुचि जगाने का कारण होती है। मैने बनारस के कैंट स्‍टेशन पर गंदगी के कारण जापानी पर्यटकों को मुंह बिचकाए और आज से 20 साल पहले मॉस्‍क लगाए देखा जबकि उस समय कोविड 19 जैसी कोई बात नहीं थी। लेकिन जब उनके साथ चल रहे एक भारतीय ने जामुन खा कर बीज प्‍लेटफार्म पर फेंक दिए तो एक जापानी से उसे डठा कर अपने साथ लिए पॉलिथिन में रख लिया और आगे जाकर उसे कूड़ादान में फेंका। पता नहीं उस भारतीय को शर्म आई कि नहीं।  दशाश्‍वमेध घाट पर पर्यटक साड़ों, साधुओं,भिखारियों के साथ गंदगी की फोटो भी खींचते मिलेंगे। लेकिन धीरे-धीरे ही सही स्थिति बदल रही है। अब उत्‍तर भारत के स्‍टेशन भी साफ सुथरे दिखने लगे हैं। लेकिन दक्षिण अब भी बेहतर हैं।
दिल्‍ली के रहने वालों के लिए चेन्‍नई और तमिलनाडु के अन्‍य शहर स्‍वर्ग की तरह हैं। न प्रदूषण की समस्‍या और न ही आंधी, फॉग और स्‍मॉग की समस्‍या। साफ सुथरी हवा में सांस के रोगी तो बिना दवा ही ठीक हो जांए। मौसम भी हमेशा लगभग एक सा रहने वाला। दिसंबर जनवरी की बारिश भी ठंड नहीं बढ़ाती जब कि उत्‍तर भारत में बारिश हो तो लोग ठंड से जम जाते हैं। उत्‍तर का व्‍यकि्त यदि वहां जाए तो वहीं बस जाए। समुद्र के किनारे होने के कारण अक्‍सर हवा का बहाव तेज रहता है जो छोटे-मोटे प्रदूषण को अपने साथ बहा कर ले जाता है।
जब हम चेन्‍नई पहुंचे तो पानी बरस रहा था और सड़कों पर पानी था। हवाई अड्डे आने वाली सड़क पर लंबा जाम भी लगा था। लेकिन सड़कों पर गंदगी का नामो-निशान नहीं था। दूसरे दिन हम लोग सुबह पोंडी बाजार में टहलने गए तो वह पूरी तरह साफ दिखा। पार्क भी बेहतर मेंटेंन्‍ड थे। पोंडी बाजार तो चेन्‍नई का कनाट प्‍लेस है लेकिन उसकी तुलना में अधिक साफ और खुला हुआ।
सड़क के किनारे फुटपाथ इतने चौड़े की चाहे जितने लोग जुट जांए,भीड़ और धक्‍का- मुक्‍की जैसा कुछ नहीं। बाजार में सड़क के किनारे कारें नहीं के बराबर। सब बहुमंजिली पार्किंग में व्‍यवस्थित। उस तुलना में मदुरै कुछ अव्‍यवस्थित लगा और एक बाजार की सड़क से गुजरते समय टूटी सड़क और उसमें भरा पानी भी दिखा,अन्‍यथा कहीं भी असहज करने वाली चीजें नहीं दिखीं।
कन्‍या कुमारी और रामेश्‍वरम तक साफ सुथरे। सिर्फ रामेश्‍वरम में समुद्र तट पर थोड़ी गंदगी दिखी और गायों के गोबर की सड़ांध महसूस हुई। उसका कारण भी यह था कि वहां धार्मिक वृत्ति के लोग गायों को हरा चारा खिला रहे थे और इस कारण दर्जनभर से अधिक गायें वहां विचर रहीं थीं और गोबर कर रहीं थी। गायों का हरा चारा बेचने वाले भी अच्‍छा धंधा कर रहे थे तो वे गायों को कैसे भगाएं। दस रुपये का एक बंडल पेड़ की पत्तियों बेच रहे थे। एक गाय को खिलाओ तो सभी जुट जातीं फिर सब खाने के बाद ही हटतीं। साइकिल पर चारा रखकर बेचने वाले का भी चारा बिक जाता।
हम लोगों को ट्रेन से एक जनवरी 2022 को  कन्‍याकुमारी जाना था। ट्रेन का टिकट, कन्‍याकुमारी और रामेश्‍वरम में होटल पहले से ही बुक करा रखे थे चंद्रशेखर ने। कन्‍याकुमारी में ही तीन दिन के लिए कैब भी बुक थी। इसलिए यात्रा सुगम रही और हम लोग वहां के दृश्‍य देखने में ही व्‍यस्‍त रहे। चेन्‍नई से चलने के लिए जब हम लोग एगमोर स्‍टेशन पर पहुंचे तो कहीं जाम में नहीं फंसे और समय से पहले ही स्‍टेशन पहुंच गए। स्‍टेशन छोटा ही था लेकिन उसकी सफाई ने मन मोह लिया।
कहीं गंदगी का नामोनिशान नहीं। कुछ सफाई कर्मी महिलाएं रेलवे लाइन और प्‍लेटफार्म पर लगातार पंजा और कूड़े की बाल्‍टी लिए टहलती नजर आईं और जो भी कूड़ा दिखता, उसे उठा लेतीं। लोग आदत से बाज कम ही आते हैं इसलिए रेल लाइन और प्‍लेटफार्म पर कुछ न कुछ फेंक ही देते हैं। ट्रेन गुजरने के बाद तो पटरी से कूड़ा अनिवार्यरूप से बीना जा रहा था।यही हाल मदुरै स्‍टेशन का भी था। वहां का रेस्‍टरूम तो स्‍टार्ड होटल की लॉबी की तरह साफ सुथरा था। सफाई देखकर दिव्‍या ने कहा भी कि दिल्‍ली के प्‍लेटफार्म इसके सामने कुछ नहीं। एक बार वह अपनी सहेली को रिसीव करने गई थी तो जितनी देर वह प्‍लेटफार्म पर रहीं बदबू से सिर फटा जा रहा था।
ट्रेन जब चली तो ट्रेन के किनारे के मकान और उनकी सफाई देख लोगों की सुरुचि का संकेत मिलता था। स्‍टेशन के किनारे रहने वाले लोग अमूमन अधिक आयवर्ग के नहीं होते लेकिन जब तक ट्रेन से दिखा,अच्‍छे साफ- सुथरे मकान लोगों की संपन्‍नता और सफाई की गवाही दे रहे थे। साफ-सफाई सीधे शिक्षा और आर्थिक स्थिति से जुड़ी होती है। जो समाज जितना अधिक शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्‍न होता है,वह स्‍वत: साफ सुथरा रहने की प्रवृत्ति विकसित कर लेता है। दक्षिण के राज्‍यों के साथ यही है। मैने तमिलनाडु और आंध्र में तो यही देखा।
तमिलनाडु की प्रतिव्‍यक्ति आय यूपी से कहीं बहुत अधिक है। यही हाल शिक्षा का है। सिर्फ दिल्‍ली ही प्रतिव्‍यक्ति आय में तमिलनाडु से बेहतर स्थिति में है। दिल्‍ली में भी जो इलाके अधिक संपन्‍न हैं,वे साफ सुथरे हैं और कम आयवर्ग वाले अपेक्षाकृत कम। आम आदमी की प्रवृत्ति होती है कि अपना घर तो साफ रखता है लेकिन कूड़ा पड़ोसी के घर की ओर कर देता है। जब तक हम पड़ोसी को भी साफ देखना नहीं शुरू करेंगे, सम्‍यक सफाई नहीं दिखेगी। मैने तो इंडिगो की फ्लाइट में देखा कि लोग नाश्‍ता करने के बाद कागज और अन्‍य कूड़ा नीचे फर्श पर फेंक दिए थे जबकि स्‍टाफ ने कई बार उनसे आग्रह कर उन्‍हें बटोरा था लेकिन कुछ न कुछ कूड़ा बाद में भी निकला।वास्‍तव में सफाई एक प्रवृत्ति है,संस्‍कार है जो अचानक नहीं आती।

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