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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    कांग्रेस स्थिर, भाजपा के बढ़ गये वोट

    ShagunBy ShagunJanuary 25, 2023Updated:January 25, 2023 Hot issue No Comments7 Mins Read
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    उपेन्द्र नाथ राय

    लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो गयी हैं। सभी दल उसके हिसाब से आगे बढ़ रहे हैं। लोकसभा चुनाव से पूर्व जिन नौ राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, उसमें लोकसभा की 116 सीटें आती हैं। नौ राज्यों में राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तलंगाना, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड, मिजोरम शामिल हैं। इस पर भाजपा और अन्य पार्टियां विशेष जोर दे रही हैं।

    हमें लोकसभा चुनाव से पूर्व वोटों के गणित को समझना चाहिए। इसकी गहराई में जाते हैं तो लोक सभा चुनावों में कांग्रेस के वोट प्रतिशत में कमी नहीं आयी। उसकी सीटों की संख्या कम हो गयी। भाजपा ने अपने वोटों की संख्या में काफी इजाफा कर दूसरों को काफी पीछे छोड़ दिया। इसको यूं भी कह सकते हैं बढ़ने वाले वोट भाजपा की तरफ चले गये और कांग्रेस के वोट वहीं के वहीं बने रह गये। 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में 364437294 वोट पड़े थे। इसमें कांग्रेस को 10, 3 120330 वोट मिले। वहीं भारतीय जनता पार्टी को 86, 562, 209 वोट मिले थे। बहुजन समाज पार्टी को 15,175,845 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी को 13717021 वोट मिले थे। उस समय तृणमुल कांग्रेस को .9 करोड़ वोट मिले थे। सबसे बड़ी बात है कांग्रेस को अधिक वोट मिलते हुए भी उसकी सीटों की संख्या 114 थी, वहीं भाजपा को उससे कम वोट मिले, लेकिन उसके सीटों की संख्या 182 हो गयी।

    लोकसभा चुनाव 2004 में भी कांग्रेस को 103408949 वोट मिले, लेकिन उसकी सीटों की संख्या में इजाफा हो गया और 114 से बढ़कर कांग्रेस 145 पर पहुंच गयी। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। उस समय भाजपा को 86371561 वोट मिले थे। उसकी सीटों की संख्या 138 सीटें हो गयी। बसपा को 20765229 वोट मिले और सीटों की संख्या 19 सीटें रहीं। वहीं सपा को 1.7 करोड़ वोट मिले, जबकि उसके सीटों की संख्या 36 थी। तृणमूल कांग्रेस को उस समय .8 करोड़ वोट मिले थे। उस समय कुल 39 करोड़ वोट पड़े थे।

    वहीं लोकसभा चुनाव 2009 की बात करें तो उस समय कांग्रेस ने किसानों का कर्ज माफ कर चुनाव मैदान में उतरी थी। किसानों की कर्ज माफी से पूर्व तक कांग्रेस का मैजिक खराब चल रहा था, उसी को ठीक करने के लिए कांग्रेस चुनाव से पूर्व कर्ज माफ का फार्मूला अपनाया। उसका प्रतिफल भी मिला। 2009 के चुनाव में कांग्रेस को 119111019 वोट मिले। वहीं सीटों की संख्या 206 हो गयी। भाजपा को उस समय 78435381 वोट मिले थे। उसके सीटों की संख्या 116 थी। बहुजन समाज पार्टी को 25,728920 वोट मिले थे और उसके सीटों की संख्या 21 थी, वहीं समाजवादी पार्टी को 14,284,638 वोट मिले थे और उसके सीटों की संख्या 23 रही। वहीं तृणमूल कांग्रेस को 1.3 करोड़ वोट मिले थे। उस समय 41.7 करोड़ कुल वोट पड़े थे।

    अब 2009 के बाद 2014 में लोकसभा चुनाव हुए। उस समय कुल मत 54.8 करोड़ पड़े थे। यही वह समय था, जब नरेंद्र मोदी मैजिक की शुरूआत हुई। अगला 2014 का लोकसभा चुनाव उनके नेतृत्व में हुआ। इसके बावजूद कांग्रेस के मत में कोई खास गिरावट नहीं आयी। उसके मतों की संख्या 106935311 थी, लेकिन सीटों की संख्या में भारी गिरावट आ गयी। पिछले चुनाव में कांग्रेस को जहां 204 सीटें मिली थीं, वहीं 160 सीटें कम हो गयीं और मात्र 44 सीटों पर आकर सीमट गयी। इसका कारण था भाजपा के वोटों में बेतहाशा वृद्धि। भाजपा को जहां 2009 के लोकसभा चुनाव में 78435381 वोट मिले थे, वहीं 2014 में दोगुना से भी ज्यादा मतों की वृद्धि हो गयी। उसके मतों में 93202303 मतों का इजाफा हुआ और 171637684 मत मिले। सीटों की संख्या में भी काफी वृद्धि करते हुए 282 पर जीत दर्ज की। कांग्रेस औंधे मुंह गिर गयी। मायावती की बसपा को 22944841 वोट मिले थे, लेकिन ये वोट एक भी सीट में कनवर्ट नहीं हो सके और यूपी में बसपा शून्य पर पहुंच गयी, जबकि सपा को 21259681 वोट ही मिले और उसे पांच सीटें मिली थीं। तृणमूल कांग्रेस को ,21259681 वोट मिले थे। उसके सीटों की संख्या 34 रही। वहीं जयललिता की पार्टी को 18115825 वोट मिले थे और उसके सीटों की संख्या 37 थी।

    2019 की बात करें तो मतदाताओं की संख्या बढ़कर 90.90 करोड़ हो गयी थी। 2014 की अपेक्ष 8.43 करोड़ मतदाताओं की संख्या बढ़ी थी। इस बार 67 प्रतिशत लोगों ने मतदान भी किया। इस बार भी कांग्रेस को 11.9 करोड़ लोगों ने मत दिया। इतने ही मतों पर 2009 में कांग्रेस की सरकार बन गयी थी। उस समय इसे 206 सीटें मिली थीं, लेकिन 2019 में उसे मात्र 52 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। राहुल गांधी अमेठी की सीट गवां बैठे। भाजपा के वाटों में बेतहाशा वृद्धि हुई और उसको 22.9 करोड़ मत मिले अर्थात कांग्रेस के मतों की अपेक्षा लगभग दोगुना मत थे। भाजपा ने 12 प्रमुख और बड़े राज्यों में 50 प्रतिशत से भी अधिक मत प्राप्त किए। यदि पूरे देश की बात करें तो भाजपा का मत-प्रतिशत 41 प्रतिशत हो गया जो सन 2014 के 31 प्रतिशत से 10 प्रतिशत अधिक है।
    जिन राज्यों में भाजपा को सबसे अधिक वोट मिले, उनमें उत्तर प्रदेश (4.28 करोड़), पश्चिम बंगाल (2.30 करोड़), मध्य प्रदेश (2.14 करोड़), राजस्थान (1.90 करोड़), गुजरात (1.80 करोड़) और महाराष्ट्र (1.49 करोड़ ) आगे हैं। इनके अलावा बिहार, असम, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और झारखंड में भी अच्छी संख्या में वोट भाजपा को पड़े। वोटों के लिहाज से तीसरी सबसे बड़ी पार्टी टीएमसी थी, जिसे 2.5 करोड़ वोट मिले थे। वहीं बसपा को 2.2 करोड़, जबकि 1.6 करोड़ वोट पाकर समाजवादी पार्टी पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी थी।

    अब लोकसभा चुनाव से पूर्व जिन नौ राज्यों में चुनाव होने हैं, जहां पर 116 लोकसभा की सीटें हैं। वहां पर 2019 में भाजपा के खाते में 92 सीटें थीं। अब भाजपा इस रणनीति पर चल रही है कि इन सभी राज्यों में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही लोकसभा में सौ का आंकड़ा पार कर जाय। इन्हीं राज्यों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान भी हैं, जहां पर पिछले विधान चुनाव में भाजपा ने अपनी सरकारें गवां दी थी, लेकिन लोकसभा में कामयाबी हासिल करने में कामयाब रही। मध्य प्रदेश में जोड़-तोड़कर पुन: भाजपा सत्ता में आ गयी है।

    कांग्रेस के साथ दिक्कत यह है कि वोटरों की संख्या बढ़ने के साथ ही अपने वोटों की संख्या बढ़ाने में कामयाब नहीं हो पा रही है। इसको पाने के लिए राहुल गांधी ने पद यात्रा निकाली। हालांकि पदयात्रा से कितना लाभ होगा, यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन उसके परिश्रम के परिणाम बहुत हद तक सकारात्मक मिलने की संभावना है। इससे भाजपा के सिर पर भी चिंता की लकीरें दिख रही है। इसको लेकर भाजपा ने अपना कसरत शुरू कर दिया है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि उसे भाजपा का सामना करने के लिए अपने मतों में दोगुना का इजाफा करना होगा, जो राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों अंतरकलह से जुझती कांग्रेस के लिए असंभव सा लगता है।

    इस बार भाजपा राजस्थान जैसे राज्य में जहां कांग्रेस के अंदरूनी कलह का फायदा उठाने को बेताब है, वहीं खुद के शासित प्रदेशों में लगातार बैठकों का दौर चलाकर कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों को ऊर्जावान बनाने में जुटी हुई है। भाजपा की नजर हमेशा नये मतदाताओं पर भी टिकी होती है। इसके लिए भी अभी से तैयारी शुरू हो गयी है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद राज्यों में भी बिगुल फूंक दिया गया है। दूसरे कार्यकाल में सबसे पहले जेपी नड्डा उप्र में गाजीपुर को चुना, जहां पर बसपा से सासंद अफजाल अंसारी हैं।
    (लेखक- वरिष्ठ पत्रकार एवं हिन्दुस्थान समाचार में कार्यरत हैं।)

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