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    Home»इंडिया

    बिना पुरोहित बाँदा में महासंग्राम का महायज्ञ!

    By May 1, 2019Updated:May 1, 2019 इंडिया No Comments7 Mins Read
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    • बाँदा-चित्रकूट संसदीय क्षेत्र में त्रिपक्षीय संघर्ष, मुख्य तीनों प्रत्याशी रह चुके हैं सपा से सांसद
    • मूलभूत समस्याओं को लेकर यहाँ नहीं लड़े गये चुनाव, पहली बार यहाँ नहीं है कोई ब्राह्मण प्रत्याशी
    राहुल कुमार गुप्त
    नई दिल्ली, 01 मई 2019: सियासत के गलियारों में बाँदा- चित्रकूट लोकसभा सीट आजादी के लगभग एक दशक के बाद से अपने तल्ख मिजाज और ट्रांसफार्मेटिव नेचर के लिये जानी जाती है। यहाँ दिखता कुछ है, सुनता कुछ है और परिणाम कुछ और निकलता है। कहने को तो यूपी की लगभग सभी सीटों पर जातिवाद हावी रहता है। इस सीट में भी कमोबेश यही हाल हैं। स्थानीय समस्यायें यहाँ कभी मुद्दे नहीं बनते, बस अधिकतर मतदान यहाँ सदा से किसी एक धुन, एक लहर की ओर ही पड़ते दिखायी देते हैं। इस धुन और लहर के साथ अतीत में पाठा के बीहड़ों से जारी फरमान भी संसद का रास्ता तय करा देता था।
    कई सालों तक दस्यु सम्राट ददुआ ही किंगमेकर की भूमिका में था फिर पाठा में ठोकिया के उदय के बाद इन दोनों का ही सिक्का चलने लगा।
    यहाँ से बने सांसद और मानिकपुर से बने विधायक इनके रहमोकरम पर ही अपनी राजनीति करते थे।
    पूर्ववर्ती बसपा सरकार ने पूरे प्रदेश को डाकुओं के भय से आजाद कर दिया था। अब  उतनी ठनक पाठा के जंगलों में नहीं रह गयी जितनी 2009 से पहले थी। हाँ! अब भी वहाँ कुछ डकैतों की चहल-पहल रहती है जिनमें से मुख्य है बबली कोल। बबली कोल ने मोर्चा संभाल रखा है जो बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन उस इलाके में थोड़ा बहुत मत प्रभावित जरूर करेगा।
    यूपी के सबसे पिछड़े क्षेत्र बुंदेलखंड के दक्षिणतम लोकसभा सीट बाँदा-चित्रकूट पर भी मूलभूत समस्याओं का अंबार है, (पेयजल समस्या, सिंचाई की समस्या, बंजर भूमि, अन्ना प्रथा, सड़क, बिजली, जलनिकासी, परिवहन, अच्छे चिकित्सालय आदि )  इन सबके बाद भी यहाँ चुनाव में हार-जीत का फार्मूला जातिवाद+ दलवाद+पाठा से निकला फरमान ही बनाता था।
    पिछले चुनावी महारण में मोदी लहर ने प्रत्याशियों की नैय्या पार लगाई थी। इस बार से एक नया तत्व राष्ट्रवाद व देश भक्ति ने भी पूरे देश में एक नयी चुनावी केमिस्ट्री को ईजाद किया है। इससे बोली में अख्खड़ता और साथ में लाठी, बंदूकों तथा राईफलों से शान दिखाने वाला बाँदा भी अछूता नहीं है।
    1.- भाजपा प्रत्याशी आर के पटेल-2.- सपा-बसपा गठबंधन प्रत्याशी श्यामाचरण गुप्ता 3. -कांग्रेस प्रत्याशी बालकुमार पटेल
    सत्रहवीं लोकसभा के पाँचवें चरण  में यहाँ मतदान होने जा रहे हैं। यहाँ के इतिहास में यह पहली बार है कि इस लोकसभा से कोई ब्राह्मण प्रत्याशी नहीं है। जबकि यह ब्राह्मण बाहुल्य सीट है। यूपी में लगभग प्रत्येक सीटों में त्रिपक्षीय संघर्ष है कई सीटों में तो केवल द्विपक्षीय संघर्ष ही देखने को मिल रहा है।
    भाजपा ने यहाँ से अपने मानिकपुर विधायक आर के पटेल को उम्मीदवार बनाया है। आरके पटेल का राजनीतिक सफर बसपा, सपा और भाजपा तीनों से रहा। यह अपने मृदुभाषी, सहज- सरल स्वभाव से सबके चहेते बन जाने वाले शख्स के रूप में जाने जाते हैं और आज भी पुराने दोनों दलों के कार्यकर्ताओं से मधुर संबंध हैं। यह बसपा सरकार में मंत्री पद पर भी रहे और सपा से सांसद भी। किन्तु किसी विकास पुरुष की तरह  बहुत अधिक जन आकर्षण की क्षमता नहीं है। यहाँ जन आकर्षण तो मात्र दलों के समर्थकों से तैयार होता है।
    सपा-बसपा गठबंधन ने इलाहाबाद से भाजपा सांसद व बीड़ी सम्राट श्यामाचरण गुप्ता को टिकट दिया है। इसके पहले यह भी बाँदा लोकसभा से सपा के सांसद रह चुके हैं। इस कार्यकाल के दौरान जिले के लोगों व पार्टी के सदस्यों से दूरी व विकास कार्यों में उदासीनता के कारण जनता और व्यापारियों में खास जगह नहीं बना सके इसलिये मोदी लहर से अपनी नैय्या इलाहाबाद से पार लगाने में अपनी भलाई समझी। पर वहाँ भी लोगों के मन में जगह बनाने में नाकाम रहे।
    सपा-बसपा गठबंधन में जाति फैक्टर की मजबूती की वजह से बाँदा सीट पर फिर निगाहें गड़ गयीं की जाति फैक्टर की नैय्या इस बार बेड़ा पार लगायेगी। गठबंधन के जाति फैक्टर के कारण सर्वाधिक मजबूत प्रत्याशी के रूप में यही दिख रहे हैं। किन्तु तमाम समर्पित नेता जो टिकट की लाईन में थे उनमें निराशा भी है।
    इसी वजह से सपा के कद्दावर नेता मिर्जापुर से पूर्व सपा सांसद व दस्यु सम्राट ददुआ के भाई बालकुमार पटेल को कांग्रेस का दामन पकड़ना पड़ा।
    बाँदा लोकसभा में दो इत्तेफाक एक साथ हैं कि मुख्य तीनों प्रत्याशी सपा से सांसद रह चुके हैं और दूसरा पहली बार किसी भी  यहाँ तक निर्दलीय भी कोई ब्राह्मण प्रत्याशी का न होना।
    कांग्रेस का गठबंधन अपना दल (कृष्णा पटेल) व बसपा के पूर्व कद्दावर नेता बाबूसिंह कुशवाहा की जन अधिकार पार्टी के साथ है।
    इस संसदीय क्षेत्र के लोग आर के पटेल और श्यामाचरण दोनों का कार्यकाल देख चुके हैं। बालकुमार पटेल हैं तो इसी क्षेत्र के लेकिन प्रत्याशी के रूप में यहाँ के लोगों के लिये नये हैं।
    भाजपा से ब्राह्मण टिकट न मिलने पर कुछ ब्राह्मण नाराज हैं और उन्होंने निर्दल के रूप में पर्चा भरा भी किन्तु ऐन वक्त पर सभी ब्राह्मण प्रत्याशियों के पर्चे निरस्त हो गये जिस पर उन्होंने सत्ता और प्रशासन के मिले-जुले का आरोप भी लगाया।
    भाजपा के विधानसभा चुनाव 2017 के टिकट बंटवारे की नीति लोकसभा चुनाव में लाभदायक हो इस तरह से बनायी गयी थी और हुआ भी वही, इस नीति का लाभ मानिकपुर से बीजेपी विधायक आर के पटेल को लोकसभा प्रत्याशी के रूप में मिलते हुए दिख रहा है।
     दो सवर्ण विधायक बाँदा सदर से प्रकाश द्विवेदी, कर्वी से चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय तथा दो बैकवर्ड विधायक बबेरू से चंद्रपाल कुशवाहा, तिंदवारी से ब्रजेश प्रजापति व एक एससी विधायक नरैनी से राजकरण कबीर गठबंधन की जातिवाद की गणित पर सेंध लगा सकते हैं। क्योंकि यहाँ के लोगों का काम अधिक्तर विधायकों से पड़ता है न कि सांसद से। यूपी में बीजेपी सरकार लगभग तीन साल और रहेगी। इस गणित के अलावा देशभक्ति व मोदी फैक्टर भी कार्य कर रहा है।
    बाँदा सदर विधायक के अलावा यहाँ के सभी विधायक इस चुनाव में जी-जान से लगे हैं। बाँदा सदर विधायक के विकास कार्यों और मिलनसार स्वभाव का हर जाति पर भी गहरा प्रभाव है। बीजेपी के जिले में तमाम बड़े वैश्य नेता भी हैं जो पार्टी में बड़े पदों पर हैं। ये श्यामाचरण गुप्ता के बेस वोट को कमजोर करने का कार्य करेंगे।
    वहीं बालकुमार पटेल के साथ अतिपिछड़ा वर्ग लामबंद है पूर्वमंत्री शिवशंकर सिंह पटेल व अपना दल ( कृष्णा पटेल) के साथ होने के कारण आर के पटेल के भी बेस वोट पर चोंट हो रही है।
    बालकुमार पटेल के साथ जन अधिकार पार्टी का भी समर्थन होने से कुशवाहा वोट भी इनके बाजू मजबूत करेगा किन्तु यह भी दो जगह बँटेगा एक तो कांग्रेस व दूसरा बबेरू विधायक चंद्रपाल कुशवाहा की वजह से भाजपा में।
    बसपा के पूर्व कद्दावर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दिकी का कांग्रेस में आने की वजह से मुस्लिमों का रुझान भी कांग्रेस प्रत्याशी और ‘साथी’ प्रत्याशी के साथ उलझा हुआ है। कांग्रेस की लुभावनी न्याय योजना भी गरीबों और वंचित तबकों के लिये वोट बैंक का कार्य कर रही है। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशी बालकुमार पटेल भी कहीं से कमजोर नहीं दिख रहे, इनके संपर्क में कई सपाई आज भी बैकडोर से जुड़े हुए हैं।
    जातीय फैक्टर के कारण जहाँ सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी व समर्थक थोड़ा आश्वस्त हैं वहीं अन्य में जन रुझान के रुख को अपनी ओर मोड़ने की होड़ लगी है। इस महासंग्राम के बारे में कुल मिलाकर वही स्थिति आज फिर है। ”दिखता कुछ है सुनता कुछ है और परिणाम कुछ निकलता है।” यही बाँदा-चित्रकूट संसदीय सीट की परंपरा रही है।

    यह है जातीय गणित:

    ओबीसी: लगभग 50 फीसदी जिसमें पटेल अधिक फिर कुशवाहा और यादव।
    सामान्य: लगभग 22 फीसदी जिनमें ब्राह्मण अधिक।
    एससी:  लगभग 22 फीसदी।
    मुस्लिम: लगभग 6 फीसदी।
    कुल वोटर- 16,82,195।
    पिछले लोकसभा चुनाव का यह रहा था परिणाम:
    1. भाजपा से भैंरों प्रसाद मिश्रा विजयी रहे (342066)
    2. बसपा से आर के पटेल (226278)
    3. सपा से बाल कुमार पटेल (189730)
    4. कांग्रेस से विवेक सिंह (36650)

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