‘आर्टिकल 15’ ने मुझे झकझोर दिया: आयुष्मान खुराना

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एंड टीवी पर प्रसारण: शनिवार 19 अक्टूबर रात 8:00 बजे

ज्वलंत मुद्दे पर आधारित फिल्म ‘आर्टिकल 15 ‘ में ऊंची- नीची जाति के लोगों के बीच खेले जा रहे भेदभाव को दर्शाया गया है। यह फिल्म दर्शकों को जातिगत भेदभाव और इससे जुड़े पूर्वाग्रह और सामाजिक नजरें के बारे में सोचने पर मजबूर कर देती है। अभिनेता आयुष्मान खुराना इस तरह की फिल्म पहली बार कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने अपने कंफर्ट जोन से बाहर आकर एक ऑफिसर की भूमिका निभाई है। उनके साथ में ईशा गुप्ता, मोहम्मद जीशान, अय्यूब, कुमुद मिश्रा और मनोज पाहवा ने भी महत्वपूर्ण है। बता दें कि आर्टिकल 15 ब्लॉकबस्टर मूवी एंड पिक्चर पर इस शनिवार 19 अक्टूबर रात 8:00 बजे वर्ल्ड टेलीविजन प्रीमियर दिखाने जा रहा है। इस मौके पर आयुष्मान खुराना ने देशवासियों के सामने एक मीडिया इंटरव्यू में अपनी बात रखी पेश हैं कुछ खास अंश:

बॉलीवुड में इससे पहले कभी इस विषय पर ऐसी फिल्म नहीं बनी क्या आपको लगता है कि आर्टिकल 15 के साथ वह यह दस्तूर बदल रहा है?

यह फिल्म सिनेमा तक सीमित नहीं है। बल्कि शहर में रहने वाले हम जैसे लोग भी जाति से बंधे हुए हैं ग्रामीण भारत में भेद भाव इतना ज्यादा है कि इसे देखने से भी निराशा होती है। तथाकथित उच्च वर्ग के लोगों ने इसे बहुत बढ़ावा दिया है। हम उसके बारे में जानते तो हैं लेकिन फिर भी इससे अनजान है। इस फिल्म को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिल रहा है। मुझे लगता है अब समय आ गया है कि हम लोग हिम्मत करके ऐसी चीजों के बारे में बात करें इसके बारे में चर्चा नहीं की जाती।

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क्या आपको लगता है कि आखिर 15 जैसी फिल्म बनाना जरूरी था?

आयुष्मान खुराना एंड कहां मुझे लगता है कि यह एक महत्वपूर्ण फिल्म है, क्योंकि यह न सिर्फ अयान का किरदार निभाने में मेरा एक साहसी प्रयास था, बल्कि निर्देशक ने भी एक हिम्मत भरा कदम उठाया है क्योंकि यह ऐसा विषय है जिसके बारे में बिल्कुल भी बात नहीं की जाती। हम शहरी लोग देश की जनसंख्या में तो केवल 30% हैं और लंबे समय से हमने इस पर इस बात को अनदेखा किया कि ग्रामीण भारत में क्या हो रहा है। जहां 70% आबादी रहती है। अब यह सही है जब हम उनकी चुनौतियां भी सामने रखें। इसके लिए फिल्म सटीक माध्यम था।

फिल्म सीधे चोट करने वाले संवाद हैं जैसे हीरो नहीं चाहिए ‘अयान’ बस ऐसे लोग चाहिए जो हीरो का वेट नहीं करें, इस बारे में आपका क्या कहना है?

हां यह सच है। दबे कुचले लोगों को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष करना होता है। इसलिए एक आदमी हीरो बनता है और वंचित वर्ग एवं दबे कुचले लोगों के लिए लड़ाई लड़ता है। वह लोगों की लोगों का प्रतिनिधित्व करता है और उनके अधिकार के लिए लड़ता है। हमारी फिल्म में एक ऊंची जाति के व्यक्ति के लिए आगे आकर इन लोगों के लिए लड़ना महत्वपूर्ण था ताकि संतुलन बना रहे वो खुद के उदाहरण के लिए लोगों को प्रेरित करता है।

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