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    Home»ब्लॉग

    जीवन अंतत: सुख की तलाश है

    By September 16, 2017Updated:September 18, 2017 ब्लॉग No Comments18 Mins Read
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    आनंद अभिषेक


    जीवन अंतत: सुख की तलाश है। रस्म अदायगी के तौर पर ही सही इस सुख की प्राप्ति के लिये नव वर्ष हमें आत्म आकलन का एक अवसर देता है। हर व्यक्ति इस मौके पर अपने सपनों को सच करने के लिए तमाम रेजोल्यूशन (संकल्प) लेता है। अमूनन, हमारे ये रेजोल्यूशन आमतौर पर दो सप्ताह तक ही चल पाते हैं और हमारे ये रेजोल्यूशन समय की भीड़ में खोने लगते हैं। आंकड़े बताते हैं कि पौष्टिक खाद्य पदार्थों की बिक्री और हेल्थ क्लब में जाने वालों की संख्या वर्ष के पहले दो सप्ताहों में सबसे अधिक होती है। लोग जनवरी के शुरूआती दिनों में प्रेरित हो जाते हैं। वे सचमुच अपने संकल्पों को पूरा करना चाहते हैं, परंतु महीने की पंद्रह तारीख से उनका उत्साह कम होने लगता है और महीने के अंत तक पूरी तरह जवाब दे जाता है। फिर हम वैसे ही अधूरे रीते रह जाते हैं, जैसे पहले थे और भाग-दौड़ की जिंदगी का एक हिस्सा बनकर रह जाते हैं। आखिर क्यों हम प्राय: अपने जीवन के मकसद को पूरा नहीं कर पाते। आइए, नव वर्ष के अवसर पर हम अपने सुख, आनंद या खुशी हासिल करने के लक्ष्य की उस डोर को पकडऩे की कोशिश करते हैं जो प्राय: हमसे छूट जाती है। असल सुख को पाने के लिए उसे जानना और समझना जरूरी है। लक्ष्य को पहचाने बिना अभिलक्षित को हम प्राप्त नहीं कर सकते। आइए, इस पर हम आत्मालोकन करने की कोशिश करते हैं कि सुख क्या है, कहां है, और उसे हम कैसे पा सकते है?

    सुख की कामना मनुष्य की आदिम इच्छाओं का केंद्रीय भाव है। दुनिया को हम द्वैत में देखने के आदी हैं। कोई अच्छा है तो कोई बुरा। कहीं ज्ञान है तो कहीं अज्ञान। कोई आधि-व्याधि से मुक्त है तो कोई इससे ग्रस्त। श्रम में आनंद की तलाश करने वाले कई हैं तो कई आलसी भी हैं। स्वभाव से कोई संतोषी है तो कोई लालची। किसी का मन आत्म विश्वास से भरा है तो किसी का हीन भावना से। ऐसे में अगर हम यह मान लें कि सुख का होना, दुख का नहीं होना है तो बात मुकम्मल नहीं होगी। फिर भी सुख और दुख को हम उन दो ध्रुवों के रूप में चिह्नित तो कर ही सकते हैं, जिनके बीच ही कहीं असल जिंदगी अपनी पूरी वास्तविकता के साथ परिभाषित होती है।

    सुख को समझने के लिए इसके मूल पर जाते हैं। सभ्यता के आरंभिक दौर में जब सुख की व्याख्याएं हो रही थीं तब साध्यवादी (टेटोलॉजिस्ट) अरस्तू ने यह कहा था कि जिसकी हमें तलाश है उसे पा लेना ही सुख है। एक समय पहले तक यह आम विश्वास था कि सुख या आनंद ईश्वर की इच्छा है, पर मध्य युग आते-आते सांसारिक सुख के सापेक्ष पारलौकिक सुख खड़ा हो गया और यह कहा जाने लगा कि संसार के समस्त राग, रंग और रस व्यर्थ है और असल आंनद जीवन में नहीं, जीवन के पार है। बाद में पुनर्जागरण काल ने जब वैयक्तिकता का मूल्य बढ़ाया, तो मिल जैसे विचारकों ने कहा कि नैतिकता में ही सुख है। कमोबेश आज भी मिल का यह विचार कायम है। भ्रष्टाचार और अपराधों के बढ़ते आंकड़ों और दुनिया भर में गूंजते परमाणु अस्त्रों के गौरवगान के बावजूद बहुत से लोग मानते हैं कि जो नीति और नैतिकता की राह पर है, वही सुख का सच्चा साधक है, लेकिन दूसरी ओर कुछ लोग यह भी कहते हैं कि यदि नैतिकता ही सुख है, तो अनैतिकता में लिप्त लोगों का जीवन सुखों में क्यों लिपटा है? यह द्वंद इसलिए है क्योंकि हम सबने अपने-अपने स्वार्थों और सुविधाओं के अनुकूल न केवल नैतिकता के अपने-अपने संस्करण गढ़ लिए हैं, बल्कि आनंद को भी महज भौतिक उपलब्धियों का पर्याय मान लिया है।

    श्रम: सुख का मूल
    मनुष्य के जीवन में संसाधन उसका आराम बढ़ा सकते हैं, उसे सुख दे सकते हैं, पर उसके जीवन की गुणवत्ता एक सीमा के बाद बेहतर नहीं बन सकती, क्योंकि सुख मनुष्य को अधिक संवेदनशील, अधिक सृजनशील और अधिक विवेकशील नहीं बना पाते। इसके लिए मनुष्य को अपने मूल्य और मान्यताएं परिष्कृत करनी होती है। ऐसा होने पर उसे आनंद की प्राप्ति होती है। सुख के लिए संसाधन माध्यम तो बन सकते हैं, पर संसाधन पर निर्भरता अनिवार्य नहीं। चूंकि हमारी तलाश भिन्न-भिन्न है, इसीलिए हमारी खुशियों या सुखों में भी साम्यता नहीं है। सुख सीधे-सीधे संतुष्टि से जुड़ा सवाल है। हमें जिस चीज की जरूरत है उसे पा लेन की संतुष्टि ही वस्तुत: सुख या आनंद है। भूखे के लिए भोजन ही आनंद है, बेघर के लिए घर और अकेले के लिए किसी का साथ। बेंजामिन फ्रेंकलिन कहते हैं कि दुनिया भर की सरकारें केवल सुखी होने की आजादी दे सकती हैं, पर उसे पाने के लिए प्रयास हमें खुद करना पड़ता है। लेखक नाथानियल हाथॉर्न भी फ्रेंकलिन का समर्थन करते हैं, क्रमशा अच्छा और सुखों से भरा जीवन धीरे-धीरे आता है और उसका मूल होता है उसके लिए किया गया श्रम। यह निरा रोमांटिक-सा ख्याल है कि सुख तितली की तरह कभी भी अचानक हमारे कंधे पर आकर बैठ जाता है।

    इस परिभाषा के आधार पर यदि सुख को समझें तो दर्शन, विज्ञान, कला, साहित्य, संगीत, संस्कृति, तकनीक और चिकित्सा सहित जीवन के विविध क्षेत्रों में मानव सभ्यता द्वारा हासिल की गयी उपलब्धियां ही सुख है। यह सुख सच्चे श्रम से फूटता है। यकीनन सुख का अपना मनोविज्ञान है जिसमें बहुत से कारण काम करते हैं- व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, आनुवांशिक और न्यूरोलॉजिकल।

    क्या हम प्रसन्न हैं
    मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आज 20 फीसदी लोग जीवन के किसी-न-किसी मोड़ पर मूड डिसॉर्डर से ग्रस्त हैं और 30 फीसदी एंग्जाइटी डिसॉर्डर से। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 18 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते 11 फीसदी किशोर डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। कारण- बढ़ती प्रतिद्वंदिता, व्यक्तिवादिता और विभ्रम की स्थिति।
    अंग्रेजी में हैपीनेस के विभिन्न अवयव चिह्नित कर उनके आधार पर समुदायों और देशों तक के सूचकांक बनाए जाने लगे हैं। भूटान ने तो हैप्पीनेस इंडेक्स को प्राथमिकता देकर सारी दुनिया में अपने को चर्चित कर लिया है। यूनाइटेड नेशंस ने 20 मार्च को अंतरराष्ट्रीय ‘हैप्पीनेस डे घोषित कर रखा है। पर हमें लगता है कि खुशी के भौतिक संसाधनों के आधार पर किसी देश को बेहतर या कमतर करार तो किया जा सकता है, पर यह बात उस देश के सभी नागरिकों पर लागू नहीं हो सकती। जैसे खुशी के सूचकांक में शिखर पर स्थित स्वीडन में बहुत से लोग आत्महत्याएं करते हैं। इस श्रेणी में बहुत नीचे होने पर भी भारत में सारी दुनिया से लोग आनंद की तलाश में आते रहते हैं। इसलिए यह कहना कठिन हो जाता है कि कोई व्यक्ति कब, क्यों और कैसे सुखी या आनंदित हो जाता है।

    बाजार में सुख या सुख का बाजार
    हमारी महत्वाकांक्षी अपेक्षाओं और जीवन की वास्तविकताओं के बीच सुख का बाजार पुल की भूमिका में खड़ा है। इस बाजार पर एक नजर डालें तो सबसे आगे है चिकित्सा का बाजार, जो स्वास्थ्य के समानांतर सौंदर्य की ललक में जी रहे उपभोक्ताओं को खींच रहा है। एंटी डिप्रेशन और कॉस्मेटिक सर्जरी यूजर्स की बढ़ती संख्या से इस बाजार की खुशी छलक रही है। इसके आगे है मनचाहे स्वास्थ्य और सौंदर्य की गांरटी देता फूड बाजार। डाइट चार्ट को फॉलो करता इस बाजार का उपभोक्ता एनर्जी ड्रिंक, प्रोटीन्स फूड, रेडी टू ईट मील और ऑर्गनिक फूड से किचन को सजाते हुए खुश तो हैं, पर अपने बजट में कितनी स्माइली जोड़ पा रहा है? सुख के इस बाजार में आगे हैं- सेल्फ इंप्रूवमेंट प्रॉडक्ट्स यानी किताबें, सेमिनार, योगा मैनेजमेंट और मोटिवेटिंग क्लासेज। आंकड़े बताते हैं कि अकेले अमेरिका में सेल्फ इंप्रूवमेंट प्रॉडक्ट्स की इंडस्ट्री 10 बिलियन डालर की है। दुनिया भर में 5000 से अधिक मोटिवेटिंग स्पीकर हैं जो प्रति वर्ष 1 बिलियन डॉलर से अधिक कमा रहे हैं। खैर, सुख का यह बाजार यहीं नहीं रुकता। इसमें मनोरंजन और बुद्धिमत्ता से लेकर रिश्तों और त्योहारों का भी बाजार खड़ा है। समझ में नहीं आता कि जीवन बाजार में जी रहा है या बाजार जीवन में? सुख जिसे कल तक आत्मिक, आध्यात्मिक या आदर्श जीवन संबंधी स्थिति कहा जाता था, आज अपनी-अपनी जेब के हिसाब से दिन-रात उसका मोल-भाव हो रहा है।
    सुख भीतर से आता है
    इस बाजार के प्रवक्ताओं और उपभोक्ताओं का तो यही कहना है कि अगर आप तनाव के दर्द से गुजर रहे हैं तो इस युग में एक सबसे असरकारक दवा है- पैसा। अर्थ और सुख के संबंध पर चर्चा करते हुए मनोविज्ञान इस बात को स्वीकारता है कि सामान्य तौर पर अपनी मूलभूत जरूरतों को पा लेने के बाद हम खुद को उस स्थिति में पाते हैं, जहां संतुष्टि और प्रसन्नता है, लेकिन मनोविज्ञान साफ तौर पर यह भी कहता रहा है कि इनकम दोगुनी होने पर प्रसन्नता हमेशा दोगुनी नहीं होती क्योंकि अंतत: वह व्यक्ति के जीवन से जुडे विविध पक्षों पर निर्भर करती है। कमजोर तन और धन वाले व्यक्ति के पास भी खुश रहने के हजार कारण होते हैं। गरीब व्यक्ति अपने से ज्यादा अमीर को देखकर दुखी होने के बजाय ज्यादा गरीब को देखकर खुश होना सीख लेता है। सायकोलॉजिस्ट केमरॉन एंडरसन बट्र्रेड रसेल को दोहराते हुए कहते हैं कि भिखारी कभी अरबपतियों से नहीं जलता है। वह हमेशा अपने से ज्यादा अच्छी स्थिति वाले भिखारियों को देखकर जलता है। वस्तुत: धन केवल उसी स्थिति में सुख दे सकता है, जब आवश्यकताएं और महत्वाकांक्षाएं उससे सीधे-सीधे प्रभावित होती हों। इस एक कारण के अलावा सुख और संतुष्टि के तमाम कारण हमारे भीतर से आते हैं।

    आनंद हमारे सायकॉलोजिकल इम्यून सिस्टम पर निर्भर करता है, जो इन दिनों बुरी स्थितियों में है। इसके बहुत से कारण हैं। सबसे पहला तो यही कि हमारे भीतर आनंद की भावना चुक रही है। यकीनन, सूचना, संचार और मीडिया क्रांति ने समाज में बहुत-सी सकारात्मकताएं पैदा कीं, लेकिन जाने-अनजाने उसने स्लो प्रोसेस के द्वारा समाज के सामूहिक मन को नकारात्मकताओं पर केंद्रित होना भी सिखाया है। तमाम आनंदों के बीच हम अपना फोकस दुख पर टिकाए बैठे हैं।

    आभासी हो रहा है सुख
    सायको-इकोनॉमिक कारणों के अलावा सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश भी सुख को प्रभावित करता है। असल दुनिया के परे फीलगुड के लिए आज हमारे पास एक पूरी आभासी दुनिया भी है। जहां कितना कुछ शेयर किया जा सकता है- एक कमीज से लेकर नयी कार, नया घर, नया प्रेम, नयी चोट, नया दुख और नयी रेसिपी तक वह सब कुछ जो क्रमाइंड में है। यहां इकट्ठा फॉलोअर्स और फ्रेंड्स की भीड़ भी अपनी ही तरह का एक अनोखा फीलगुड है। एक ओर आंकड़े कह रहे हैं कि सोशल मीडिया ने हमें ज्यादा सुखी, ज्यादा खुश, ज्यादा एक्सप्रेसिव और ज्यादा नजदीक ला रहा है, वहीं दूसरी ओर लोग मानने लगे हैं कि आभासी जगत प्रसन्न नहीं, अपना एडिक्ट या गुलाम बना रहा है और आभासी सुखों में असली सुख छीन रहा है। इस आभासी सुख के चक्कर में हम अपने असली सुख को हाशिये पर करते जा रहे हैं। हम अपने आभासी मित्रों की जितनी चिंता करते हैं अगर उसका 50 फीसदी भी अपने परिवार, समाज की परवाह करें तो यह सुख हमारी चेतना को आह्लादित कर सकता है।

    सुख का असली स्वाद
    हमें सिखाया जाता था कि सत्य बोलो और जो उचित हो उस राह पर चलो ताकि जीवन में विनम्रता और नैतिक शुद्धता बनी रहे, लेकिन इस समय हम वास्तव में जैसा सोचते है, सचमुच जैसा दिखते हैं, और जो सच में चाहते है, उस सबसे पलायन करने की दुर्घर्ष मन:स्थिति में हैं। मानसिक रोगों के ग्राफ का बढऩा हमारे भीतर दबी इन्ही असलियतों की कुलबुलाहटों का विस्फोट है। इसके अलावा वर्तमान समय में सायकॉलोजी और न्यूरोसाइंस का एक दूसरा द्वंद भी अपनी चरम स्थितियों में है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि हम एक धीमी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत अपने मस्तिष्क को इस बारे में मूर्ख बनाना सीख गये हैं कि हमें क्या चाहिए? और हम किस बात से खुश हो सकते हैं। इसकी वजह यह भी है कि हम सत्ता, शक्ति और सुख के बीच की बारीक रेखा तय नहीं कर पा रहे हैं। हम इसीलिए सुख से दूर उदास और रिक्त हैं, क्योंकि हमारे जीवन का संघर्ष खो गया है। आज भी अमीर की तुलना में गरीब ज्यादा खुश हो पाते हैं, क्योंकि वे संघर्षरत हैं और मध्य और उच्च वर्ग की तरह विज्ञान और तकनीकी से मिली सुविधाओं द्वारा आलस्य को पोसने की स्थिति में नहीं आ पाए हैं। हमने एक बड़ा भ्रम यह पाल लिया है कि प्रसन्न होने का मतलब संघर्ष और श्रम से बच निकलना। जबकि सच्चाई यह है कि सुख या आनंद, संघर्ष और श्रम से पैदा होता है। इस सच्चाई को हम जितनी जल्दी स्वीकार कर लेंगे, उतनी जल्दी सुख का असली स्वाद चख पायेंगे। जब मन में प्रेम होता है यह प्रतीति मन के पोर-पोर को हर्ष से भर देती है। सुख का पल मन को अहं बोध से मुक्त करता है। पर जैसे ही अहंकार का असर मन पर फिर से गहराता है, सुख अंतर्जगत से निकलकर बाहरी दुनिया को दिखाने का सामान बनकर रह जाता है। जब हम चौपायों को भी बेहतर चारा देने लगते हैं, उनके बांधे जाने की जगह साफ-सुथरी रखते हैं और उन्हें कीड़े-मकोड़ों से बचनो का प्रबंध कर लेते हैं, तो उनकी चमड़ी और आंखों की चमक हमें बता देती है कि वे संतुष्ट और सुखी हैं। अनावृष्टि और कुपोषण से त्रस्त वनस्पतियों भी अपनी पीड़ा अभिव्यक्त करती हैं और फुहार पड़ते ही वे भी मुस्कुराती दिखती हैं।
    मुद्दा यह नहीं है कि सुख के मायने हमारे लिए क्या हैं और सुख कहां है? मुद्दा यह है कि हमारे हिस्से का सुख जहां भी है, वह जिस भी राह से हम तक पहुंचे, उसका प्रवाह न ठहरे। फिलहाल, आइये, नये साल के इस मौके पर अपने सपनों को सच करने को अपने तमाम रेजोल्यूशन(संकल्प) को संघर्ष, श्रम, नैतिकता, सच्चाई और ईमानदारी से पूरी शिद्दत से पूरा करने की हर रोज कोशिश करें और उससे प्राप्त अपने हिस्से का सुख हम संपूर्ण चेतना के साथ जिएं और कहें- सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया।

    सुख के सोपान


    स्वास्थ्य
    स्व में स्थित होना ही स्वास्थ्य है और जीवन में अपनी स्थिति से संतुष्ट होना सुख। स्वस्थ होना, दूसरे सभी सुखों को भोग पाने की पहली शर्त है। क्या नहीं था विश्व विजेता सिकंर के पास। धन, दौलत, सामथ्र्य। पर उसके लिए सबसे सब निरर्थक रहे। विजय यात्रा से लौटता हुआ सिकंदर एक साधारण ज्वर से हार गया। यही कारण है कि जीवन के संभव सभी सुखों में पहला स्थान निरोगी काया का है। हमारी काया हमारा तन ही नहीं, तन-मन और बुद्धि का योग है। बुद्धि द्वारा उत्पन्न विचार हमारे मन की संवेदनाएं बनते हैं और ये संवेदनाएं हमारे तन पर लक्षण के रूप में दिखती हैं। बुद्ध ने भी स्वीकारा था कि सुख का द्वार स्वास्थ्य के रास्ते से आता है। इस सबका लब्बोलुआव इतना सा है कि अपनी परवाह कीजिए। पहला सुख तो क्या सभी सुख आपके दामन में होंगे।

    ज्ञान
    दुनिया की सबसे कठिन चीज ज्ञान का अर्थ साधारण तौर पर जान लेना ही होता है। लेकिन इसकी उत्पत्ति जिज्ञासा से होती है। सभी ज्ञान भय की जिजीविषा से संचालित हैं। जब हम किसी फूल या पत्थर को देखते हैं तो फूल या पत्थर ही नहीं हो जाते हैं, स्वयं का बोध बचा रहता है। ज्ञान का सुख ऐसा ही सुख है। इन अर्थों में ज्ञान सुख का भोक्ता अपने संबंधित क्षेत्र का अन्वेषक हो सकता है, जो प्रतिपल परिवर्तनशील यथार्थ का न केवल प्रेक्षक हो, बल्कि प्रचलित सुख-दुख विभाजन से परे उस परिवर्तनशील यथार्थ का सक्रिय भागीदार हो। आज के समय में हम जिस समृद्धि के सुखद सदमे में हैं वो असल में तृष्णा ही है। इसे ज्ञान के सच्चे सुख से समझ सकते हैं।

    संवेदना
    संवेदनाएं मनुष्य को सुंदर और सरल बनाती हैं। प्रेम करने का अवसर देती हैं जो स्वत: सुख का कारण है। इसी तरह समाज के प्रति संवेदना हमें सभ्य बनाती है। किसी सामाजिक कार्य को करके, वृद्धाश्रमों और अनाथालयों में अपनी सेवाएं देकर मनुष्य अपार सुख पाता है और इस सुख की लालसा उसे बेहतर इंसान बनाती है। इस बात को मदर टेरेसा या बाबा आम्टे के जीवन से समझा जा सकता है। संवेदनशीलता दरअसल प्रेम, दया, आदर और खुशी जैसे भावों को लेने और देने का एक दोतरफा मार्ग है। इसीलिए संवेदना हमारे जीवन में सुख का सहज कारण बनती हैं और हमें रूहानी तृप्ति प्रदान करती है।

    आत्म विश्वास
    एक पुरानी उक्ति है- आप सोचते हैं कि आप कर सकते हैं या फिर आप सोचते हैं कि आप नहीं कर सकते हैं, आप दोनों ही मामलां में सही सिद्ध होंगे। आत्मविश्वास साधन भी है , साधना भी और साधना की सिद्धि भी। इसलिए जब भी आत्मविश्वास को परखें, यह अवश्य देख लें कि उसके विश्वास में कितना क्रआत्मञ्ज है और आत्मविश्वास में कितनी क्रआत्माञ्ज। आत्मविश्वास वह भूमि है, जो आत्माभिव्यक्ति के आकाश में शाखाएं फैलाती हैं। वह बाह्य आरोपण नहीं, स्वयं बीज का प्रस्फुटन है और इसीलिए वह एक समय के बाद सुख का सूत्र ही नहीं, स्वयं आनंद का स्वरूप भी बन जाता है।

    समृद्धि
    जीवन जीने के लिए किसी के लिए भी महत्वपूर्ण होते हैं- रोटी, कपड़ा और मकान। ये मूलभूत आवश्यकताएं पूर्ण होने के बाद भी व्यक्ति भौतिक सुख-साधन की ओर दौड़ लगाता है। ऐश्वर्य के सभी साधन जुटाने के बाद वह उनके प्रदर्शन को लालायित हो उठता है, लकिन इस समृद्धि में सुख नहीं है। समृद्धि हमें सुखी होने की राह दे सकती है लेकिन उस राह पर हमें ही चलना पड़ता है। हम सुखी तभी होते है जब होना चाहते हैं, क्योंकि सुख बाहर से अधिक भीतर से जुड़ा तत्व है। इसीलिए इसका जवाब भी बाहर से भीतर होता है। जब मनुष्य नैतिकता की सीढिय़ां चढ़कर समृद्धि के शिखर पर पहुंचता है और अपने पांव जमीन पर ही टिकाए रखता है। जो भी उसने अर्जित किया है उसका एक हिस्सा वह समाज को इस भावना से समर्पित करता है। तभी वह समृद्ध होकर सुखी रह सकता है।

    कर्म
    जीवन, प्रकृति, कर्म, प्रयास, उद्यम सब एक-दूसरे से गुंथे हुए मनके हैं, जो एक साथ जुड़कर सुख की माला बनाते हैं। सिर्फ सपनों के बीज डालने से हकीकत की फसल तैयार नहीं होती है, जब तक कि योजनाबद्ध तरीके से खेती न की जाए। परिश्रम से अर्जित सफलता का सुख अवर्णनीय है। दलाई लामा कहते हैं कि प्रसन्नता कोई पहले से निर्मित वस्तु नहीं है, यह आपके कर्मों से आती है। जिंदगी अपनी खूबसूरती हमें सौंपने के लिए हमने भी कुछ मांगती है। हमारा एक सुस्पष्ट लक्ष्य, लक्ष्य के प्रति कर्म साधना और ज्ञम की बूंदों का अभिषेक। परिश्रम से अर्जित सफलता का सुख अवर्णनीय है।

    समर्पण
    समर्पण किसी के लिए नहीं होता, अपनत्व के लिए होता है। यानी सम अर्पण, संतुलित अर्पण, सम्यक अर्पण। यह चेतना का मामला है, गुलामी या बाध्यता का कतई नहीं। समर्पित होने की घडिय़ां स्वयं को चाहने की घडिय़ां है, जो हमें किसी अपने को समझकर उसमें अभिन्न होने को विवश कर देती है। यह अपने के प्रति अपना समर्पण है। यह क्रअपनीञ्ज ही शोध है। यह एकांत प्रेम क्षणों में अद्वैत और निद्र्वंद्व हो जाना है। इसे अखंड में समा जाने की तैयारी कहा जा सकता है- ईश्वर के निराकार के साथ एक होने के दुर्लभ क्षण। इसी को सम्यक सुख कहते हैं।

    प्रेम
    प्रेम मनुष्य को सार्वभौमिक व्याकरण का सुख देता है। वैसे ही जैसे भगवद्भाव, जैसे हवा, जल, प्रकाश और सुगंध का प्रभाव। सभी ओर इनकी आवश्यकताएं और इनका उपयोग समान है, वैसे ही प्रेम के अधीन मानुषिक चेतना भी सर्वमान्य है। प्रेम का वितान इतना व्यापक है कि धरा के प्रत्येक भाग में सहज उपलब्ध है। प्रेम इतना निर्दोष है कि केवल प्रस्तुत होना जानता है। प्रेम कालजयी है कि हर काल में कोरे मन का सा मनमोहक है और उसकी दैवीय सुगंध जब व्यापक होकर समूची धरा के कोरे मन के सामने प्रस्तुत हो तो तब क्या कोई सुखी ना होगा।

    आत्मज्ञान
    सुख का आज तक कोई सर्वमान्य समीकरण नहीं बन सका। चोर, चोरी करके खुश होता है। दानी दान देकर और मजदूर पत्थर उठाकर अलग-अलग व्यक्ति, अलग-अलग परिस्थितियों में सुख का अनुभव करते हैं और शायद तब तक करते रहेंगे जब तक कि सुख की चिर अभिलाषा का सत्य नहीं जान जाएंगे। सुख, संपत्ति नहीं, सौंदर्य भी नहीं, संतान या संबंध भी नहीं। वास्तव में सुख एक मूल्यांकनात्मक स्थिति है, जहां हम स्वयं निर्णय करते हैं कि जीवन में क्या और कितना पाया? खोने की तुलना में अगर प्राप्तियों का पलड़ा भारी हुआ तो मानिए कि आप सुखी हैं।

    संघर्ष
    गौतम बुद्ध ने दुख के खिलाफ अपने वर्षों के संघर्ष के बाद हमें यह सूत्र दिया कि क्रसुख को चिर मानना ही दुख का एक बड़ा कारण है, जबकि सुख तो क्षणिक है। संघर्ष के बाद उपजी अनुभूति सुख है। जितना बड़ा संघर्ष सुख भी उतना बड़ा।ञ्ज थियोडोर रूजवेल्ट ने कहा था कि इतिहास आसान जीवन जीने वालों को याद नहीं रखता, इसलिए आरामतलबी को छोड़ते हुए हमें संघर्ष कर उससे प्राप्त सुख का भोग करना चाहिए। संघर्ष की चेतना कहीं-न-कहीं सुख की अदम्य इच्छा से हमेशा प्रेरित रही है।

    सुख के सूत्र

    एक राजा था। तमाम ऐश्वर्य थे। नौकर-चाकर थे। बीवियां थी। बांदियां थीं। खजाने थे। गहने थे। राग थे। रंग थे। पर न जाने क्या था कि राजा का रंग जर्द हुआ जाता था। दुनिया भर के हकीम आए, पर कोई लाभ न हुआ।आखिर में किसी ने कहा कि क्यों न किसी सुखी आदमी को तलाशा जाए, वही राजा का दुख दूर करेगा। एक दिन राजा ने खेत में हल चलाते किसान को देखा। वो जितना पसीना बहाता, उतना ही हंसता, गाता जाता। राजा उसे देर तक देखता रहा। सोचता रहा कि क्या मैं कभी ऐसी बेफिक्र हंसी हंसा हं? राजा ने जब किसान से उसकी हंसी का राज पूछा तो उसने कहा, आनंद का फॉर्मूला बहुत आसान-सा है। ये मिट्टी और ये पसीना इन्हें मिला दो बस ख़ुशी तैयार और जीवन का आनंद लेते हुए जिओ।

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