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    Home»इंडिया

    हिमाचल प्रदेश: मण्डी नगर और शिवमन्दिर में बसी आस्था

    ShagunBy ShagunNovember 5, 2021Updated:November 5, 2021 इंडिया 2 Comments7 Mins Read
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    Post Views: 1,380

    आशा शैली

    हिमाचल प्रदेश में कुल मिलाकर बारह जिले हैं। प्रत्येक जिले की अपनी देव-परम्पराएँ और मेले त्यौहार हैं। इनमें से कुछ तो देश भर में विख्यात हैं और कुछ को अब विश्व स्तर पर भी पहचान मिलने लगी है। इन विख्यात त्यौहारों में कुल्लू का दशहरा, किन्नौर का फ्लैच, रामपुर का लवी मेला, चम्बा का मिंजर और मण्डी की शिवरात्रि आदि की गणना की जा सकती है। इन मेलों में एक बात जो समान है वह है देवताओं की सहभागिता। पूरे प्रदेश में देवताओं की सहभागिता को विशेष महत्व दिया जाता है और इनके प्रति इस प्रकार का व्यवहार अमल में लाया जाता है जैसे वह हम-आप जैसे ही हो किन्तु हमसे उच्च और विशिष्ट स्थान रखते हों। इस प्रकार आदर दिया जाता है जैसे किसी राजा-महाराजा को दिया जाए। लोग इन की पालकियों को सामने रखकर इस तरह नाचते-गाते हैं मानों देवता इन लोगों को देख रहा है और नाचने वाले इस प्रकार नृत्य मग्न होते हैं मानों देवता को प्रसन्न कर रहे हों। यही हिमाचल के मेलों की सबसे बड़ी विशेषता होती है वरना क्रय-विक्रय तो प्रत्येक मेले में होता ही है।

    हिमाचली मेलों की दूसरी विशेषता होती है वहाँ के लोकनृत्य, जिन्हें नाटी कहा जाता है, नाटी अर्थात् सामूहिक नृत्य।

    तो आइए कुछ बातें मण्डी नगर और उसकी शिवरात्रि की करें। इसके लिए हम आप को मण्डी ले चलते हैं, क्योंकि मण्डी जिले की सुन्दरता के लिए ही हिमाचल की सुन्दरता का बखान होता है।

    मण्डी नगर जो कि जिला मुख्यालय भी है, व्यास और सुकेती नदियों के संगम स्थल पर समुद्र तल से 760 मीटर के ऊँचाई पर बसा हुआ एक सुन्दर और रमणीक नगर है। इतिहासकारों के अनुसार यह स्थान कुल्लू और लाहुल-स्पिति जाने के मार्ग में पड़ता है इस लिए यह मैदानों और पहाड़ों को जोड़ने वाली एक कड़ी रहा है। व्यापार का केंद्र रहने के कारण ही सम्भवतया इस का नाम मण्डी पड़ गया हो, लेकिन मण्डी नाम माण्डव्य ऋषि से सम्बद्ध भी माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार माण्डव्य ऋषि ने इस क्षेत्र में तपस्या की थी। इस क्षेत्र में रियासतों की स्थापना जहाँ सातवीं ईस्वी पूर्व की मानी जाती है वहीं इस नगर की स्थापना बारे तथ्य है कि ईस्वी सन् 1526 में इसे मण्डी रियासत के शासक अजबरसेन ने बसाया था। इससे पूर्व इस स्थान पर घने जंगल हुआ करते थे।

    रियासत की राजधानी पुरानी मण्डी हुआ करती थी। इस जंगल पर सलयाणा के राणा गोकल का अधिकार था। लेकिन मण्डी में अजबरसेन का शासन था। राणा लोग राजाओं के अधीन ही रहते थे।
    कहा जाता है कि एक दिन अजबरसेन को स्वप्न दिखई दिया। जिसमें राजा ने देखा कि एक गाय जंगल में एक स्थान पर आकर खड़ी हो जाती है और उसके थनों से अपने-आप दूध बहने लगता है। जिस स्थान पर दूध गिर रहा था वहाँ राजा को एक शिवलिंग नजर आया। उपरोक्त स्वप्न राजा को निरंतर कई रातों तक दिखाई देता रहा। जब ऐसा बार-बार होने लगा तो राजा ने अपने मंत्रियों को पूरी बात सुनाई। सुनकर सब ने ही आश्चर्य व्यक्त किया और इस बात की खोज-बीन करने का परामर्श राजा को दिया। राजा ने खोज कराई तो पता चला कि यह मात्र स्वप्न ही नहीं था, अपितु ठोस वास्तविकता थी। वास्तव में उस जंगल में एक स्थान पर ऐसा ही होता था, जैसा राजा ने स्वप्न में देखा था। तब राजा अजबरसेन ने उस स्थान पर बाबा भूतनाथ (सदाशिव) का मन्दिर बनवाया और अपनी राजधनी पुरानी मण्डी से यहाँ ले आए और स्वयं भी सदाशिव के शरणागत हो गए।

    भारत की स्वाधीनता के पश्चात् जब रियासतों का भारत संघ में विलय और हिमाचल का गठन हुआ तो 1948 में मण्डी, पांगणा और सुकेत की तीन छोटी-छोटी रियासतों को मिला कर इस क्षेत्र को भी जिले का रूप दिया गया और जिला मण्डी नाम दिया गया। वर्तमान में इस जिले का क्षेत्रफल 4018 वर्ग किमी. है।

    इस समय इस नगर में छोटे-बड़े कुल मिलाकर 85 मन्दिर हैं, किन्तु प्रमुख मन्दिर आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व व्यास नदी के किनारे पर तत्कालीन मण्डी नरेश विजयसेन की माता द्वारा बनवाया गया था। इस मन्दिर का नाम साहबानी है। मन्दिर में ग्यारह रुद्रों के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं की बहुत सी सुन्दर और कलात्मक मूर्तियाँ भी स्थापित की गई हैं। इसके अतिरिक्त अर्धनारीश्वर, पंचवक्त्र महादेव मन्दिर, त्रिलोकनाथ मन्दिर, जालपा (भीमाकाली) आदि अन्य देवी-देवताओं के भी मन्दिर हैं, परन्तु अधिक मात्रा शिव मन्दिरों की ही है। इन्ही शिव मन्दिरों के कारण इसे छोटी काशी कहा जाता है।

    मण्डी रियासत के अधिकतर शासक शैव रहे हैं इसीलिए यहाँ शिवमन्दिरों की बहुतायत है। त्रिलोकीनाथ मन्दिर राजा अजबरसेन की रानी सुल्तान देवी ने अपने पति की सुख-समृद्धि के लिए बनवाया था इसका निर्माणकाल 1520 ईस्वी के आस-पास बताया जाता है। इस दृष्टि से त्रिलोकी नाथ मन्दिर पहले बना और भूतनाथ मन्दिर बाद में परन्तु भूतनाथ मन्दिर की मान्यता और प्रसिद्धि अधिक है। मण्डी का शिवरात्रि मेला भी भूतनाथ मन्दिर से ही प्रारम्भ हुआ माना जाता है। ईस्वी सन् 1527 की शिवरात्रि को इस मन्दिर की प्राणप्रतिष्ठा की गई और उसी दिन से यह मेला प्रारम्भ किया गया जो अब पूरे भारत में विख्यात हो चुका है। मण्डी नगर और शिवरात्रि एक-दूसरे के पर्यायवाची बन गए हैं। घरों में पकवान बनने लगते हैं और कानों में गूंजने लगते हैं स्वर खरनाली, हरणसिंगे और ढोल की थाप के। अभी तक शिवरात्रि का मेला मण्डी में सात दिन तक चलता है। इस मेले में पूरे प्रदेश ही नहीं भारत के अन्य स्थानों के लोग भी स्थानीय देवताओं की ही तरह भाग लेते हैं। लेकिन इस मेले में अधिक सहभागिता हिमाचल सरकार की ही रहती है क्योंकि यह मेला अब विशुद्ध सरकरी तंत्र पर निर्भर हो कर रह गया है।

    मण्डी वासियों की मान्यता है कि सूखा पड़ने की स्थिति में व्यास का इतना जल शिवलिंग पर चढ़ाया जाए कि पानी पुनः व्यास में मिलने लगे तो वर्षा हो जाती है। अतः सूखे की स्थिति में लोग आज भी घड़े भर-भर पानी शिवलिंग पर चढ़ाते हैं और इसकी निरंतरता को तब तक बनाए रखा जाता है, जब तक पानी की धारा व्यास में न मिलने लगे।

    मण्डी का शिवरात्रि मेला भी हिमाचल के अन्य मेलों की ही भान्ति उन्हीं सारी परम्पराओं का निर्वाह करता है जिनका अन्य मेले करते हैं परन्तु प्रगति की अन्धी दौड़ में पुरातन कहीं खोता जा रहा है। नगर में नवनिर्माण के नाम पर बस्तियाँ मन्दिरों के प्रागणों तक पफैलती जा रही हैं। नगर के मध्य भाग में राजा सिद्धिसेन का बनाया सुभाष पार्क है, जिसके एक कोने में मन्दिर और दूसरे कोने में सार्वजनिक शौचालय है। जिसकी सफाई न होने से साथ में ही बने पुस्तकालय एवं पाठशाला में बैठना भी दूभर हो जाता है। मन्दिरों का रख-रखाव भाषा एवं कला संस्कृति विभाग के सुपुर्द होने से मन्दिर सुरक्षित हैं लेकिन नगर अपना ऐतिहासिक महत्व खोता जा रहा है। मन्दिरों के पुजारी ध्ूप जला कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। जहाँ एक भ्रांत-क्लांत मन विश्राम और शान्ति की आशा लेकर आने पर एक भी हरी शाखा न पाकर नदी किनारे के गोल और सूखे पत्थरों के दर्शन कर लौट जाते हैं।

    सेरी रंगमंच की दर्शकदीर्घा की सीढ़ियाँ उखाड़ दी गई हैं, जहाँ बैठकर लोग शिवरात्रि और अन्य विशेष समारोहों का आनन्द लेते थे। इस विकास से तो यह आभास हो रहा है कि किसी समय छोटीकाशी खोज का विषय बन जाएगी और मण्डी के 85 मन्दिर शोध का विषय बन जाएंगे।

    Shagun

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    2 Comments

    1. tlovertonet on December 18, 2023 5:31 am

      I think this is among the most vital information for me. And i am glad reading your article. But wanna remark on few general things, The site style is perfect, the articles is really great : D. Good job, cheers

      Reply
    2. tlover tonet on March 4, 2025 8:29 pm

      I’ve been absent for a while, but now I remember why I used to love this blog. Thank you, I will try and check back more frequently. How frequently you update your website?

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