रस्म अदायगी करता हिंदी दिवस

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हिंदी दिवस पर विशेष :

देश को आजादी मिलने के बाद से ही हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के लिये महात्मा गांधी पुरजोर कोशिश में लगे थे। इन्होंने देश की दो भाषाओं को राष्ट्रभाषा बनाने की मुहिम चला रखी थी। उस वख्त देश में एक हिंदी विरोधी गुट द्वारा इसका घोर विरोध किया गया और वह गुट अंग्रेजी को ही राज्य भाषा बनाये रखने के पक्ष में था। वर्ष 1949 में भारत की एक संवैधानिक समिति इस तरह की समझौते पर पहुंची थी जिसे मुंशी-आयंगर समझौता कहा जाता है। इसके बाद जिस भाषा को राजभाषा के तौर पर स्वीकृति मिली वह हिंदी की (देवनागरी लिपि में) थी।

भारत मे सबसे अधिक बोली जाने वाली हिन्दी भाषा को एक तकनीकी भाषा एवं रोजगार परक भाषा बनाने की सबसे अधिक आवश्यकता है। देश में हमें हिंदी दिवस मनाते हुये आज पूरे 72 वर्षों से अधिक का समय गुजर चुके हैं। हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में हमारे भारतवर्ष में इन दिनों केंद्र से लेकर राज्य सरकारों के महकमों में कहीं पर सप्ताह भर, तो कहीं पंद्रह दिनों तक और देश के कुछ प्रांतों से लेकर अनेकों संस्थानों में तो पूरे महीने भर हिंदी दिवस मनाया जाता है।

इस बात में किसी तरह की सन्देह नही है कि आज भी देश के कुछ लोगों के मन में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने और इस भाषा के प्रति अगाध प्रेम रखने के कारण इसे राजभाषा के रूप में ही अपनाते चले आ रहे हैं और इस भाषा का प्रचार-प्रसार भी करना चाहते हैं, लेकिन वास्तव में सच्चाई यह है कि अभी हाल ही में एक एक्टिविस्ट द्वारा आरटीआई के अन्तर्गत देश के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग से पूछे गये एक प्रश्न के उत्तर में विभाग द्वारा कहा गया है कि भारत के संविधान के अनुछेद 343 के अंतर्गत हिंदी संघ की राजभाषा है। भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा के विषय मे कोई उल्लेख नही मिलता है।

हमारा भारत शायद दुनिया का एक मात्र एक ऐसा देश हैं जिसके संविधान में अपने ही देश की राष्ट्रीय भाषा का कोई उल्लेख नही मिलता है। भारत देश के आजादी काल से अब तक हिंदी भाषा को संविधान द्वारा स्वविकृत राष्ट्रभाषा नही बनाया गया बल्कि 14 सितम्बर 1949 को संविधान के अनुछेद 343 में एक खंड को जोड़कर हिंदी को भारतीय संघ कि राजभाषा घोषित कर राष्ट्रभाषा के नाम पर सम्पूर्ण देशवासियो को गुमराह किया गया।

यह अकाट्य सच यह है कि अपने ही देश में हमारी अपनी ही भाषा हिंदी को वह सम्मान व स्थान नहीं मिल सका जो कि उसे मिलना चाहिए था। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी (आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को भारत को गणतंत्र राष्ट्र का दर्जा मिलने के साथ राजेंद्र प्रसाद देश के प्रथम राष्ट्रपति बने। साल 1957 में वह दोबारा राष्ट्रपति चुने गए।) के द्वारा आज से साठ दशकों से भी अधिक समय पूर्व बड़े ही भारी मन से इस बात को कहा था कि कोई भी देश विदेशी भाषा द्वारा न तो उन्नति कर सकता है और न ही राष्ट्र के लोगों में राष्ट्रभावना की अभिव्यक्ति उत्पन्न कर सकता है, और जब तक देश में अंग्रेजी का आधिपत्य रहेगा तब तक स्वतंत्रता पर जनता का अधिकार भी अधूरा रहेगा। हां यह हो सकता है कि उन्होंने शायद यह शब्द अपने उन सहकारियों से सहयोग न मिलने के कारण उन्हें यह कहना पड़ा हों जो कि एक लंबे समय तक भारत में विदेशी भाषा का प्रभुत्व बनाए रखने के लिए जिम्मेदार थे।

विश्व का कोई भी देश ऐसा नहीं जहां अपनी भाषाओं का ऐसा अपमान होता हो जैसा हमारे देश में हुआ हैं और यह आज भी हो रहा है। चाहे सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 348 पर आधारित तर्क दिया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की कार्यवाही की भाषा अंग्रेजी कही गई है पर आम भारतीय और राष्ट्रभक्त भारतीय के लिए यह समाचार अत्यंत ही खेदपूर्ण है कि सितंबर वर्ष 2013 में हमारी हिंदी ही हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट में हार गई। 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो मिल गया और इसके लिए संविधान की धारा 343 से लेकर 352 तक की व्यवस्था कर यह कहा गया कि देवनागरी लिपि में भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी ही होगी एवं संघ के राजकीय प्रायोजनों के लिए भारतीय शब्दों का अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप होगा। यह कैसी विडंबना है कि भारत का एक नागरिक सूचना अधिकार के अंतर्गत प्रार्थना देकर सुप्रीम कोर्ट से विकलांगों के बारे में सूचना मांगा वह पत्र हिंदी में दिया गया था लेकिन उस पत्र का उत्तर उसे अंग्रेजी में मिलता है।

जानकारी मांगने वाले प्रार्थी ने आरटीआई कानून का हवाला देकर हिंदी में जवाब मांगा तो उत्तर मिला कि सुप्रीम कोर्ट की भाषा अंग्रेजी है। इस बात पर प्रार्थी मुख्य सूचना आयुक्त का दरवाजा भी खटखटाया था।

वर्ष 1970 में सुप्रीम कोर्ट ने भी राज नारायण की याचिका पर सुनवाई से इसलिए इंकार कर दिया था क्योंकि वह हिंदी में बहस करना चाहते थे। वर्ष 2004 में एक प्रमुख नागरिक राजकुमार कौशिक की एक याचिका को स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि हिंदी के अधिकार की पैरवी करने वाली यह याचिका हिंदी में थी। धीरे-धीरे ही सही देश की कुछ अदालतों में अब हिंदी और भारतीय भाषाओं को प्रवेश जरूर मिल गया है। लेकिन यहां यह प्रश्न उठता है कि हम कौन सा हिंदी दिवस और क्यों मनाते हैं? क्या इस दिवस को मनाने का कोई लाभ भी है या मात्र सरकारी आदेशों व निर्देशों का पालन करके केवल रस्में अदायगी भर पूरी की जाती है? – प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती

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