एक गुमनाम क्रन्तिकारी राजगुरु जिनको नहीं मिली वह पहचान

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स्वत्रंता संग्राम सेनानी राजगुरु की जयंती पर विशेष:

हम सभी देशवासी देश की आजादी के लिए अपने प्राणों से लेकर अपना सब कुछ निछावर करने वाले अनेकों स्वत्रंता संग्राम सेनानियों के हैरतअंगेज कारनामों एवं उनके नाम से बखूबी परिचित हैं लेकिन कुछ ऐसे भी स्वत्रंता संग्राम सेनानी थे जिनका नाम गुमनामी के अंधेरो में कहीं खो गया। ऐसे ही एक स्वत्रंता संग्राम सेनानी थे जिनका नाम राजगुरु था।

वैसे तो शहीद भगत सिंह से लेकर चंद्रशेखर आजाद जैसे नाम से हम लोगों बखूबी परचित हैं और ऐसे स्वत्रंतता सेनानियों के हैरतअंगेज कारनामो की कहानियाँ हम सभी ने सुन रखा है, लेकिन ऐसे स्वत्रंतता सेनानियों ने जिन्होंने फांसी के फंदे में झूल कर अपने प्राण देने वाले शहीदों में एक नाम राजगुरु है जिनके जयंती, जन्मस्थान, पुण्यतिथि एवं माता-पिता के नाम से देश के कुछ ही लोग अवगत होंगे।

राजगुरु का जन्म सावन के सोमवार को 24 अगस्त 1908 को पुणे जिला के खेडा नामक गॉव में हुआ था। उनका पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरु था।

शिवराम हरि राजगुरु चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी” से वे तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था, राजगुरु के नाम से नहीं। चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि जैसे क्रान्तिकारी उनके अभिन्न मित्र थे।

क्रांतिकारी राजगुरु को न केवल लोकमान्य तिलक का आर्शीवाद प्राप्त था बल्कि सावरकर के भाई बाबा सावरकर का भी सानिध्य उन्हें मिला, चंद्रशेखर आजाद के वे बहुत बड़े चहेते हुआ करते थे, जगदगुरु शंकराचार्य ने उनको व्रत रखने की आदत डाली और सांडर्स की हत्या के बाद नागपुर में आरएसएस के संस्थापक डा. हेडगेवार ने भी उनको अपने यहां शरण व आशीष दिया।

उनके छोटी उम्र केवल 6 वर्ष की आयु में उनके पिता का निधन हो जाने के बाद वे वाराणसी में विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे।

उनके जन्म के वर्ष यानीकि वर्ष 1908 में खुदीराम बोस को भी फांसी की सजा हुई थी, तो राजगुरु के विचार सुनकर लोग कहते थे कि उनके अंदर खुदीराम बोस की आत्मा प्रवेश कर गई है. जब वो छोटे थे उनके पुणे के पास उनकी कस्बे तालुका खेड के पास भीमा नदी पर बना एक पुराना पुल धंसने लगा था। लोगों का कहना था कि इस पुल को बचाने के लिए किसी बच्चे की बलि देनी होगी, यह सुन सभी मातायें उन दिनों डर के अपने बच्चों को आंखों से ओझल नहीं होने देती थीं। एक दिन उनकी मां ने देखा कि एक साधू उनके बेटे को बहुत देर से मोहमग्न होकर देखे जा रहा था तो वे डर गईं, साधु के पास जाकर पूछा महाराज से घूरने की वजह पूछी.साधु ने कहा ये कोई महान कार्य करने के लिए पैदा हुआ है, और यह कोई साधारण बच्चा नहीं है उनकी मां ने उन्हें उसी दिन से ‘बापू साहेब’ कहना शुरू कर दिया था।

बाबा राव सावरकर और हेडगेवार जैसे लोगों का प्राचीन परम्पराओं, संस्कृत भाषा समेत बाकी भारतीय भाषाओं से प्रेम जगजाहिर था, ऐसे में शिवराम राजगुरु जो संस्कृत पढ़ने के लिए घर छोड़कर चले गए थे का वैदिक ज्ञान उनके लिए चर्चा का विषय हुआ करता था। ऐसा कहा जाता है कि सांडर्स केस की सुनवाई के दौरान वो अंग्रेज जज को संस्कृत में जवाब दे देकर परेशान कर देते थे।

भारत भूमि में जन्मे दुदान्त क्रंतिक्रियों के बदौलत ही हमारा देश अंग्रेजो के चंगुल से आजाद होने में हमें कामयाबी मिली थी। – जी के चक्रवर्ती

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