नवेद शिकोह
पांच बरस पहले हम सब नरेंद्र मोदी को लेकर बहुत जज़्बाती हो गये थे। इन्हें आशा की किरण मानने लगे थे। मोदी मसीहा जैसी सूरत में उभरने लगे थे। नये भारत के एक नये तसव्वुर के साथ हम सब ने मोदी जी को बहुत उम्मीदों के साथ भारी बहुमत से जिताया।
जो सोचा वैसा बिल्कुल नहीं हुआ। ना नया भारत दिखा और ना राम लला का मंदिर। पांच साल इंतजार में आंखे पथरा गयीं।
जब मोदी आये थे तो भारत की उम्मीदों पर और मोदी की लोकप्रियता पर मीडिया ने खूब जगह दी। भारत की टाप मीडिया ने ही नहीं विदेश की विश्वसनीय मीडिया ने भी नरेंद्र मोदी पर विश्वास जताया।
इन्हें मसीहा कहा। आशा की किरण माना। लेकिन वक्त के साथ सबकुछ बदल जाता है। विश्व की सबसे चर्चित टाइम मैगजीन का ख्याल भी टाइम के साथ बदल गया। यहां तक आज का भारत यानी इंडिया टुडे ने भी इधर पांच वर्षो में बेरोजगारी के बढ़ गये ग्राफ पर आंसू बहाये है।
वक्त का जनाज़ा चार कांधों पर कब्रिस्तान नहीं जाता, कांधा देने वाले लोग बदलते रहते हैं।







