आजादी के दीवाने खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद्र चाकी

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इतिहास के आईने से
“उसे देखने रेलवे स्‍टेशन पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था. महज 18-19 साल के उस लड़के की आंखों में गज़ब की दृढ़ता थी. वो फर्स्‍ट-क्‍लास कम्‍पार्टमेंट से निकला और धीमे कदमों से बाहर खड़े तांगे की तरफ ऐसे बढ़ चला जैसे उस मस्‍तमौला को कोई फिक्र ही न थी… लड़का सीट पर बैठते ही जोश में चिल्‍लाया ‘बंदेमातरम’.” – मुजफ्फरपुर. द स्‍टेट्समन, 2 मई, 1908
30 अप्रैल, 1908. वो अमावस्‍या की रात थी, जिस रात मां काली की आराधना होती है. खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद्र चाकी मुजफ्फरपुर में थे. योजना एक ब्रिटिश जज डीएच किंग्‍सफोर्ड को बम से उड़ाने की थी. अगर बम से काम न बने तो दोनों के पास तीन रिवॉल्‍वर भी रखी थीं.
जैसे ही किंग्‍सफोर्ड के यहां से दो गाड़‍ियां निकली, पेड़ों के पीछे छिपे खुदीराम भागे और पूरी ताकत से बम फेंक दिया. जिस गाड़ी पर बम गिरा, उसमें किंग्‍सफोर्ड नहीं था. एक बैरिस्‍टर की बीवी और बेटी धमाके में मारे गए थे.
ये धमाका भले ही अपना तात्‍कालिक लक्ष्‍य हासिल न कर पाया हो, एक छाप जरूर पीछे छोड़ गया कि अंग्रेज इस देश के दुश्‍मन हैं और नौजवान अपने रास्‍ते में रोड़े डालने वालों को खत्‍म करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं.
अंग्रेज बौखला गए थे कि दो बंगाली नौजवान मुजफ्फरपुर तक आए, अपना टारगेट ढूंढा और बम फेंक फरार हो गए. खुदीराम और प्रफुल्‍ल ने शक से बचने के लिए अलग-अलग भागने का फैसला किया. प्रफुल्‍ल समस्‍तीपुर की तरफ निकले और खुदीराम ने कलकत्‍ता वाली रेलवे लाइन पकड़ ली.
प्रफुल्‍ल ने समस्‍तीपुर स्‍टेशन से मोकामा घाट का टिकट लिया. कपड़े और जूते बदल डाले ताकि पहचान न हो सके. चारों तरफ अंग्रेजों का पहरा था. उसी ट्रेन में बंगाली पुलिस का एक दरोगा नंदलाल भी सफर कर रहा था. नंदलाल भांप गया कि ये लड़का कुछ ठीक नहीं. उसने बंगाली में बात करना शुरू कर दिया.
एक स्‍टेशन पर ट्रेन रुकी तो प्रफुल्‍ल पानी पीने उतरे. नंदलाल ने वहीं से ब्रिटिश पुलिस को अर्जेंट टेलीग्राम भेजा. ट्रेन जैसे ही मोकामा पहुंची, नंदलाल ने इशारा किया और पुलिसवालों ने प्रफुल्‍ल को दबोच लिया. प्रफुल्‍ल नौजवान था, वो फट पड़ा. ‘तुम भी तो बंगाली हो और एक बंगाली को ऐसे पकड़वाते हो!’
प्रफुल्‍ल ने दो पुलिसवालों को धक्‍का देकर वहां से भागने की कोशिश की. जब एहसास हुआ कि ज्‍यादा दूर तक बचना मुश्किल है तो अपनी रिवॉल्‍वर निकाली और खुद को गोली मार ली. प्रफुल्‍ल चाकी बंगाल के पहले शहीद कहे जाते हैं.
मुजफ्फरपुर से कोई 20 किलोमीटर दूर वैनी स्‍टेशन के पास से खुदीराम को पकड़ा गया. बम फेंकने वाला पकड़ा गया है, ये ख़बर जंगल में आग की तरह फैल चुकी थी. थाने के बाहर भीड़ जमा हो चुकी थी. लोगों ने उस मासूम लड़के का चेहरा देखा जो पुलिस जीप में बैठते ही चिल्‍लाया ‘बंदेमातरम!’
इस लड़के को भनक नहीं थी कि उसका दोस्‍त मारा जा चुका है. उसने हत्‍या की पूरी जिम्‍मेदारी अपने सिर ले ली. जब वो बयान दर्ज करा चुका था, तब प्रफुल्‍ल की लाश मुजफ्फरपुर पहुंची. खुदीराम ने अपने दोस्‍त को पहचान लिया, मगर गोरों को यकीन न हुआ. उन्‍होंने प्रफुल्‍ल का सिर कटवाया, उसे स्प्रिट में डुबोया और फिर शिनाख्‍त के लिए कलकत्‍ता पुलिस के पास भिजवा दिया.
11 अगस्‍त, 1908. खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई. हंसते-मुस्‍कुराते वो लड़का सिर्फ 18 साल, 7 महीने और 11 दिन की उम्र में देश के लिए कुर्बान हो गया.

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