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    लोकतंत्र है तो सरकार से ही पूछे जायेंगे सवाल, आप मना तो करो, सब करना छोड़ देंगे सवाल

    By May 15, 2020Updated:May 15, 2020 Current Issues No Comments10 Mins Read
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    Post Views: 594

    राहुल कुमार गुप्त

     

    कोरोना का कहर एक युग परिवर्तन ओर! शीर्षक से हमारे कॉपी एडीटर राहुल कुमार गुप्त ने बहुत से प्रबुद्ध व चिंतनशील लोगों से ऑनलाईन सुझाव व विचार साझा किये हैं। यह इस शीर्षक का छठवाँ क्रम है जिसमें वरिष्ठ छात्र नेता सर्वेश यादव से कोरोना के दौर पर भारत व उसके बाद के भारत पर परिवर्तन को लेकर ऑनलाइन विचार व सुझाव साझा किये गये हैं। जो वाकई में अनुकरणीय हैं, जिससे देश में सुख-शांति का माहौल स्थापित हो।

    इस मुद्दे पर समाजवादी छात्रसभा के निवर्तमान प्रदेश महासचिव सर्वेश यादव ने अपने चिर-परिचित अंदाज में अपनी बातें कहना शुरू कीं। उन्होंने कहा-

    गर यहाँ लोकतंत्र है तो लब आजाद रखो।
    अगर नहीं, तो सरकार के खौफ़ से डरो!!

    उन्होंने बताया कि कोरोना का कहर वर्तमान में जितना विश्व को प्रभावित कर रहा है हो सकता है भविष्य में ये महाविषाणु खुद को म्यूटेट व जेनरेट कर और शक्तिशाली रूप में आकर अपना और विकराल रूप दिखाये। हमें आने वाले वक्त के लिये भी सजग रहना पड़ेगा। पड़ोसी देश चीन में इस वायरस ने इतना कहर बरपाया पर हमारे देश की सरकार, शुरुआती दौर पर इस वायरस को लेकर संवेदनशील नहीं रही।

    हो सकता है कि हमारे देश की जाँच एजेंसियों की कमी रही हो, या वहाँ बैठे राजदूत ने सही वक्त पर सरकार को आगाह न किया हो, यहाँ के समाचार एजेंसियों के एजेंट भी सही वक्त पर खबर न दे पाये हों। लेकिन राहुल गाँधी ने तो फरवरी में ही सरकार को सचेत कर दिया था फिर भी सरकार तमाम आयोजनों में लगी रही। यही कटु सत्य भी है। सही वक्त पर सही कदम उठाया गया होता तो शायद आज भारत इन विषम परिस्थितियों से जूझ न रहा होता। मोदी जी ने कहा कि एयरलाईंस में स्क्रीनिंग जनवरी से ही शुरू हो गयी थी।

    यह सरकार की तेजी ही थी लेकिन सरकारी अधीनस्थों को क्या, वो आज जैसे इस मामले को लेकर कतई सख्त नहीं थे और इतनी सख्ती दिखाने के लिये न ही उन पर शायद कोई विशेष दबाव रहा हो। जिस कारण से विदेशों से आने वाले कोरोना पीड़ित भारतीय व विदेशी भारत के शहरों में अंदर आ गये। बेरोक-टोक घूमते भी रहे और कोरोना को फैलाने में अहम भूमिका भी निभाते रहे। इनमें से अधिकतर पढ़े-लिखे लोग व हाई सोसाइटी के लोग थे। विदेशों से आने वाले जमातियों की चेकिंग भी नहीं हुई। दिल्ली पुलिस ने निजामुद्दीन मरकज के मामले में भी काफी ढिलाई दे रखी थी। सवाल बहुत से हैं जो हर राष्ट्रप्रेमी को पूछने चाहिए।

    लोकतंत्र है तो सरकार से ही पूछे जायेंगे सवाल।
    आप मना तो करो, सब करना छोड़ देंगे सवाल ।।

    हमारे देश में ही नहीं अपितु पूरे विश्व के लिये विपदा का वक्त है। देश की जनता को संतुष्ट करना व उनको सुरक्षित रखना भी सरकार का दायित्व है। भारत में जनता ने सरकार का पूरा सहयोग किया है और कर रही है। सरकार को भी जनता का पूरा ख्याल रखना चाहिए और सरकार भी कोशिशें कर रही है। कई जगह बहुत सी अव्यवस्थाएं देखने और सुनने में आती हैं। इन अव्यवस्थाओं के कारण जनता का सरकार के प्रति विश्वास कम होता नज़र आ रहा है। मीडिया और आईटी सेल द्वारा इस महादुःखद वक्त में भी हिंदू-मुस्लिम की राजनीति खेली जा रही है। सौहार्द की पावनता को नफ़रत की ईर्ष्या से खत्म किया जा रहा है। जबकि इस विपदा काल में सब सरकार का सहयोग कर रहे हैं। यहाँ मात्र कुछ भ्रमित लोगों की वजह से पूरे एक कौम को बदनाम करने की साजिश शुरू हो जाती है जो कि मीडिया व सोशल मीडिया में खूब देखने को मिलती है।

    मीडिया तमाम सकारात्मक खबरों से मुँह मोड़ लेती है जो सौहार्दता को बढ़ावा देती है, नफ़रत को खत्म करती है। बहुत सी सकारात्मक खबरें जो सौहार्दता व प्रेम बढ़ाने वाली हैं वो आप सबको अपने आसपास देखने को मिल जायेंगी। लेकिन बड़े जन समूह को प्रभावित करने वाले मीडिया को इन खबरों से शायद ही कोई सारोकार हो। हमारे व आपके ही जानने वाले न जाने कितने हिंदू-मुस्लिम सिख, ईसाई भाई सब, बिना जाति-पाति व धर्म देखे सबकी सेवा में लगे हुए हैं। यही प्रेम भारत के प्राण हैं, यही सौहार्दता भारत की आत्मा! लेकिन राजनीति के चलते भारत की आत्मा पर लगातार हमला हो रहा है। नफ़रत के राकेट रोज दागे जाते हैं। इससे भारत में आज नहीं तो आने वाले कल पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है। फिर भी इन सबको दरकिनार कर यहाँ कि जनता देश के लिये देशहित में ही कार्य करती है।

    भारत की जनता में धैर्य बहुत है। वो अपनी आजीविका खत्म कर पिछले कई दिनों से अनचाहे लॉकडाउन का पालन कर रही है। लेबनान व बेरूत जैसे हाल नहीं हैं यहाँ।

    आमजनों में भी कई लोग लॉकडाउन लागू होने के साथ ही इससे उत्पन्न अव्यवस्थाओं को सोशल मीडिया पर बताना शुरू कर चुके थे। देश के उच्च कान उन्हें सुनने के बजाय खुद पे, इस बात को लेकर विश्वास कर रहे थे, आश्वस्त थे कि जनता ने थाली बजायी, जनता ने दिये जलाये तो जनता भूखे पेट भी उनके हर फैसलों के साथ रहेगी। जनता ने तो काफी सुना, जब हमारी सरकारें ही तमाम प्रवासी मजदूरों को, मजबूरों को खाना-पानी नहीं उपलब्ध करा पा रहीं थीं तब ही उन सबका धैर्य टूटने लगा। तभी उनको अपनी कर्मस्थली छोड़ने पर विवश होना पड़ा। देश ने बहुत सी ऐसी तस्वीरें देखीं हैं और देख रहा है जो आँखों को नम व दिल को तड़पा सा देता है। काश् आमजन के समक्ष इस तरह के भयावह दृश्य से पहले ही सरकार कोई ठोस निर्णय ले लेती तो अच्छा होता। देश की गरीब जनता जो इस महाविषाणु के साथ महायुद्ध में एक सैनिक की तरह ही कार्य कर रही है, देश को सहयोग दे रही है। वो भी अपने व अपने बच्चों के भूखे पेट के लिये चिंतित न होती। ऐसा नहीं है सरकार प्रयास नहीं कर रही, वो सब कुछ बड़ी तन्मयता के साथ कर रही है किंतु कई जगह उसके अधीनस्थ उस व्यवस्था को जनता तक कैसे व कितना पहुँचा रहे हैं। यह भी सरकार को सख्ती से देखना होगा।

    अब लगभग दो माह के अनचाहे लॉकडाउन के बाद भी देश में कोरोना के मरीजों की संख्या कम होती नज़र नहीं आ रही, आंकड़ा 78000 के पार पहुंच चुका है और देश की अर्थव्यवस्था भी काफी टूट सी गयी। करोड़ों लोग बेरोजगार हो गये, करोड़ों का भविष्य दांव पर लग गया है।

    यह सब दूरदर्शिता में कमी होने का भी नतीजा ही है। जिसके कारण केंद्र सरकार को देश के जीडीपी का 10 प्रतिशत हिस्सा विशेष आर्थिक पैकेज के लिये तय करना पड़ा है। चलो वक्त ने आत्मनिर्भरता की नयी परिभाषा देश को या कहिये पूरे विश्व को सिखा दी है। अब वह कितना इस पर अमल करते हैं, यह तो वक्त ही बतायेगा। अगर आत्मनिर्भरता पर पहले से ही देश जोर दे रहा होता, लोकल पर जोर दे रहा होता, ग्लोबल पर नहीं, तो विदेशी निवेशकों के लिये शत-प्रतिशत एफडीआई में छूट कतई न देने का प्रावधान बना रहता। इसी 100 प्रतिशत को न करने के लिये जब भाजपा विपक्ष में थी, तो काफी विरोध किया था। और सत्ता में आने पर अपने उसी विरोध को भूल कर एफडीआई को शतप्रतिशत कर दिया। इस बिना होमवर्क के लॉकडाउन से करोड़ों आत्मनिर्भर युवाओं की आजीविका छिन गयी है। सरकार द्वारा हाल ही में घोषित ये बड़ा पैकेज कहीं जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों व बड़े उद्योगपतियों के लिये मलाई बनकर न रह जाये। सरकार को इस दिशा में बहुत सख्त और योजनाबद्ध तरीके से कदम उठाने होंगे। ताकि लाभ, जरूरतमंद तक ही पहुंच सके।

    सरकार के साथ ही जनता भी यथासंभव हर जरूरतमंद की मदद में लगी हुई है क्योंकि हमारा देश धर्म प्रधान देश है। सभी धर्मों के लोग इस विपदा की स्थिति में मानव सेवा में लगे हुए हैं। नफ़रत के बीज बोने वाले लोग, इन मानवता के स्तंभों से कुछ सीख लें। इस नफ़रत के कोरोना से भी भारत को बचाना बहुत जरूरी है। मीडिया द्वारा आये दिन दिखाये जाने वाले हिंदू-मुस्लिम डीबेट भी कहीं न कहीं नफ़रत का ही बीज बोने का काम कर रहे हैं।

    अव्यवस्था के खिलाफ विपक्ष के लब खुलना शुरू हो चुके हैं, बात जब आमजन की आयेगी, देश की आयेगी तो विपक्ष या जनता कहाँ शाँत रहने वाली है। यही लोकतांत्रिक देश की बुनियाद है। सोनिया गाँधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव आदि ने रेलवे द्वारा या बसों द्वारा भूखे-प्यासे मजदूरों से पैसे लेने का मामले को सरकार की संवेदनहीनता ही बताया। आश्चर्य की बात ये है कि विदेशों से हवाई जहाज से लोगों को फ्री लाया गया है। इस वाकये से भी लोगों में सरकार के प्रति कुछ रोष तो जरूर उत्पन्न हुआ है।

    बहुत शर्मनाक है मजदूरों की बेबसी पे हँसना।
    उनकी फटी जेबों से पैसे निकालने पे अड़ना।।

    कांग्रेस ने भी देश की हालत को देखते हुए, नोबल विजेता अभिजीत बनर्जी व अमर्त्यसेन से विचार-विमर्श किया। देश को इस संकट से उबारने के लिये उन्होंने भी एक बड़े पैकेज की बात कही थी। सरकार ने भी कई अर्थशास्त्रियों के साथ विचार-विमर्श कर यह बड़ा फैसला लिया।

    सरकार अगर वाकई में देश की रीढ़ को मजबूत करना चाहती है तो हर कदम बहुत सोच-विचार कर उठाने पड़ेंगे। मैनेज मीडिया, सरकार के प्रति सदैव सकारात्मक खबरें चलाती रहती हैं, मात्र इसको लेकर अब निष्फिकर होने का वक्त नहीं है। लोगों में मीडिया को लेकर अब बहुत अच्छे व्यू नहीं रह गये हैं।

    मार्क ट्वेन ने भी सही ही कहा है कि अगर खबर नहीं देखेंगे तो जानकारी नहीं होगी, और देखेंगे तो सत्य नहीं देख पायेंगे। ज़मीन पर भी सरकार को खरा उतरना पड़ेगा। कोरोना रूपी महामारी के कम होने के बाद भी कोरोना से बचाव के लिये बहुत कुछ हम सबको भी बदलना पड़ेगा। करोड़ों मजदूरों की आजीविका छिन गयी है इस पर भी सरकार व राज्य सरकारों को अभी से उनके हित के लिये कुछ न कुछ करने के लिये भी सोचना होगा। कई राज्यों में नये लेबर कानून को लेकर विपक्षियों ने सरकार के घेरा भी। जिससे मजदूर भी इस नये कानून से डरे व सहमे हुए हैं।

    आर्थिक मंदी के दौर के साथ मजदूरों की संख्या अब बड़े शहरों में न होकर अपने-अपने गाँवों की ओर चल दी है, इससे श्रम के बहुत ही सस्ते होने के आसार हैं। अमीरी व गरीबी की एक बड़ी खाई खिंच जायेगी। पेट की आग और मूलभूत आवश्यकताओं के पूरा न होने पर लूट-खसोट की बढ़ती वारदातें भी भविष्य में नाकारी नहीं जा सकतीं। कोरोना के बाद का भारत भी बहुत से परिवर्तन लेकर आयेगा। लेकिन वर्तमान में चल रहे युद्ध को जीतने के साथ भविष्य भी सुधारने की जरूरत है। अभी दवा तो नहीं बन सकी, इसलिये हो सकता है हमें कोरोना से बचते-बचाते हुए ही जीवन यापन करना पड़े। इसके या इस जैसे किसी अन्य के बड़े दुष्प्रभाव से बचने के लिये अब हर वस्तुओं व सेवाओं के विकेंद्रीकरण का वक्त आ गया है।

    हर एक जिले में एक महानगर जैसी सभी सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहियें। ताकि भविष्य में ऐसी विषम परिस्थितियों से आसानी से लड़ा जा सके और बिना बहुत क्षति के इस तरह के महायुद्धों को आसानी से जीता जा सके। खान-पीन व स्वास्थ्य संबंधी चीजों को लेकर लोकल के प्रोडक्शन पर शुद्धता के लिये भी सख्ती से मानक तय करने पड़ेंगे, तभी लोकल का प्रभाव देश में व्यापक क्षेत्र में अपना असर बना पायेंगे। आशा है कि सरकार जरूर इन सभी मुद्दों पर ध्यान दे रही होगी। समय आने पर वो विभिन्न क्षेत्रों में आवश्यक परिवर्तन जरूर करेगी। लेकिन हमें अब मास्क, सैनेटाईजर, फिजिकल डिस्टेंसिंग, साफ-सफाई, खान-पीन में परिवर्तन, अपने शरीर की प्रतिरक्षा तंत्र बढ़ाने पर जोर देना आदि को अपनी जीवन शैली में उतार लेना चाहिए।

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