पितृ पक्ष: तर्पण से मिलेगी पितरों को मुक्ति

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1 – 2 सितंबर से शुरू हो रहे हैं पितृपक्ष

हिन्दू धर्म में समय-समय पर समस्त प्रकार के धार्मिक कर्मकांडो को मनाने के पीछे व्यक्ति से जुड़े विभिन्न प्रकार के अभीष्ट उद्देशों एवं हम मनुष्यों के अंदर चैतन्यता, कर्तव्यपर्णता एवं सामाजिक आदर्शों के प्रतिपालन के उद्देश्यों से हमारे पूर्वजों ने ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना की है।

पितृ पक्ष कुछ ज्योंतिषियों के मतानुसार पहली सितम्बर तो कुछ के अनुसार द्वितीय सितम्बर को आरंभ होगा। इस पितृपक्ष अवधि में पूर्वजों के लिए श्रद्धा पूर्वक किया गया दान, दक्षिणा एवं तर्पण के रुप में किया गया प्रत्येक कार्य हमारे पितरों तक पहुंचती है ऐसी मान्यता हमारे धर्म-शास्त्रों में वर्णित हैं। पितृपक्ष पक्ष को महालया या कनागत भी कहा जाता है। हिंदू धर्म के मान्यताओं के अनुसार पितर परलोक से कुछ समय के लिए पृथ्वी पर अपने पुत्र-पौत्रों को देखने के लिये आते हैं। ऐसी मान्यता हमारे धर्म शास्त्रों में वर्णित है।

किसी भी के द्वारा किया गया श्राद्ध संस्कार मृतक के लिए श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिण्ड दान एवं वस्तु दान ही श्राद्ध कहा जाता है। जिस भी मृतक के एक वर्ष तक के ऐसे सभी दैहिक क्रिया-कर्म सम्पन्न हो चुके होते हैं, उसी को पितर कहा जाता है। वायु पुराण में यह ऐसा उल्लेख मिलता है कि ‘मेरे पितर जो प्रेतरुप में अवस्थित हैं, वे मेरे द्वारा अर्पित किये गये तिलयुक्त जौ पिण्डों से तृप्त हों।

कैलेण्डर के अनुसार :

पहला श्राद्ध (पूर्णिमा श्राद्ध) -1 सितंबर 2020
दूसरा श्राद्ध -2 सितंबर
तीसरा श्राद्ध -3 सितंबर
चौथा श्राद्ध -4 सितंबर
पांचवा श्राद्ध -5 सितंबर
छठा श्राद्ध -6 सितंबर
सांतवा श्राद्ध -7 सितंबर
आंठवा श्राद्ध -8 सितंबर
नवां श्राद्ध -9 सितंबर
दसवां श्राद्ध -10 सितंबर
ग्यारहवां श्राद्ध -11 सितंबर
बारहवां श्राद्ध -12 सितंबर
तेरहवां श्राद्ध -13 सितंबर
चौदहवां श्राद्ध -14 सितंबर
पंद्रहवां श्राद्ध -15 सितंबर
सौलवां श्राद्ध -16 सितंबर
सत्रहवां श्राद्ध -17 सितंबर (सर्वपितृ अमावस्या)

हमारे प्राचीन ग्रन्थ साहित्य में वर्णित श्राद्ध का कारण क्योंकि सावन माह की पूर्णिमा से ही हमारे पितर पृथ्वी पर विचरण करने लगते हैं। ऐसे में वे नव प्रस्फुटित कुश की कोंपलों पर विराजमान होते हैं। श्राद्ध अथवा पितृ पक्ष में व्यक्ति जो भी पितरों के नाम से दान तथा भोजन कराते हैं उसे हमारे पितर सूक्ष्म रुप से ग्रहण कर आपने स्थान को पुनः लौट जाते है।

चूंकि इस तरह की मान्यताये हमारे देश मे बहुत लम्बे समय से चली आ रही है इसलिये हम सभी लोगों का यह कर्तव्य बनता है कि जिसे आने वाले दिनों में भी जारी रख कर हम हमारे पूर्वजों के संस्कारों का आगे भी अनुसरण करते रहें। इसी हमारी भारतीय परम्पराओं एवं संस्कारों के करण हम भारतीय लोग बाकी दुनियां के लोगों से पृथक हैं।

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