किसी के लिए गलत विचार न बनाएं

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शिघम्पुरा राज्य में सुदर्शन नाम का एक राजा राज करता था। एक दिन उसके राजमहल के द्वार पर एक साधु आया और वह द्वारपाल से बोला कि भीतर राज महल में जाकर राजा से कहो कि उनका भाई उनसे मिलने आया है।

उस साधु की बात सुनकर द्वारपालों ने यह अनुमान लगाया कि शायद यह साधु राजा के कोई दूर के रिश्तेदरी में राजा का भाई लगते होंगे जिन्होंने ग्रह त्याग कर संन्यास लेकर वन चले गये हों, और आज वह हमारे सामने साधु के भेसभूषा में खड़ा है!

द्वारपालों ने उनके भाई के आने की सूचना राजा को देते हुये कहा कि महाराज वे साधु के भेसभूषा में आपसे मिलने आये हैं यह सुनकर राजा थोड़ा मुस्कुराये और साधु को महल के भीतर बुलाकर अपने पास बैठा लिया।

साधु ने पूछा – कहो प्रिय अनुज, तुम्हारे क्या हाल-चाल हैं?

“मैं एक प्रकार से ठीक हूँ राजा बोले आप कैसे हैं भैया?”

इस पर साधु ने कहा- जिस राज्य के महल में मैं रहता था, वह अत्यधिक जर्जर एवं पुराना पड़ चुका है। अब तो यह हाल है कि कभी भी टूटकर गिर सकता है। मेरे सभी बत्तीस चाकर सभी मुझे छोड़ कर चले गये हैं। मेरे पाँचों रानियाँ भी अब वृद्ध हो चुकीं हैं अब उनसे को कोई काम-काज नहीं होता है।

साधु की यह बात सुनकर राजा अपने कारिंदों से कहा कि इन साधु महाराज को दस सोने के मोहरें दे दिया जाये।

साधु ने दस सोने के मोहरें की बात सुनकर बोला, भैया यह तो बहुत कम हैं।

साधु की बात सुनकर राजा बोला , इस दफे मेरे राज्य में सूखा-अकाल पड़ा गया है, आप इतने ही मोहरों से अपना काम चलायें।

तुरंत साधु ने उत्तर दिया – भैया मेरे साथ आप सात समंदर पार चलिये वहां पर सोने की खान हैं।

लेकिन समुद्र कैसे पार होंगे।

इस पर साधु बोले कि वहां मेरे पैर पड़ते ही समुद्र सूख जाएगा… मेरे पैरों की शक्ति तो आप पहले देख चुके हैं।
साधु से ऐसा सुन कर राजा ने उस साधु को सौ सोने के मोहरें देने का आदेश दिया।

वह साधु सौ मोहरों लेकर वहाँ से चला गया। उसके जाने के बाद मंत्रियों की आश्चर्य की सीमा न रही तब मंत्री से राजा पूछा, “ क्षमा कीजिये महाराज जहाँ तक मुझे ज्ञात हैं कि आपका कोई भी भाई नहीं है, फिर भी आपने उस महान ठग को इतना बड़ा इनाम दे दिया ऐसा क्यों ?”

राजा मंत्री को समझते हुए बोले, “ देखो, विधाता ने भाग्य के दो पहलु बनाये हैं। एक तो राजा और दूसरा रंक। इसलिये उसने मुझे मेरा भाई कह कर संबोधन किया।

रह गयी उसके जर्जर महल की बात तो उसका अभिप्राय यह था कि मेरे इस बूढ़े शरीर में बत्तीस दांतों में से लगभग सभी गिर गए हैं बाकी के तो तीन दांत भी पता नही कब गिर जायें उसके दांत थे और पांच वृद्ध रानियाँ, से मतलब मानव शरीर की पांच इन्द्रियों से हैं।

अब आती है समुद्र के बह जाने वाली बात तो यह कह कर उसने मुझे उलाहना दिया कि राजमहल में उसके पैर रखते ही सुख पड़ गया कि राजकोष भी सूख गया हो क्योंकि मैंने उस साधु को मात्र दस मोहरें देने के लिये कहा था जबकि मेरी औकात उसे सोने के मोहरों से तौल देने की है। अतः उसकी इस बुद्धिमात्तापूर्ण बातो से खुश होने पर मैंने उसे सौ सिक्के और देने के लिये कहा अब मैं उसे अपना सलाहकार नियुक्त करने का इछुक हूँ यह कह कर राजा ने अपने घुड़सवार को बुला कर उस आदमी को जो साधु के भेष उसके महल आया था उसे अपने राज महल में वापस लाने के लिये कहा।

इस तरह हमने देखा कि किसी व्यक्ति के बाह्य रूप-रंग रूप से उसकी बुद्धिमत्ता का आंकलन नही किया जा सकता है किसी भी व्यक्ति के खराब और फटे-पुराने कपडों को देख कर हमें वह भले ही अच्छा न लगे लेकिन किसी के लिए अपने दिलोदिमाग में गलत विचार नहीं बनाने चाहियें।

  • जी के चक्रवर्ती

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