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    इस दशहरा अपने रावण रूपी दस अवगुणों को जलाकर भस्म कर दें !

    By October 7, 2019 festival No Comments14 Mins Read
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    8 अक्टूबर: दशहरा पर्व विशेष- सफलता के लिए ईश्वर को केवल मानो मत, जानने की कोशिश भी करो!

    प्रदीप कुमार सिंह

    दशहरा हमारे देश का एक प्रमुख त्योहार है। मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं तथा रामलीला का आयोजन होता है। दशहरे का उत्सव रखा गया है। दस मुँह वाले रावण रूपी दस प्रकार के पापों-काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी का परित्याग करके अपने अंदर रामरूपी सद्गुणों को ग्रहण करना ही जीवन का परम उद्देश्य है। रावण के दस मुँह दस अवगुणों का प्रतीक हैं। दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है। सफलता के लिए ईश्वर को केवल मानो मत, जानने की कोशिश भी करो!

    भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो इस प्रसन्नता के अवसर को वह भगवान की कृपा मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उनका पूजन करता है। राजपाट से पहले वनवास घर लौटने के एक ‘वर्ष पूर्व पत्नी सीता का हरण, घर पहुँचने के बाद पत्नी सीता तथा पुत्र लव-कुश का त्याग, ऐसे दुर्भाग्य को भाग्य और परम सौभाग्य में बदलने की राम कथा केवल पढ़ने की चीज नहीं है वरन् इसमें शासन-प्रशासन, प्रजा-राजा, पिता-पुत्र, भाई-भाई, मित्र, पारिवारिक एकता तथा जाति-धर्म आदि की मर्यादाओं के पालन का बहुत बड़ा संदेश निहित है।

    मानव सभ्यता के पास जो इतिहास उपलब्ध है उसके अनुसार दयालु परमात्मा ने अपने अवतारों के संसार में अवतरण की प्रगतिशील श्रृंखला में 7500 वर्ष पूर्व निपट भौतिक बन गये अमर्यादित मानव जीवन को संतुलित एवं मर्यादित बनाने के लिए मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम को भेजा। रामायण पढ़ने से हमें इस बात की जानकारी मिलती है कि राम-रावण के बीच युद्ध हुआ था। यह तो बाहरी भौतिक युद्ध था। राम के पिता राजा दशरथ ने अपनी पत्नी कैकेयी को दो वर दे रखे थे। कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वर के अन्तर्गत पहला राम को 14 वर्ष वनवास तथा पुत्र भरत को राजगद्दी के रूप में मांग लिए। असली युद्ध तो राम को अपने अंदर तब लड़ना पड़ा जब पिता दशरथ की एक साथ दो आज्ञायें मिली जिसमें पहली आज्ञा दशरथ ने राम को 14 वर्ष वनवास जाने की दी तथा कुछ समय बाद ही दूसरी आज्ञा यह दी कि तू वन में नहीं जाना और यदि तू वन जायेगा तो मैं तेरे बिना जी नहीं सकूँगा तथा अपने प्राण त्याग दूंगा।

    पिता की पहली आज्ञा सुनकर राम आनंदित हो गये कि मुझे अपने पूज्य पिता जी की आज्ञा पालन करने का सुअवसर प्राप्त होने के साथ ही साथ मुझे वन में संत-महात्माओं के दर्शन करने एवं उनके प्रवचन सुनकर अपने जीवन में प्रभु की आज्ञाओं के जानने का सुअवसर मिलेगा तथा मुझे ईश्वर की आज्ञाओं का ज्ञान होगा एवं उन पर चलने का अभ्यास करने का सुअवसर प्राप्त होगा। किन्तु पिता की दूसरी आज्ञा सुनकर कि प्रिय राम तुम वन में न जाओ और यदि तुम वन गये तो मैं प्राण त्याग दूँगा। इससे राम के मन में द्वन्द्व उत्पन्न हो गया कि पिता की इन दो आज्ञाओं में से किस आज्ञा को माँनू? क्या करूँ, क्या न करूँ? मैं पिता की पहली आज्ञा मानकर वन में जाऊँ या पिता की दूसरी आज्ञा मानकर और वन न जाकर अयोध्या का राजा बन जाऊँ?

    राम ने अपने ऊपर आये इस संकट की घड़ी में हाथ जोड़कर परम पिता परमात्मा से प्रार्थना की और पूछा कि मैं क्या करूँ? पिता की पहली आज्ञा माँनू या दूसरी? राम को परमात्मा से उत्तर मिल गया। परमात्मा ने राम से कहा, तू तो मनुष्य है और हमने मनुष्य को विचारवान बुद्धि दी है। मनुष्य उचित-अनुचित का विचार कर सकता है। मनुष्य यह विचार कर सकता है कि मेरे किसी भी कार्य का अंतिम परिणाम क्या होगा? पशु यह विचार नहीं कर सकता। क्या तू अपनी विचारवान बुद्धि का प्रयोग करके उचित और अनुचित का निर्णय नहीं कर सकता? राम का द्वन्द्व उसी पल दूर हो गया। राम को यह विचार आया कि यदि राजा दशरथ के वचन की मर्यादा का पालन करने के लिए मैं वन में न गया तो पूरे समाज में चर्चा फैल जायगी कि राजा दशरथ पुत्र राम के मोह में अपने वचन से मुकर गया है। एक राजा के इस अमर्यादित व्यवहार के कारण समाज अव्यवस्थित हो जायगा। अतः मुझे वन अवश्य जाना है।

    राम ने प्रभु इच्छा को जानकर दृढ़तापूर्वक वन जाने का निर्णय कर लिया। राम ने यह निर्णय इस आधार पर लिया कि यदि राजा की 14 वर्ष वन जाने की आज्ञा के पालन तथा वचन की लाज एक बेटा नहीं रखेगा तो समाज में क्या सन्देश जायेगा? परमात्मा द्वारा निर्मित मानव समाज परमपिता परमात्मा का अपना निजी परिवार है तथा इस सृष्टि के सभी मनुष्य उसकी संतानें हैं। मित्रों, आप देखे, दशरथ की दृष्टि अपने प्रिय पुत्र के प्रति अगाध भौतिक प्रेम व अति मोह एवं स्वार्थ से भरी होने के कारण उनका राम को कई तरीके से वन न जाने की सीख देना तथा यदि फिर भी राम वन चले जाय तो प्राण त्यागने तक का निर्णय कर लेना परमात्मा एवं उसके समाज के व्यापक हितों के विरूद्ध है। वहीं दूसरी ओर उनके बेटे राम की दृष्टि आध्यात्मिक होने के कारण पिता की अतिवेदना की बिना परवाह किये हुए ही उनका वन जाने का निर्णय समाज को मर्यादित होने की सीख देने वाला था। मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने अपने जीवन से समाज को यह सीख दी कि मानव की एक ही मर्यादा या धर्म या कत्र्तव्य है कि यदि अपनी और अपने पिता की इच्छा और परमात्मा की इच्छा एक है तो उसे मानना चाहिये किन्तु यदि हमारी और हमारे शारीरिक पिता की इच्छा एक हो किन्तु परमात्मा की इच्छा उससे भिन्न हो तो हमें अपनी और अपने पिता की इच्छा का नहीं वरन् केवल परमात्मा की इच्छा और आज्ञा का पालन करना चाहिये। परमात्मा सबसे बड़ा है। वे सारी मानव जाति का पिता, माता तथा बन्धु-सखा है।

    इसी तरह सीता माता द्वारा लिया गया निर्णय संसार की स्त्रियों के लिए एक सुन्दर उदाहरण है। वन जाते समय राम अपनी पत्नी सीता से कहते हैं – हे जनक नंदनी, तुम वन जाने की जिद्द न करो। तुम सुकोमल हो। वन की भयंकर तकलीफों को तुम सहन नहीं कर सकोगी। हे सीते, तुम वन में न जाओ और तुम महल में ही रहो। पति राम की यह आज्ञा सुनकर सीता दुःखी हो गई और सोचने लगीं कि ‘क्या करूँ और क्या न करूँ?’ सीता के मन में द्वन्द्व शुरू हो गया। सीता ने संकट की इस घड़ी में हाथ जोड़कर परमात्मा का स्मरण किया। सीता को अंदर से उत्तर मिल गया। सीता तू मनुष्य है तूझे विचारवान बुद्धि मिली है। पति संकट में हो और यदि पत्नी साथ नहीं देगी तो परमात्मा के व्यापक समाज में परिवार की संस्था ही कमजोर पड़ जायगी। तू अपने पति की आज्ञा को मानकर यदि तू वन में न गई तो समाज में गलत सीख चली जायेगी और सभी स्त्रियां ऐसा ही आचरण करेंगी। परमात्मा द्वारा निर्मित समाज ही कमजोर हो जायगा। सीता ने निश्चय किया कि मैं परमात्मा द्वारा निर्मित समाज के लिए गलत उदाहरण नहीं बनूँगी और प्रभु इच्छा के पालन के लिए वन जाऊँगी और सीता वन न जाने की राम की आज्ञा को तोड़कर उनके साथ वन गयी।

    प्रभु की राह से विमुख होकर पिता दशरथ समाज को गलत सीख देकर संसार से चले गये। बेटे राम ने वन जाने का निर्णय लेकर पिता के वचन की लाज बचाने की मर्यादा संसार में स्थापित की। प्रभु की इच्छा के विरूद्ध जाने का दण्ड बहुत खतरनाक है। आज राजा दशरथ का नाम लेने वाले कम लोग हैं। सीता तथा राम के अनेक मंदिर हैं। दशरथ का एक भी मंदिर नहीं है। प्रभु की राह चलने के कारण संसार में युगों-युगों तक जय सिया-राम होती रहेगी जो भगवान की राह पर धैर्यपूर्वक सहन करते हैं परमात्मा उनकी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ा देता है। यदि राम अपने पिता का त्याग कर प्रभु इच्छा के पालन के लिए वन को न गये होते, यदि सीता अपने पति राम की इच्छा का उल्लंघन कर प्रभु प्रेम के लिए वन न गई होती तो समाज की क्या स्थिति होती? सम्पूर्ण समाज मर्यादा विहीन बन गया होता। सर्वत्र रावण जैसे दबंग एवं मर्यादाविहीन व्यक्तियों का राज होता। युग-युग में परमात्मा की ओर से संसार में युगावतार के रूप में आकर साधु प्रवृत्ति के लोगों का कल्याण करते हैं तथा दुष्ट प्रकृति के लोगों का विनाश करते हैं। मनुष्य को उसके कत्र्तव्यों का बोध कराकर उसके चिन्तन में परिवर्तन कर देते हैं। युगावतार जादू की छड़ी घुमाकर सारे दुःख दूर नहीं करते वरन् भारी कष्ट उठाकर मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन जीने की राह दिखाते हैं।

    हनुमान ने परमात्मा को पहचान लिया और उनके चिन्तन में भगवान आ गये तो वह एक छलाँग में मीलों लम्बा समुद्र लांघकर सोने की लंका पहुँच गये। हनुमान में यह ताकत परमात्मा की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लेने से आ गयी। प्रभु भक्त हनुमान ने पूरी लंका में आग लगाकर रावण को सचेत किया। हनुमान के चिन्तन में केवल एक ही बात थी कि प्रभु का कार्य के बिना मुझे एक क्षण के लिए भी विश्राम नहीं करना है। हनुमान ने बढ़-चढकर प्रभु राम के कार्य किये। हनुमानजी की प्रभु भक्ति यह संदेश देती है कि उनका जन्म ही राम के कार्य के लिए हुआ था। हमें भी हनुमान जी की तरह अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रभु का कार्य करना चाहिए।

    लंका के राजा रावण ने अपने अमर्यादित व्यवहार से धरती पर आतंक फैला रखा था। राम ने रावण को मारकर धरती पर मर्यादाओं से भरे ईश्वरीय समाज की स्थापना की। चारों वेदों का ज्ञाता रावण ने अपनी इच्छा पर चलने के कारण अपना तथा अपने कुटुम्ब का विनाश करा लिया। जबकि जटायु, रीक्ष-वानरों, केवट, शबरी आदि ने प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचानकर प्रभु का कार्य किया।

    विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी धर्मों के बच्चे तथा सभी धर्मों के टीचर्स एक स्थान पर एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना का यही सही तरीका है। सारी सृष्टि को बनाने वाला और संसार के सभी प्राणियों को जन्म देने वाला परमात्मा एक ही है। सभी अवतारों एवं पवित्र ग्रंथों का स्रोत एक ही परमात्मा है। हम प्रार्थना कहीं भी करें, किसी भी भाषा में करें, उनको सुनने वाला परमात्मा एक ही है। अतः परिवार तथा समाज में भी स्कूल की तरह ही सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करें तो सबमें आपसी प्रेम भाव भी बढ़ जायेगा और संसार में सुख, एकता, शान्ति, न्याय एवं अभूतपूर्व भौतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि आ जायेगी। मानव जाति को समझदारी के साथ सर्व-धर्म समभाव से ओतप्रोत ऐसा प्रार्थना भवन बनाना है जिसमें एक ही छत के नीचे अब सब धर्मों की प्रार्थना हो।

    अन्त में विश्व परिवर्तन मिशन का एक समर्थक होने के नाते हमारी राम राज को धरती पर उतारने की कल्पना का आर्थिक आधार स्तम्भ इस प्रकार है – वास्तव में प्रजातंत्र में देश एक स्टाॅक कंपनी होती है जिसका शेयर होल्डर यानी कि मूल मालिक वोटर होता है, जिसका लाभांश वोटरशिप की नकद धनराशि वोटरों को बेशर्त हर माह मिलनी चाहिए। यह इतिहास की एक सच्चाई है कि एक जमाना था जब राम, कृष्ण जैसी विश्वात्मायें तथा राम भक्त हनुमान, सुग्रीव, युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, रानी लक्ष्मी बाई, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी मलहार राव होलकर, रानी दुर्गावती, महाराज रणजीत सिंह आदि जैसे महान महाराजा तथा महारानी खुद लड़ने युद्ध भूमि में अपनी सेनाओं के साथ जाते थे अब दुनिया भर के देशों के राजाओं का समूह सुरक्षित स्थान पर बैठकर सेनाओं को लड़ाते हैं। विश्व भर में जनता मरती है राजा लोग अपना इतिहास बनाने की दिखावटी सच्चाई में जीते हैं। जो लोग इतिहास से सबक नहीं सीखते उन अहंकारियों के कारण मानव जाति को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।

    जंगल कट रहा था लेकिन सारे पेड़ कुल्हाड़ी को वोट दे रहे थे क्योंकि पेड़ सोच रहे थे कि कुल्हाड़ी में लगी लकड़ी उनके समाज की है। दुनिया के विभिन्न देशों की सरकारों को सरकारी खजाने से फ्री में पैसा यूनिवर्सल बेसिक इनकम तथा भारत में वोटरशिप अधिकार के रूप में देना अच्छा लगता है तो समझिए आप विश्वात्मा रूपी प्रभु के शरीर की धमनियों की कोशिका हैं। संसार के अधिकांश स्वार्थी मानसिकता के लोगों को यह बात अटपटी लगती है कि प्रत्येक वोटर को बिना काम कराये पैसा क्यों दिया जायें। इसके ठीक विपरित वे अपने लिए तो संसार की सभी सुविधाएँ चाहते हैं ।

    साभार: विकास गुप्ता

    सामाजिक वैज्ञानिक तथा विश्व परिवर्तन मिशन के संस्थापक विशात्मा (भरत गांधी) के अनुसार आज के मशीनी युग में प्रत्येक वोटर को मशीन से छपने वाले नोट तो दिये जा सकते हैं लेकिन प्रत्येक वोटर को रोजगार देना असंभव है। जैसे एक पिता के चार संतानों में भैस बराबर से नहीं बांटी जा सकती लेकिन भैस का दूध बराबर से बांटा जा सकता है। आजादी के बाद हमें राजनैतिक आजादी अर्थात वोट डालने की आजादी तो सभी अमीर-गरीब को बराबर से मिली है लेकिन आर्थिक आजादी तब ही मिलेगी जब प्रत्येक वोटर को वोटरशिप अधिकार की धनराशि उसके बैंक खाते में अमीर-गरीब का भेदभाव किये समान रूप से डाली जायेगी। ऐसा करने से धरती पर रामराज लाने की परिकल्पना साकार होगी।

    दशहरे के शुभ अवसर पर हमें रामराज की कल्पना करने वाले महात्मा गांधी तथा उनके आध्यात्मिक शिष्य विनोबा भावे भी याद आ रहे हैं। गांधीजी ने कहा था, मैं सनातनी हिंदू हूं, इसलिए मैं मुसलमान, ईसाई, बौद्ध भी हूं, इसी विचार को अध्यात्म-विज्ञानी विनोबा ने ऐसे कहा था – मैं हिन्दू हूं, यह कहना सही है, लेकिन मैं मुसलमान नहीं हूं, यह कहना गलत है। मैं हिन्दूस्तान में रहता हूं, यह सही है तो भी इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि मैं तुर्किस्तान में नहीं रहता मैं जिस जगत में रहता हूं, तुर्किस्तान भी उसी का एक अंग हैं इसलिए मैं तुर्किस्तान में भी रहता हूं। लेकिन मेरी जिम्मेदारी उठाने की शक्ति अल्प है, इसलिए मैं अपने आप को हिन्दुस्तानी कहता हूं, केवल इतनी सी बात है। क्योंकि वैसे देखा जाये तो मैं हिन्दूस्तान में भी कहां रहता हूं? हिन्दुस्तान के किसी एक प्रांत के, किसी एक गांव में, किसी एक घर में, किसी एक शरीर के छोटे से हदय में या कहो कि ‘स्व’ में रहता हूं।

    इसका अर्थ यह है कि मनुष्य की मर्यादित शक्ति के अनुसार वह अपने लिए जो धर्म स्वीकार करता है, उस धर्म का पालन करते हुए उसमें दूसरे धर्मों के लिए भी गुंजाइश रखने की सहिष्णुता होनी चाहिए। इसे दर्शनकारों ने समन्वय कहा है। आजकल हिन्दू-मुसलमानों के नाम पर समाज में जहर घोला जा रहा है इससे हमें स्वयं बचना चाहिए तथा अपने बच्चों को भी बचाना चाहिए। साथ ही एक जागरूक नागरिक की हैसियत से अपने समाज को भी बचाना चाहिए। सच्चे हिन्दू महात्मा गांधी तथा विनोबा भावे का व्यक्तित्व एक प्रकाशपुंज की तरह हमारे समक्ष प्रकाशवान है। आज के परिपक्वता के युग में हिन्दू-मुसलमान की बीच पैदा करने को मीडिया तथा राजनेताओं को मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। असली मुद्दा लोगों को आर्थिक आजादी है इस पर मीडिया तथा राजनेताओं को ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। वर्ना ऐसा न कहना पड़े कि अब पछताने से क्या फायदा, जब चिड़िया चुग गई खेत।

    इस लेख के माध्यम से मैंने मयार्दा पुरूषोत्तम श्रीराम के प्रति नमन करते हुए अपने 65 वर्षीय जीवन के अनुभव के द्वारा वैश्विक समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करने की कोशिश की है। विश्व परिवर्तन मिशन से जुड़कर इस मानवीय अभियान का हिस्सा बनने का आपको आमंत्रण है। हमारे लिए यह इस युग का सबसे महत्वपूर्ण प्रभु कार्य है। मैं एक कलम का सिपाही, वरिष्ठ नागरिक तथा मजदूर हूं, मुझे राम भक्त हनुमान की तरह राम का कार्य किये बिना एक भी क्षण विश्राम की नहीं सोचना है। चीटीं-गिलहरी की तरह मैं अपनी पूरी शक्ति लगाकर रामसेतु के बनने के लिए योगदान कर रहा हूं। एक वानर गिलहरी से कहता है कि अरे, गिलहरी तेरे रेत डालने से पुल बनेगा तो गिलहरी कहती है कि समुद्र पर पुल ने तो मेरे रेत डालने से बनेगा न ही तेरे पत्थर डालने से। पुल तो प्रभु राम की कृपा से बनेगा, मैं तो भक्ति तथा लोक सेवा का आनंद उठा रही हूं। रामजी की जय।

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