टूरिस्ट को अट्रैक्ट करता रणथंभौर फोर्ट

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भारत में ऐसे कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर हैं जो देश कि शान हैं और पर्यटन के लिहाज से लाखों लोग इन्हें देखने आते हैं। इसी कड़ी में राजस्थान का एक रणथंभौर किला है, जो वीरता और गौरव का मिसाल। यह किला दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग के सवाई माधोपुर रेलवे स्टेशन से 13 कि॰मी॰ दूर हैं और यह किला थंभ नाम की पहाडियों पर बनाया गया हैं। दुर्ग के तीनों ओऱ पहाडों पर खूबसूरत प्राकृतिक खाई बनी है, जो इस किले की सुरक्षा को मजबूत बनाती है। यूनेस्को ने इस किले को 21 जून 2013 को विश्व धरोहर घोषित कर दिया हैं। यह किला बहुत खूबसूरत और शानदार हैं और यह राजस्थान के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में से एक है।

ये इतिहास छिपा है इसमें:

इस किले का निर्माण चौहान वंश के राजपूत राजा सप्लक्ष ने 944 ईस्वी में शुरू कर दिया। फिर राजा के कई उत्तराधिकारियों ने इस किले के निर्माण में योगदान दिया। इस किले के निर्माण में राव हम्मीर देव चौहान की अहम भूमिका मानी जाती है। 1300 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने इस किले पर कब्जा करने की कोशिश की लेकिन वह असफल रहे। तीन असफल कोशिश के बाद अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने रणथम्बोर किला पर कब्जा कर चौहान के शासनकाल को खत्म कर दिया।

कहा जाता है कि तीन शताब्दियों के बाद अकबर ने किले का पदभार संभाला और 1558 में रणथंभौर राज्य को भंग कर दिया। 18 वीं सदी के मध्य तक किले मुगल शासकों के कब्जे में रहे। 18 वीं शताब्दी में मराठा शासक अपने शिखर पर थे और उन्हें देखने के लिए जयपुर के राजा सवाई माधो सिंह ने मुगलों को किले को उनके पास सौंपने का अनुरोध किया था। सवाई माधो सिंह ने फिर से पास के गांव का विकास किया और इस किले को दृढ़ किया और इस गांव का नाम बदलकर सवाई माधोपुर रख दिया। इस तरह इस किले पर कई राजाओं का शासन रहा।

वर्तमान का रणथंभौर किला:

कहा जाता हैं कि, आज जो किला हैं उसका जीर्णोद्धार जयपुर के राजा पृथ्वी सिंह और सवाई जगत सिंह ने कराया। यादवों ने भी इस पर शासन किया और बाद में दिल्ली के मुस्लिम शासकों ने किले पर कब्जा कर लिया। हमीर देव रणथंभौर का सबसे शक्तिशाली शासक थे। रणथंभौर किला सवाई माधोपुर नगर के पास के रणथम्बोर नेशनल पार्क में स्थित है, यह पार्क पहले जयपुर के महाराजाओ का शिकार करने का मैदान हुआ करता था और भारत को आज़ादी मिलने तक यहाँ पर लोग आकर शिकार करते थे। यह एक दुर्जेय किला है, जो राजस्थान के केंद्र में स्थित है। यह किला चौहान साम्राज्य के हम्मीर देव की वीरता और गौरव के लिये जाना जाता है।

रणथंभौर किला के प्रमुख गेट (पोल):

नवलाखा पोल : यह पहला दरवाजा है, जो कि एक पूरब पूर्व की ओर स्थित है और इसकी चौड़ाई 20 मीटर है।
हथिया पोल: दक्षिण-पूर्व को ओरबना यह दूसरा द्वार हैं, जो 20 मीटर चौड़ा है। यह एक तरफ प्राकृतिक चट्टान से घिरा है और दूसरी ओर किले की दीवार है।

गणेश पोल: यह तीसरा गेट है, जो दक्षिण की तरफ 10 मीटर चौड़ा है।

अंधेरी पोल: यह उत्तर की ओर वाला अंतिम गेट है और 30 मीटर चौड़ा है। यह दुर्गों की दीवारों से दोनों तरफ घिरा है।

दिल्ली गेट: यह उत्तर-पश्चिम कोने में स्थित है और यह करीब 70 मीटर चौड़ा है। गेट में कई रक्षक कोशिकाएं भी हैं।

सत्प्ल पोल: यह दक्षिण की ओर का सबसे बड़ा गेटवे है और नाले के साथ किले के पश्चिमी तरफ स्थित है। यह 70 मीटर चौड़ा है।

सूरज पोल: तुलनात्मक रूप से, पूर्वी तटों के साथ पूर्व की ओर से यह छोटा प्रवेश द्वार है। यह 10 मीटर चौड़ा है।

किले के शानदार दर्शनीय स्थल:

रणथंभौर किले का त्रिनेत्र गणेश मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध हैं। इस मंदिर में हर साल कई भक्त आतें हैं। भाद्रपद की गणेश चतुर्थी पर यहाँ प्रत्येक साल मेला लगता हैं और इस मेले में लाखों लोग शिरकत करते हैं। इसके अलावा यहाँ हम्मीर महल, सुपारी महल,हम्मीर कचहरी,बादल महल,जबरा-भवंरा, 32 खम्बों की छतरी, रनिहाड़ तालाब, महादेव की छतरी,चांमुडा मंदिर, ब्रह्मा मंदिर,शिव मंदिर, जैन मंदिर, पीर सहरुद्दीन की दरगाह, सामंतों की हवेली, राणा सांग की रानी कर्मवती की छतरी आदि देखने लायक दर्शनीय स्थल हैं,जो यहाँ आने वाले पर्यटकों को बहुत पसंद आते है। किले के पूर्व भाग में अक्सर कई जंगली जानवरों को वहां घूमते हुए देखा गया है। इसलिए उस और जाने से बांचें। यहां के जंगल और पहाड़ मुख्य आकर्षण का केंद्र हैं।

कैसे पहुंचे:  रणथंभौर किले तक तीनों मार्गों द्वारा आसानी से पंहुच सकते हैं। जयपुर के पास हवाई अड्डा हैं, जो कि किले से 150 किमी दूर है। जयपुर में कई बसों और ट्रेनें भी देश के प्रमुख शहरों से उपलब्ध हैं। जयपुर शहर में आने के बाद, रणथंभौर किले तक आसानी से टैक्सी, बसों और ऑटो रिक्शा से जा सकते हैं।

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