पहली बार उप चुनाव लड़ रही बसपा के राह में हजारों कांटे, सपाइयों में है खुशी

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उपेन्द्र नाथ राय

लखनऊ, 14 अक्टूबर 2019: किसी भी उप चुनाव में पहली बार किस्मत आजमा रही बसपा के लिए शुभ संकेत नहीं दिख रहे हैं। एक तरफ जहां हमीरपुर विधानसभा के उप चुनाव में पार्टी उम्मीदवार के तीसरे स्थान पर आने से नेताओं में मायूसी है, वहीं दूसरी तरफ बसपा से टूटकर सपा में जाने वाले नेता बसपा दिग्गजों के सिरदर्द का कारण बन गये हैं। वर्तमान परिस्थिति को देखकर यही कहा जा सकता है कि नम्बर दो की पोजिशन के लिए लड़ रही दोनों पार्टियों में बसपा के लिए शुभ संकेत नहीं है। यदि यही स्थिति रही तो 2022 के लिए बसपा का राह भी कठिन हो जाएगा।

हालांकि यूपी में 11 विधानसभा सीटों पर हो रहे उपचुनाव में मतदाता अभी अपने मुंह नहीं खोल रहे लेकिन दबे जुबान से हर कोई यही कह रहा है कि बसपा की अपेक्षा सपा की पोजिशन अच्छी रहेगी। यदि ऐसा रहता है तो पहली बार किसी उप चुनाव में भाग्य आजमा रही बसपा के लिए आगे की राह और कठिन हो जाएगी। गठबंधन टूटने के बाद से बसपा छोड़कर सपा का दामन पकड़ने वाले नेताओं की संख्या बढ़ गयी है। कई हाथी को छोड़कर सपा की साइकिल की सवारी कर ली है । इसको लेकर बसपा नेतृत्व ने अपने पार्टी कोआर्डिनटरों को असंतुष्टों पर नजर रखने के लिए कहा है, जिससे दलबदल करने से पूर्व उन्हें निष्कासित किया जा सके।

बसपा छोड़कर सपा में आने वाले नेताओं में दलित व मुस्लिम ज्यादा

बसपा छोड़ने वालों पर नजर दौड़ाएं तो एक माह के भीतर बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दयाराम पाल, मिठाई लाल, अतहर खां आदि साइकिल की सवारी शुरू कर चुके हैं। हमीरपुर उपचुनाव में बहुत उम्मीद थी कि बसपा ही दूसरे नम्बर पर आयेगी लेकिन बसपा उम्मीदवार के तीसरे स्थान पर खिसकने और सपा की वोटों में अधिक गिरावट न होने व दूसरे स्थान पर आने से बसपा में बेचैनी बढ़ गयी। वहीं बिल्कुल निराश हो चुके सपा के वरिष्ठ नेताओं में ऊर्जा का संचार होने लगा। हमीरपुर का उप चुनाव उनके लिए एक संचार का काम किया है, जिससे निरुत्साहित हो चुके सपाई अब उत्साहित हैं और उप चुनाव में सपा नेताओं में उत्साह दिख रहा है।

बसपा को कमजोर कर ही आगे बढ़ सकती है साइकिल

बसपा के एक नेता का कहना है कि उप चुनाव लड़ने का फैसला पार्टी के हित में नहीं दिख रहा है। हमें इस चुनाव में भाजपा उम्मीदवारों को हराने के लिए अन्य दलों का साथ देना चाहिए था। इससे भाजपा के विजय रथ को रोकने में मदद मिलती। इस दौरान समाजवादी पार्टी अपना कुनबा बढ़ाने के लिए मुहिम चला रही है। सपा की निगाह 2022 के चुनाव पर है। वह अभी से उसी की तैयारी कर रही है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की घोषणा कर चुके हैं। इस कारण भी सपा का एक मात्र उद्देश्य बसपा को कमजोर करना है। इसका कारण है कि बसपा कमजोर होगी, तभी सपा भारी पड़ेगी। इसके लिए जरूरी है कि बसपा को कमजोर करे। यदि बसपा कमजोर हो जाती है तो मुसलमानों का झुकाव स्वभावतन सपा की तरफ हो जाएगा और पार्टी फायदा में रहेगी।

मायावती चाहती थीं कि सिर्फ यादवों तक ही सिमट जाय सपा लेकिन हुआ नहीं ऐसा

यह सबको याद होगा कि जब गठबंधन तोड़ने की घोषणा मायावती ने की थी तो उसमें उन्होंने यही कहा था कि अपनी बिरादरी का वोट अखिलेश यादव बसपा को नहीं दिलवा पाये। इसका कारण भी यही था कि सिर्फ उन्हें यादवों तक सीमित कर दिया जाय और मुसलमानों को अपने पाले में कर लिया जाय। दूसरी एक प्रेसवार्ता में इससे एक कदम और आगे बढ़कर उन्होंने कहा था कि अखिलेश यादव ने फोन कर के कहा था कि मुसलमानों को कम टिकट दिया जाय। इसका कारण था, मुसलमानों को अखिलेश यादव से नाराज करवा देने की रणनीति थी। उस समय तो अखिलेश की कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी थी लेकिन बसपा से नाराज मुसलमान नेताओं को अपने पाले में एक-एक कर लाने की अखिलेश यादव की चाल ने बसपा में घबराहट ला दी है। यदि उप चुनाव में बसपा करारी मात खा जाती है तो उसको 2022 के लिए उठ पाना मुश्किल होगा।

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