परवेज़ मुशर्रफ़ ने कारगिल युद्ध को अंजाम दिया और मुंह की खाई!

0
174
कारगिल युद्ध-1999: विजय दिवस पर विशेष यादें:
 
वर्ष 1999 में पाकिस्तान की सेना और कश्मीरी उग्रवादियों ने मिलकर भारत एवं पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा एलओसी के पार कर अंदर तक चले आये थे। इसकी भनक कई हफ़्तों बाद 17 मई 1999 को की गई ब्रीफिंग के दौरान वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को कारगिल ऑपरेशन के विषय जानकारी हुई तो उस वक्त वहां विदेश मंत्री रहे सरताज अज़ीज़ ने एलओसी की स्थिति को नवाज शरीफ को समझाते हुये कहा कि हमारी सेना के कुछ जवानों ने नियंत्रण रेखा को पार कर लिया है हम इस विषय मे भारत से बात कर रहे हैं लेकिन शुरूआती दौर में नवाज़ शरीफ़ को ऐसा विश्वास था कि पाकिस्तानी सेना इस ऑपरेशन के साथ कश्मीर मुद्दे को हल करने में सफल हो जाएगी।
 
वहीं सरताज अज़ीज ने शरीफ को समझाया था कि अंतरराष्ट्रीय ताकतें, ख़ास कर संयुक्त राष्ट्र इसे कतई स्वीकार नहीं करेगा और अमरीका हमेशा भारत का साथ देगा, इस बात पर नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि हम बार-बार बैठकों एवं फाइलों के आदान-प्रदान करते रहने से कश्मीर को कभी हासिल नहीं कर पाएंगे। उसने भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कई दफे असफल कोशिश कर चुका था। जबकि पाकिस्तान द्वारा ऐसा दावा किया गया था कि युद्ध लड़ने वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद हुए दस्तावेज़ों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से यह साबित हो गया कि पाकिस्तान की ही सेना प्रत्यक्ष रूप में इस युद्ध में शामिल थी। लगभग 30,000 भारतीय सैनिक और तकरीबन 5,000 घुसपैठिए इस युद्ध में शामिल थे।
 
 
भारतीय स्थल सेना एवं वायुसेना ने मिलकर पाकिस्तान के कब्ज़े वाली जगहों पर हमला कर एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से पाकिस्तान को सीमा पार वापिस जाने को मजबूर कर दिया था। यह युद्ध कश्मीर के बहुत ऊँचाई वाले इलाके कारगिल पर हुआ था। दोनों ही देशों की सेनाओं को ऐसी स्थित में युद्ध करने में बहुत ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। भारत के परमाणु बम बनाने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ यह पहला सशस्त्र संघर्ष था। जिसमे भारत ने कारगिल युद्ध में विजयश्री प्राप्त हुई थी।
 
दरअसल अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधान मंत्रित्व काल से भारत एवं पाकिस्तान के बीच संबंध बेहतर हो चले थे, लेकिन तभी जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने कारगिल युद्ध को अंजाम दे दिया।
 
प्रधानमंत्री वाजपेयी पाकिस्तान गये एवं पाकिस्तान ने भारत के प्रधानमंत्री का शानदार तरीके से स्वागत तो किया लेकिन अटल जी वास्तव में बातचीत करने गये थे और इसका श्रीगणेश भी हो चुका था लेकिन आगे चल कर इसकी स्थिति में परिवर्तन हो जाने से यह खत्म हो गया बाद में जनरल मुशर्रफ़ ने भारत से कई बार बातचीत का अनुरोध किया।
 
भारत को बातचीत के मेज पर लाने के लिए उन्हें ऐड़ी-चोटी का जोर भी लगाते हुये वे खुद घुटनों के बल भारत आये भी लेकिन कहा जयें तो पाकिस्तान की यह एक ऐसी ग़लत चाल थी कि पाकिस्तान को इसका वर्षों तक बातचीत की प्रक्रिया पुनः वहाल करने में पसीने छूट गये थे भले ही भारत ने वर्ष 1971 और सियाचिन जैसे युद्ध किया हो पर कारगिल युद्ध का पाकिस्तान का फ़ैसला बहुत गैर ज़िम्मेदाराना बचकानी हरकत थी जिसके कारण पाकिस्तान की छवि को अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत नुकसान पहुंचा था।
 
.  प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती
 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here