हमारे देश की जनसंख्या का एक बड़ा भाग गांवों में बसता है। पूर्व में तो गांवों का दायरा और भी बड़ा था और आज जिसे ग्रामीण रहन-सहन कहा जाता है, वही लोगों के जीवन में मुख्य स्थान रखता था। ऐसे में यह बात महत्व की हो जाती है कि तबके जीवन की मुख्य बातों पर इस दृष्टिकोण से ध्यान दिया जाय कि क्या वे आज के वातावरण में वे लाभदायक साबित हो सकती हैं।
संतोष का विषय है कि इनमें अधिकांश विषयों का उत्तर हां में ही मिलता है। एक उदाहरण औषधीय पौधों का है। इन पौधों का प्रारम्भ से ही महत्व रहा है। आज भी हर्बल उत्पादों और जड़ी-बूटियों का प्रयोग लोगों की दिनचर्या का प्रधान अंग है। ऐसे में उत्तर प्रदेश की राज्य आयुष सोसाइटी का ये निर्णय महत्वपूर्ण है कि औषधीय पौधों की खेती का दायरा बढ़ाया जायेगा। ऐसे पौधों के प्रयोग से जहां दवा की शुद्धता सुनिश्चित हो सकेगी तो दूसरी ओर उसकी सुलभता भी बढ़ेगी। ऐसी कई दवाएं हैं जो विशुद्ध रूप से वनस्पतियों से निर्मित होती हैं लेकिन सम्बन्धित वनस्पतियों के बारे में पता न होने के कारण वे दवाएं बनाई नहीं जा सकतीं।

यह बात भी सही है कि पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान के मुख्य चलन में आ जाने के बाद भारतीय समाज अपनी इन धरोहरों के प्रति उदासीन और फिर विमुख होता गया। समय बीतने के साथ जब पता चला कि इनमें कई दवाएं स्थाई रूप से कारगर नहीं हैं तो अपनी परम्परागत औषधीय पद्धतियां और उनके चमत्कार फिर याद आने लगे।
औषधीय पौधों को प्रोत्साहन देने से फायदा यह भी है कि इसकी खेती करके किसान भी इससे लाभान्वित हो सकेंगे, साथ में इसका इस्तेमाल करने के मौके भी बढ़ेंगे। हां, इसमें ध्यान रखने की बात यह है कि आधुनिक समय में इस कदम को वैज्ञानिकता के साथ जोड़ा जाय जिससे इसकी गुणवत्ता में और अधिक वृद्धि की जा सके। जहां तक इसकी खेती की बात है तो उसको भी उन्नत तरीके से जोड़ें तो किसान को होने वाला लाभ और अधिक बढ़ सकेगा।







