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    Home»मीडिया

    अखबार होने लगे हलकान, सोशल मीडिया बना सुल्तान 

    By July 13, 2018 मीडिया No Comments3 Mins Read
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    … इसलिए बड़े-बड़े संपादक बन रहे फेसबुकिया पत्रकार
    लखनऊ, 12 जुलाई 2018: सोशल मीडिया की ताकत के आगे नामचीन अखबार भी बौने पड़ने लगे हैं। सोशल मीडिया /वेबसाइट पर लिखने वालों के लेखन में यदि दम है तो वो बतौर पत्रकार /लेखक अपनी सशक्त पहचान बना रहे है।
    किताबें धूल चाट रही हैं। अखबारी कागज पर जीएसटी लगने के बाद अब अखबार अपना प्रसार घटाते जा रहे हैं। देश के कुल अखबारों में  सिर्फ 3-4%ही ब्रांड अखबार हैं। प्रसार में टाप थ्री कहे जाने वाले इन बड़े अखबारों के किसी भी शहर के एडिशन का औसतन बीस-पच्चीस हजार से अधिक वास्तविक प्रसार नहीं है। अन्य 95%अखबारों की तो बात ही छोड़ दीजिए।
    बड़े अखबारों में जो पत्रकार बड़े ओहदों पर भी हैं उन्हें लिखने की आजादी ही नही है। मालिकों/प्रबंधन/मार्केटिंग सेक्शन के इशारों पर ही इन्हें लिखना पड़ता है।
    यही कारण है कि नामी-गिरामी अखबारों के संपादक/पत्रकार भी फेसबुकिया कलमकार/पत्रकार बन गये हैं।
     संपादक होने के बाद भी आज इनको फेसबुक पर लिखने की जरूरत क्यों पढ़ गयी है !  वजह साफ है। पहली बात तो ये कि इनके अखबार में भी इन्हें अभिव्यक्ति की आजादी नहीं मिल रही है। दूसरी बात ये कि सोशल मीडिया के जरिये इनकी खबर या इनके विचार जितने पाठकों तक पंहुच जाते हैं उतनी पंहुच इनके अखबारों की नहीं है।
    अखबार में सीमित जगह होती है। ज्यादातर जगह सरकारी और गैर सरकारी विज्ञापन घेर लेते हैं। विज्ञापन पाने की शर्तों में इन्हें विज्ञापनदाताओं की उपलब्धियों और गुडवर्क की खबरों को भी जगह देनी पड़ती है। स्थानीय पाठकों को जोड़ने के लिए स्थानीय खबरों को भी खूब स्थान देना पड़ता है।
    ऐसे ही तमाम कारणों के होते अखबारों का कोना-कोना मजबूरियों और शर्तों के हाथों बिका होता है।
    सोशल मीडिया में आप बिना प्रोडक्शन कास्ट जितना लिखिये, कोई भी बंदिश नहीं।
    यही नहीं सोशल मीडिया पर आपको त्वरित प्रतिक्रिया भी मिलेगी। किस किस्म का कौन पाठक क्या पसंद करता है क्या नहीं, आज के दौर में कैसे विषय और किस शैली को पसंद किया जा रहा है ये रूझान भी मिनटों में सामने आ जाता है। लाइक, शेयर और प्रतिक्रिया आपके लेखन का तत्काल रिजर्ट आउट कर देती है। ये सब आसानियां और खूबियां अखबार में नहीं है।
    यही कारण हैं कि देश का पेशेवर मीडिया भी अब सोशल मीडिया को सर्वोपरि मानने लगा है। बड़े-बड़े पत्रकारों और संपादकों को अपने विचारों/राइटिंग स्किल्स की आजादी को जिन्दा रखने और विशाल पाठक वर्ग तक पंहुचने के लिए सोशल मीडिया में सक्रिय व अपडेट रहना पड़ रहा है।
    न्यूज चैनल्स और अखबारों की एडोटोरियल मीटिंग में सोशल मीडिया में चलने वाली चर्चाओं/खबरों पर ना सिर्फ ध्यान देना पड़ता है बल्कि इसे फाॅलो करना इनकी मजबूरी है।
    जैसे कामर्शियल फिल्मों के कलाकारों को अपने हुनर में निखार के लिए रंगमंच में सक्रिय रहना पड़ता है वैसे ही दिग्गज पत्रकारों और लेखकों को सोशल मीडिया में कलम चलाना जरूरी हो गया है।
    -नवेद शिकोह

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