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    Home»धर्म»धर्म-कर्म

    संयोग है पर्युषण और गणपति एक समय ही होते हैं

    By August 28, 2017 धर्म-कर्म No Comments3 Mins Read
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    हर उत्सव का संबंध सामाजिक सरोकारों से है। यह संयोग ही है कि पर्युषण और गणपति एक समय ही होते हैं। पर्युषण भले जैन मत तक केंद्रित हो, लेकिन उसका संबंध पूरी मनुष्यता के साथ है। इसे ‘क्षमा पर्व’ भी कहा जाता है। साल भर की अपनी जानी-अनजानी भूलों के लिए हम एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं और आने वाले समय के लिए मंगल कामना करते है।


    ‘मंगल कामना‘ मानव जाति के अभ्युदय का एक महत्वपूर्ण मंत्र है। होली-दिवाली हो या फिर ओणम, लोहड़ी, ईद, पर्युषण और गणेशोत्सव, ये सारे उत्सव मंगल-भाव से भरे हुए हैं। हर उत्सव का संबंध सामाजिक सरोकारों से है। यह संयोग ही है कि पर्युषण और गणपति एक समय ही होते हैं। पर्युषण भले जैन मत तक केंद्रित हो, लेकिन उसका संबंध पूरी मनुष्यता के साथ है। इसे ‘क्षमा पर्व’ भी कहा जाता है। साल भर की अपनी जानी-अनजानी भूलों के लिए हम एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं और आने वाले समय के लिए मंगल कामना करते है। गणपति को तो मंगल मूर्ति कहा ही जाता है। विद्या, बुद्धि, धन के देवता और विघ्ननाशक कहलाते हैं गणेश। बाल गंगाधर तिलक ने तो आजादी के आंदोलन के दौरान गणेश-उत्सव को जन जागरण का माध्यम ही बना लिया। उन्होंने गण को जन के साथ जोड़ा।

    हर व्यक्ति अपने जीवन में शुभ और मंगल का आकांक्षी होता है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि स्वयं के और स्वजनों के शुभ और मंगल की आकांक्षा के साथ परायों और शत्रुजनों के अमंगल और अनिष्ट की आकांक्षा भी वह करता रहता है। यह मानव-मन की दुर्बलता है कि वह दूसरे के सुख में खुद सुखी अनुभव नहीं करता अपितु दूसरे की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता भी गंवा बैठता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह दूसरे के अशुभ और अमंगल में अपना शुभ और मंगल देखने लगता है। दूसरे के दुखी होने में या दुखी करने में अपने को सुखी मानने लगता है। पड़ोसी की खुशी उससे देखी नहीं जाती है। अपनी एक आंख फोड़कर पड़ोसी को दोनों आंखों से अंधा करने की कहानी सभी जानते हैं।

    मनस्विदों ने मानवीय चित्त की इस दुर्बलता को मिटाने का बड़ा मनोवैज्ञानिक उपाय खोजा है। कुछ विशिष्ट पर्वों के माध्यम से लोग औरों का शुभ-मंगल चाहें, और वे उदार भाव से कहें कि आपका जीवन मंगलमय हो। यह चिन्मय भाव है, जो संस्कारगत संकीर्णता को तोड़कर चित्त को जहां व्यापक विस्तार देता है, वहां वह अपने भीतर के स्वार्थग्रस्त धूमिल क्षितिज को शुभ्रता और विराटता भी प्रदान करता है। वह हमारे इस भ्रम को तोड़ता है कि औरों का सुख हमारा नहीं है। वह बताता है कि शुभ और मंगल अविभाज्य है, विराट है। जो अपने चित्त को जितना व्यापक बनाता है, उसका शुभ और मंगल उतना ही व्यापक होता चला जाता है। बस अपने मन के बंद कपाट को खोलना है। कपाट अगर बंद है तो सूरज अपनी हजार किरणों से चाहे हजार बार दस्तक क्यों न दे, अंधकार दूर नहीं हो सकता। उसी तरह अहं और मन के संकीर्ण कपाटों के खुलने पर ही हृदय-आकाश में शुभ और मंगल का प्रवेश हो सकता है। पर्युषण और गणेशोत्सव इसी कपाट को खोलने का सहज सुलभ अवसर है।

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