- मुख्यमंत्री करें हस्तक्षेप और पावर कार्पोरेशन द्वारा 7 दिन के अन्दर टैरिफ लागू कराने की प्रक्रिया पर लगवायें रोक
- उपभोक्ता परिषद ने पावर कार्पोरेशन को दिखाया आईना, कहा 2-4 घंटे ज्यादा बिजली देने से गाँव की बिजली की दर नहीं हो जायेगी शहरी, यह कैसा न्याय?
- उपभोक्ता परिषद ने पिछली सरकारों के जारी किए आँकड़े, कहा जो स्वतः कर रहे खुलासा
- गाँव व शहर का स्टैण्डर्ड आॅफ परफारमेंस का बिजली कानून अलग, फिर टैरिफ बराबर क्यों?
लखनऊ 02 दिसम्बर। पावर कार्पोरेशन के दबाव में नियामक आयोग द्वारा प्रदेश के विद्युत उपभोक्ताओं की दरों में व्यापक वृद्धि, खासतौर पर ग्रामीण विद्युत उपभोक्ताओं की दरों में 67 से 150 प्रतिशत की वृद्धि व किसानों की दरों में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि को लेकर पूरे प्रदेश में ज्यादातर जिलों में किसान आन्दोलित हैं और प्रदर्शन कर रहे हैं, वही दूसरी ओर 30 नवम्बर को जारी टैरिफ आदेश के दूसरे दिन उपभोक्ता परिषद की याचिका पर नियामक आयोग अध्यक्ष द्वारा परीक्षण कर आयोग के सामने प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था। वर्तमान में नियामक आयोग अध्यक्ष एसके अग्रवाल देश से बाहर लगभग एक सप्ताह की छुट्टी पर चले गये हैं। ऐसे में उपभोक्ता परिषद प्रदेश ने मा. मुख्यमंत्री से यह माँग की है कि जब तक उपभोक्ता परिषद की याचिका पर परीक्षण कर कोई निर्णय न ले लिया जाये, पावर कार्पोरेशन द्वारा टैरिफ आदेश आम जनता पर लागू करने हेतु जारी सार्वजनिक सूचना पर रोक लगायी जाये। अन्यथा पूरे प्रदेश की जनता में एक गलत संदेश जायेगा कि पहले पावर कार्पोरेशन ने दबाव डालकर दरें बढ़वायी और फिर नियामक आयोग अध्यक्ष को देश से बाहर भेज दिया।
उप्र राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने प्रदेश के मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षण करते हुए पावर कार्पोरेशन पर करारा हमला बोलते हुए कहा कि केवल 2-4 घंटे अधिक बिजली दे देने से ग्रामीण क्षेत्र की जनता क्या शहरी हो जायेगी? दोनों का रहन-सहन, सुविधा, अस्पताल, स्कूल सब अलग-अलग, फिर यह प्रदेश का दुर्भाग्य है कि पावर कार्पोरेशन ने थोड़ी सी अधिक बिजली देकर गाँव पर शहर का टैरिफ लागू करा दिया, जबकि शायद पावर कार्पोरेशन को यह ज्ञान नहीं कि विद्युत अधिनियम, 2003 के प्राविधानों के तहत आयोग द्वारा प्राविधानित वितरण संहिता में गाँव व शहर के स्टैण्डर्ड आॅफ परफारमेंस अलग-अलग है। उदाहरण के तौर पर गाँव में ट्राँसफार्मर बदलने का मानक 72 घंटे है और शहर में 24 घंटे। गाँव में आजभी दसियों कि.मी. चलकर उपभोक्ता अपना बिल जमा करने जाते हैं, शहर में गली-गली में बिल जमा होता है। इसी प्रकार सभी मानक भिन्न हैं, फिर शहर की तुलना गाँव से करना पावर कार्पोरेशन की तुगलकी नीति है।
उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष ने कहा कि पिछले वर्षों में बीएसपी, समाजवादी पार्टी व वर्तमान भाजपा सरकार में नियामक आयोग में बिजली आपूर्ति के घण्टों को प्रस्तावित कर ग्रामीण अनमीटर्ड विद्युत उपभोक्ताओं की जो बिजली दर आयोग से तय करायी गयी, उसको देखने से स्वतः खुलासा हो जायेगा कि मात्र 2-4 घण्टे अधिक बिजली गाँव को वर्तमान सरकार में पावर कार्पोरेशन द्वारा देने की बात कहकर जनता को ठगा गया है।
प्रदेश में पार्टी की सरकार -वित्तीय वर्ष-ग्रामीण आपूर्ति-ग्रामीण घरेलू दर
बहुजन समाज पार्टी 2009-10 10 घण्टे 22 मिनट-125 प्रति कनेक्शन प्रति माह
समाजवादी पार्टी 2012-13 14 घण्टे 125 प्रति कनेक्शन प्रति माह
समाजवादी पार्टी 2013-14 11 घण्टे 15 मिनट 180 प्रति कनेक्शन प्रति माह
समाजवादी पार्टी 2016-17 16 घण्टे 180 से 200 प्रति किलोवाट प्रति माह
भारतीय जनता पार्टी 2017-18 18 घण्टे 300 से 400 प्रति किलोवाट प्रति माह
सबसे बड़ा चैंकाने वाला मामला यह है कि ग्रामीण मीटर्ड उपभोक्ता पहले जो रू0 50 कि0वा0 फिक्स चार्ज और रू0 2.20 प्रति यूनिट के आधार पर बिल चुकाते थे, अब उन्हें रू0 80 प्रति कि0वा0 और 5 स्लैब शहरी उपभोक्ताओं की भाँति रू0 3 प्रति यूनिट से अधिकतम रू0 5.50 प्रति यूनिट तक चुकायेंगे, जो यह दर्शाता है कि मीटर लगाओ तब भी आपको टैरिफ शाॅक झेलना है, न लगाओ तब भी। यह कैसी नीति है? आने वाले समय में इससे बिजली चोरी बढ़ना तय है।







