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    कर्नाटक और उप्र के नतीजों से उभरते सवाल

    ShagunBy ShagunMay 17, 2023 Current Issues No Comments12 Mins Read
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    अखिलेष

    कर्नाटक चुनाव के नतीजों से एक बड़ा संदेष मिल रहा है यह संदेष है अपनी विचारधारा को सत्ता मिलने के बाद प्रभावी तरीके से लागू करना। उस पर हर हालत में दृढ़ रहना। देष में जहॉ भी भाजपा की चुनी गयी सरकारे ऐसा कर रही हैं वहॉ उनको सफलता मिलती दिखाई पड़ रही है और जहॉ भाजपा लीडरषिप अपने राश्ट्रवादी  और सांस्कृतिक राश्ट्रवाद के प्रति दुविधा ग्रस्त होकर कांग्रेस की तरह सेक्युलर बनने की कोषिष करती है वहॉ मात खा जाती है।

    वास्तव में आज का मतदाता गोल-मोल, दोहरा चरित्र एवं सिर्फ बातें बिल्कुल पसंद नहीं करता। उसे नीति, नियत और कार्यों में स्पश्ट एवं मजबूत ईरादों की सरकार चाहिए। उत्तर प्रदेष और असम के मुख्य मंत्रियों ने सरकार के स्पश्ट इरादे वाले कार्यों से यह सिद्ध भी कर दिया है। अपने मजबूत इरादों, स्पश्ट नीति और नियत के दम पर यह चुनाव दर चुनाव जीत रहे हैं। स्थानीय नगर निकायों के चुनाव में उत्तर प्रदेष में भाजपा की प्रचंड जीत योगी सरकार की स्पश्ट नीति का ही परिणाम है। इस प्रदेष में जाति की सीमायें टूटती दिख रही हैं। भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को योगी और हिमन्ता विष्वा षर्मा से सीख लेकर समय रहते अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू करना चाहिए। उ0प्र0 के स्थानीय निकाय के चुनावों में बम्पर जीत और कर्नाटक में हार के सार एवं संदेष को समझना चाहिए।

    कर्नाटक में भाजपा ने अपनी विचारधाना के मुद्दों पर कोई निणार्यक निर्णय नहीं लिया उन्हें मझधार में ही छोड़ दिया जिसका परिणाम यह रहा कि बहुसंख्यक पूरी तरह भाजपा के साथ नहीं आया। पार्टी ने हिजाब, हलाल बनाम झटका, गौहत्या, तथा टीपू सुल्तान आदि के मुद्दे उठाकर उन्हें बाद में भुला दिया। नेता अचानक सेक्युलर हो गये। यदुरप्पा और बोम्मई दोनों नेताओं ने  चुनाव में इन मुद्दों से पलड़ा झाड़ लिया। दोनों ने अपने इन्टरव्यूव में सेक्युलर होने का दावा करना षुरू किया। जिसका परिणाम यह रहा कि हिन्दू जातिवाद में बह गया हमेषा की तरह जबकि अल्पसंख्यक भाजपा को हराने के लिये एक जुट हो गये।

    भाजपा नेताओं को पता नहीं क्यों यह समझ में नहीं आता कि वह कुछ भी कर ले उसे अल्पसंख्यकों के वोट नहीं मिलेंगे। वे धार्मिक आधार पर सोंच कर वोट देते हैं। उनके लिये विकास,सुषासन एवं धर्मनिरपेक्षता आदि कोई मुद्दा नहीं। दूसरी तरफ बहुसंख्यक सामान्य रूप से धार्मिक आधार पर वोट नहीं करता। उसके लिये एक हजार अपने व्यक्तिगत मुद्दे हैं। बषर्ते कि उसे यह आभास हो जाये कि हमने भाजपा को नहीं जिताया तो जीना कठिन हो जायेगा। तीज त्योहार नहीं मनेंगे। कानून व्यवस्था एक चुनौती बनकर आ जायेगी। कर्नाटक में भाजपा यह नहीं कर पायी। परिणाम हमेषा की तरह जातियों में बंटा समाज बिखर गया।

    प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की जीतोड़ मेहनत के बावजूद वे भाजपा की सरकार को दुबारा बना नहीं पाये। भाजपा की सरकार दोबारा क्यों नहीं लौटी कांग्रेस क्यों जीती इस पर समीक्षायें भी हो रही हैं लेकिन इस समय सबसे जरूरी भाजपा के लिये खुद की समीक्षा करना है। कुछ महीनों में लोकसभा के चुनाव हैं। कर्नाटक से 28 लोकसभा सांसद चुुने जाते है। कर्नाटक में बीजेपी के पास 25 सीटे हैं। दक्षिण भारत का यह एकमेव राज्य है जहॉ भाजपा की सरकार थी। दक्षिण भारत में लोकसभा की 129 सीटे हैं जिसमें भाजपा के पास 29 सीटे है। इसलिये यह और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भाजपा अपनी सरकार के पॉच वर्श की समीक्षा करें और जहॉ-जहॉ उसे कमी दिखाई पड़ रही है वहॉ अपने कार्यों और व्यवहार से उसे ठीक करें।

    उत्तर प्रदेष और असम से यदि भाजपा नेतृत्व सीख लेकर अपनी नीतियों में बदलाव लाये तो षायद वह ज्यादा फायदे में रहेगी। साथ ही उसे अपने कार्यकर्ताओं में भी उत्साह पैदा करना होगा। केवल वैचारिक मजबूती से काम नहीं चलता है।गंाव और चौपाल तक यह संदेष देना पड़ेगा कि यह भाजपा की सरकार ह,ै जहॉ कार्यकताओं की चलती है। उनके साथ कोई भी अन्याय नहीं कर सकता। साथ ही अपने कार्यकर्ताओं को भी यह समझाना पड़ेगा कि आप गलत न करें सरकार सही एवं न्याय के साथ है। इससे जनता में कार्यकर्ता एवं पार्टी दोनों को मजबूती मिलेगी।लोगों में विष्वसनीयता बनेगी। कार्यकर्ता भी खुष रहकर मन से पार्टी के लिये कार्य करेगा।

    कर्नाटक की हार के पीछे लोग मुख्य कारण भाजपा का मजबूत चेहरा न होना, भ्रश्टाचार, जातिगत समीकरण, धु्रवीकरण का दांव का ज्यादा न चल पाना, येदियुरप्पा जैसे दिग्गज नेता को साइडलाइन करना तथा सत्ता विरोधी लहर की काट का नहीं ढूंढ पाना मानते हैं।

    कर्नाटक हार में भाजपा की सत्ता विरोधी लहर का फायदा कांग्रेस को मिला है। यह कांग्रेस की सकारात्मक कार्यो की जीत न होकर भाजपा से असंतुश्ठ मतदाता की प्रतिक्रिया है। युदियुरप्पा की जगह बोम्बई को बीजेपी ने भले ही मुख्यमंत्री बनाया हो लेकिन बोम्मई कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाये। वह अपने कोरवोट बैंक लिगायत समुदाय को अपने साथ नहीं जोड़े रख सकी और न ही अन्य समुदाय में अपनी बढ़त बना सकी। इसी तरह पूर्व मुख्य मंत्री जगदीष षेहार और पूर्व डिप्टी सी0एम0 लक्ष्मण सावदी का टिकट कटने से नाराज होकर कांग्रेस में जाना भी महंगा पड़ा।

    कांग्रेस पार्टी ने कार्नाटक के चुनाव में जो घोशणा पत्र जारी किया था। उसने भारतीय राजनीति किस ओर जा रही है इसका पूर्वानुमान दिखा दिया है। आगामी 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ताज्जुब नहीं कि मुष्लिम वोटों के लिये राजनैतिक दल इसी तरह के हथकण्डे अपनाये। दुर्भाग्य है कि अनेक राजनैतिक पार्टियों को देष हित से ज्यादा ’दल हित’ याद रहता है। पार्टी को किसी भी तरह जीत मिलनी चाहिए। भारतीय लोकतन्त्र की यह दषा और दिषाखतरनाक है। इसके परिणाम बहुत दूरगामी और घातक हो सकते हैं।

    कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिये जारी अपने घोशणा पत्र में कांग्रेस ने प्रतिबंधित जिहादी संगठन पापुलर फ्रन्ट ऑफ इण्डिया की तुलना बजरंग दल से करते हुये उस पर चुनाव जीत ने के बाद पांबदी लगाने का वादा किया इससे कांग्रेस ने अल्पसंख्यक वोटों के लिये किसी भी हद तक जाने की अपनी मंषा दिखा दी। जोपीएफआई पहले से ही प्रतिबन्धित है उस पर पाबंदी की बात करना जनता को बेवकूफ बनाने का प्रयास था। सबसे बड़ा प्रष्न तो यह है कि बजरंग दल की तुलना पीएफआई से कैसे की जा सकती है। बजरंग दल हिन्दूवादी संगठन जरूर है लेकिन उसके राश्ट्र प्रेम पर कोई प्रष्न चिन्ह नही खड़ा कर सकता। इस देष में धर्म एवं सम्प्रदाय के आधार पर काम करने वाले अनेक संगठन है जो बजरंग दल की तरह अपने सम्प्रदाय और पंथ के हितों के लिये कार्य कर रहे हैं लेकिन उन पर कांग्रेस उंगली नहीं उठा रही है। यदि कांग्रेस की नजर में बजरंगदल पीएफआई जैसा संगठन है तो फिर राजस्थान, छत्तीसगठ और हिमाचल प्रदेष की उसकी सरकारें क्या कर रही है। उन्होंने पहले बजरंगदल पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाया। कांग्रेस को बजरंगदल से षिकायत हो सकती है कि वह उसका विरोधी है लेकिन खुद के विरोधी संगठन को राश्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिये प्रतिबन्धित संगठन के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है। स्पश्ट है कि कांग्रेस ने चुनावी लाभ के लिये ऐसा किया।

    यद्यपि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इस मुद्दे पर कांग्रेस पर जबरदस्त प्रहार किया गया। लेकिन केवल इस एक मुद्दे से चुनाव परिणाम कैसे बदले जा सकते है। फायदा हुआ लेकिन तब तक मतदाता मन बना चुका था। ऐसी घोशणा करके उसने यह भी रेखांकित कर दिया है कि पीएफआई की देष विरोधी हरकतों को वह बहुत कम करके अंाक रही है। उसने षायद इस तथ्य से अनजान रहना ही बेहतर समझा है कि अंातकी गतिविधियों में लिप्त पीएफआई भारत को इस्लामिक देष बनाकर षरिया लागू करने के प्रयास को पूरा करने के लिये सक्रिय है।

    कांग्रेस या अन्य किसी राजनैतिक दल को बजरंग दल की रीति-नीति से असहमति हो सकती है लेकिन इस आधार पर वह उसे पी0एफ0आई के बराकर नहीं खड़ा कर सकता। बजरंग दल विष्व हिन्दू परिशद और आर0एस0एस0 से सम्बद्ध संगठन है और आर0एस0एस0 की विचारधारा का कूल मंत्र ही राश्ट्र भक्ति है। उससे सम्बद्ध किसी भी संगठन की राश्ट्र भक्ति पर प्रष्न चिन्ह नहीं खड़ा किया जा सकता। आखिर इसके पीछे अल्पसंख्यक तुश्टीकरण की राजनीति के अलावा क्या है।

    कांग्रेस लगता है तुश्टीकरण के खतरनाक खेल को छोड़ने के लिये तैयार नही है। हिन्दू आंतकवाद को जबरदस्ती स्थापित करने की असफल कोषिष के बावजूद कांग्रेस मुस्लिम वोट के लिये लगातार ऐसे कदम उठा रही है जिससे देष में साम्प्रदायिक तत्वों के मनोबल को बढ़ावा मिले। वह यह समझने के लिये तैयार ही नहीं है कि उसके ऐसा करने से ही उसका जनाधार कम हो रहा है। अल्पसंख्यक तो उसको वोट देते हैं जो भाजपा से मुख्य टक्कर में हो। कांग्रेस जहॉ मजबूत स्थिति में है और भाजपा की मुख्य प्रतिद्वन्दी है वहॉ उसे अल्पसंख्यको के वोट मिलेंगे ही लेकिन उसके इस तरह के गलत कदम से बहुसंख्यक समाज का समर्थन उसे जरूर कम हो जाता है। इसीकारण वह आज सत्ता से बाहर है।

    वैसे तो हिन्दुस्तान में अल्प संख्यक तुश्टीकरण एक सोची समझी रणनीति का अंग है। जोकि अंग्रेजों ने चालू किया था। 1857 के विद्रोह के बाद एक अंग्रेजी विचारक ने कहा था कि अगर भारतीय ब्रिटिष बहुसंख्यक हित पर षासन पर अल्पसंख्यक को तरजीह देना षुरू कर दे तो अंग्रेजी सत्ता को मजबूती दी जा सकती है उसे स्थायी बनाया जा सकता है।

    ब्रिटिष सरकार ने इस सुझाव को मानकर इस पर कार्य करना प्रारम्भ किया। और इसके क्रियान्वयन के लिये सर सैयद अहमद खान को अपना पहला मोहरा बनाया। आगे चलकर मुस्लिम लीग का गठन कर संगठित रूप दिया गया। और इसका विस्तृत प्रभाव मोरल-मिन्टो के सुधार में सामने आया। इसका परिणाम यह रहा कि हिन्दू मुस्लिम एकता और सम्मलित हित की बात करने वाले सैय्यदखान मुस्लिम हितों की केवल बात करने लगे। जिसका परिणाम पृथक निर्वाचन के रूप में सामने आया।

    खिलाफत आन्दोलन की असफलता के बाद बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्याकोके बीच मतभेद खूनी संघर्श में बदल गया। यहॉ तक की ’’सारे जहॉ से अच्छा हिन्दोसतॉं हमारा’’  लिखने वाले इकबाल ने ‘‘सारे जहॉ से महान हमारा प्यारा पाकिस्तान ’’ गाने लगा।

    गाँधी जी भी अपने पूरे कार्यकाल मेबहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यकएकता की बात करते रहे। उनका विचार था कि मुस्लमानों की तरजीह देने से वह हिन्दुओं के साथ रहेगा। इसी त्रुटिपूर्ण सोंच के आधार पर वे मुस्लिम परस्त हो गये। जिस तुश्टीकरण की राजनीति अंग्रेजों ने प्रारम्भ की उसे खादपानी गांधी के दर्षन से मिलती रही। गंाधी की इस नीति को नेहरू ने धर्म निरपेक्षता का नाम देकर आगे बढ़ाया। आज तक इसी धर्म निरपेक्षता की आड़ में देष की एकता अखण्डता और सुरक्षा को दांव पर रखकर भी अल्पसंख्यक तुश्टीकरण की सारी हदें पार करने की परम्परा चलाते आ रहें हैं।

    कांग्रेस ने दंगा विरोधी जिसबिल को पास कराने की कोषिष की थी वह यदि पास हो जाता तो हिन्दुओं पर ऐसी आफत आती कि उसका वर्णन करना कठिन होता। कांग्रेस षुरू से जिस दर्षन पर काम कर रही है वह बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक के हितों को तरजीह देना है। उनकी नजरों में हिन्दु किसी भी साम्प्रदायिाक हिंसा के लिये सबसे पहले दोशी है।

    कांग्रेस पार्टी की हिन्दू विरोधी नीति में तेजी 1998 में सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद आयी। 2004 में यूपीए की सरकार बनी और उसके बाद लगातार ऐसे कार्य करने की कोषिष षुरू हुई जिससे मुस्लिम आंतकवाद के लिये हिन्दुओं को दोशी ठहराया जाये। कम्यूनल वायलेन्स बिल, हिन्दू आंतकवाद, बम्बई में आतंकवादी हमला तथा समझौता एक्सप्रेस विस्फोट आदि सभी घटनाओं में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बचाकर हिन्दुओं को फंसाने की कोषिष की गयी।

    कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने 1600 आंतकवादियों से मुकदमा वापस लिया। सपा ने भी उत्तर प्रदेष में आतंकवादियों के मुकदमें वापस लेकर उन्हें रिहा किया। कांग्रेस के गृहमंत्री षिन्दे ने जयपुर अधिवेषन में पहलीबार हिन्दू आतंकवाद का मुद्दा उठाया और यह केवल कांग्रेस की मुस्लिम आंतकवाद एवं साम्प्रदायिकता को बचाने के लिये हिन्दुओं को जबरदस्ती साम्प्रदायिक बताकर वाह-वाही एवं मुस्लिम समर्थन पाने की रणनीति थी।

    बम्बई की आंतकवादी घटना में भी हिन्दू संगठनों की भूमिका के आरोप लगाये गये। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने इसमें संघ को घसीटने की कोषिष की। जबकि पूरी दुनिया यहॉ तक स्वयं पाकिस्तान इसे पाकिस्तानी आंतकवादियों की कारस्तानी मान रहा था। कसाव पकड़ा गया था जोकि पाकिस्तानी मूल का था। उसने अपने बयान में सारे तथ्य स्वीकार किये थे कि यह घटना आंतकवादी थी। लेकिन कांग्रेस इस भयानक एवं देष विरोधी घटना में भी हिन्दू साम्प्रदायिकता ढूढ रही थी।

    समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट पाकिस्तानी आंतकवादियों ने अंजाम दिया था। पाकिस्तानी पकड़े गये थे। लेकिन उन्हें छोड़ दिया गया और हिन्दू संगठनों को दोशी बनाकर प्रज्ञा ठाकुर सहित हिन्दू संगठनों पर झूठा आरोप लगाया गया।

    सनातन धर्म दुनिया का सबसे पुराना धर्म है। अपने हजारों वर्शों के इतिहास में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है जब किसी हिन्दू ने दूसरे धर्म के अनुयायी को जबरदस्ती धर्म बदलने के लिये कहा हो। हिन्दू धर्मग्रन्थों ने बार-बार यह कहा है कि ईष्वर एक है लोग उसे विभिन्न नामों से जानते हैं। सभी धर्मो के रास्ते अलग हैं लेकिन मंजिल एक ही ईष्वर है।

    आज के प्रचलित मतों में हिन्दुओं जैसा सर्वधर्म प्रेम और समानता का भाव षायद ही दूसरे किसी में है। तब हिन्दुओं को साम्प्रदायिक बताना उनके संगठनों पर प्रष्न चिन्ह खड़ा करना पी0एफ0आई0 से तुलना करना किस रणनीति का हिस्सा है यह आसानी से सोंचा जा सकता है।

    पी0एफ0आई0 2047 तक इस देष को इस्लामी राश्ट्र में बदलने की रणनीति पर काम कर रही थी। इसके लिये युवकों को भर्ती कर उन्हें प्रषिक्षण और हथियार मुहैया करा रही थी। केन्द्रीय जॉच ऐजेन्सियों ने इसे पकड़ा उस पर प्रतिबन्ध लगाया। ऐसे संगठन से बजरंगदल की तुलना करना कांग्रेस के दीवालियेपन की सोंच के अतिरिक्त क्या है। बजरंगदल के धुर विरोधी भी उस पर देष विरोधी आरोप नहीं लगा सकते। अपने धर्म की बात करना उसकी रक्षा करना साम्प्रदायिकता नहीं है। बजरंग दल वही करता आया है।

    (अखिलेष पूर्व अधिकारी एवं पत्रकार हैं)

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