Share Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp Post Views: 590 कविता: वीरेन्द्र जैन सामने दिखता नहीं दुश्मन हवाओं से लड़ाई हो रही है कौन पहचाने उसे उसके कई चेहरे पेट में अमृत घड़ा उस पर लगे पहरे भूल भ्रम में सब उसी के साथ अपनी आस्थाओं से लड़ाई हो रही है सामने दिखता नहीं दुश्मन हवाओं से लड़ाई हो रही है
‘पुस्तकें मन को एकाग्र कर परंपराओं से जोड़ती हैं’-ब्रजेश पाठक; ईशा-मीशा रतन की कथक प्रस्तुति ने मोहा मन