थाली होती ही छेद करने के लिए है

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Illustration: sushil doshi
कुछ व्यंग्यात्मक पंच: अंशुमाली रस्तोगी
  • थाली होती ही छेद करने के लिए है। जिनकी थाली में छेद नहीं होते, उनका जीवन नीरस है।
  • मैंने हमेशा ऐसी थालियां पास रखीं, जिनमें छेद किए जा सकें। यह बताता हुए मुझे जरा भी शर्म नहीं कि मैंने बहुतरे संपादकों की थालियों में बड़े छेद किए हैं।
  • आज जमाना ही थाली में छेद कर खाने का है। थर्माकोल की थाली से कहीं ज्यादा आसान है, स्टील की थाली में छेद करना।
  • एक ऊंचे व्यंग्यकार हैं, जिनके जितने चेले उतनी ही थालियां हैं। वह जहां जाते हैं, अपनी थाली साथ लेकर जाते हैं। इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि कोई चेला उनकी थाली में छेद न कर पाए।
  • मैं जिस थाली में खाता हूं, उस थाली में छेद करना अपना ‘धर्म’ समझता हूं। मेरे पास ऐसी कई थालियां सुरक्षित रखी हैं, जिनमें मैंने कभी छेद किए थे। सारे छेद अक्सर मेरी तरफ बड़ी हसरत भरी निगाह से देखते हैं।
  • व्यंग्य लेखन में मैंने कभी किसी को अपनी थाली नहीं दी। अपनी थाली खुद बनाई। मेरी थाली इतनी मजबूत है कि कोई ऐरा-गैरा व्यंग्यकार उसमें छेद करने की जुर्रत भी न करेगा।
  • दरअसल, मुझे छोड़कर सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। सबकी थालियां चू रही हैं। या उनमें पैबंद लगे हैं। जिस थाली में खाओ, उसी में छेद करो, यह परंपरा महाभारत काल से चली आ रही है।
  • मेरे पास एक थाली साली की भी है। उसे हमेशा अपने दिल के नजदीक रखता हूं। यह मुझे कभी उपहार में मिली थी। इस थाली में मैंने कभी कोई छेद नहीं किया।
  • थालियों से कभी मोह न पालें। अगर मौका मिल रहा है तो उसमें छेद कर डालें। बाकी जो होगा देखा जाएगा।
  • नेताओं और फिल्मी सितारों की थालियां एक जैसी होती हैं। छेद-युक्त। मैंने इनकी थालियों में हुए छेदों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। प्रायः ये अपनी थालियां और छेद एक-दूसरे से ‘शेयर’ करते रहते हैं।

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