अविनाश मिश्र की ‘शैलपुत्री’

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शैलपुत्री

तुम्हारा स्मरण संकल्प का स्मरण है—
अनामंत्रण के प्रस्ताव और उसके प्रभाव का स्मरण
तुम्हारा स्मरण उस आलोचना का स्मरण है
जिसमें एक भी उद्धरण नहीं
रचना और पुनर्रचना के लिए
अपमान और व्यथा की अनिवार्यता का
स्मरण करता हूँ मैं
स्मरण करता हूँ
एकांत और बहिर्गमन के पार
ले चलने वाले विवेक का
मैं चाहता हूँ
एक असमाप्त स्मरण
चाहता हूँ
अनतिक्रमणीय चरण
चिरदरिद्र मैं माँगता हूँ
तुम्हारी शरण !

ब्रह्मचारिणी

तप का एक अखंड काण्ड हो तुम—
देह की सामर्थ्य का सफल अनुशासन
विध्वंस जब अस्तित्व पर व्योम-सा सवार है
तुम मनोकामना का रोमांच हो
तुम्हारे तप
तुम्हारे अनुशासन
तुम्हारे रोमांच से अपरिचित
नागरिकों की देह नहीं जानती सामर्थ्य
वह जानती है बस—
सारी गिनतियों से बाहर छूट जाना
वे उपवास में हैं
वे विलाप में हैं
मनोकामना के लिए तप में नहीं
ताप में हैं
तप करो माँ, परंतु
तप से नागरिक-शोक हरो माँ !
– अविनाश मिश्र 

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