व्यंग: आप ‘गाली’ दीजिए या ‘तारीफ’ कीजिए इनकी सेहत पर कतई फर्क नहीं पड़ता

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अंशुमाली रस्तोगी

कुछ लोग ‘अदृश्य’ होते हैं : न कहीं दिखते हैं न कभी मिलते हैं। फिर भी, 24×7 हमारे बीच रहते हैं। कोई उदाहरण देना हो, कोई बात कहनी हो, किसी की खिंचाई करनी हो, किसी के बहाने कुछ लिखना हो तो तुरंत ‘कुछ लोग’ को आगे कर दिया जाता है। इन्हें चाहे आप ‘गाली’ दीजिए या ‘तारीफ’ कीजिए इनकी सेहत पर कतई फर्क नहीं पड़ता।

‘कुछ लोग’ हमेशा हिट रहते हैं। हर किसिम के मार्केट में खप जाते हैं। हर ब्रांड के लिए उपलब्ध रहते हैं। हर विज्ञापन का हिस्सा होते हैं। लेखक भी इनका बखूबी इस्तेमाल करते रहते हैं। चोर इन्हें चुरा नहीं सकता। डाकू इन पर डाका नहीं डाल सकता। यहां तक कि पुलिस भी इनका कुछ नहीं कर सकती।

‘कुछ लोग’ हमेशा सकारात्मक रहते हैं। नकारात्मकता क्या और कैसी होती है, उन्हें नहीं पता। ऊर्जा उनके भीतर इतनी होती है कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। जब भी आध्यत्म की बात होगी, उनका जिक्र अवश्य आएगा।

‘कुछ लोग’ राजनीति में कभी नहीं जाते न मिलते हैं। राजनीति के लिए वे ‘अनफिट’ होते हैं। राजनीति में विकट चालाकी और चालबाजियों की जरूरत होती है, ऐसे वे हैं नहीं। वे किसी सत्ता के गुलाम नहीं होते। उनकी अपनी ही सत्ता होती है, जिसके वे बादशाह होते हैं। उनकी सरकार पांच साल तो क्या कभी नहीं बदलती। जो कुछ लोग वहां कल थे, आज भी वही नजर आएंगे।

‘कुछ लोग’ धरना-प्रदर्शन कर लेते हैं पर कभी-कभी। ऐसा वे इसलिए करते हैं ताकि उन्हें भुला न दिया जाए। हिंसक होते आज तक कभी नहीं देखा मैंने उन्हें। बड़ा ही गांधीवादी किसिम का प्रतिरोध होता है उनका। आपसे असहमत हो जाएंगे और आपको भनक भी न लगेगी।

‘कुछ लोग’ रिश्ते बनाने में यकीन रखते हैं, बजाए तोड़ने के। मैंने तो सुना है, उनके अपने परदादाओं से रिश्ते आज भी यथावत हैं। वे उन्हें शिद्दत से याद करते हैं। कभी-कभी सपने में बुलाकर बातचीत भी कर लेते हैं।

‘कुछ लोग’ सोशल मीडिया पर भी अब खूब नजर आने लगे हैं। जमाना डिजिटल हो रहा है, तो क्या वे न होंगे। कविताएं वे खूब लिखते हैं। यों भी, सोशल मीडिया ने हर आदमी को छोटा-मोटा कवि और व्यंग्यकार तो बना ही दिया है। ऐसे जाने कितने ही कवि तो मुझसे रोज टकराते हैं।

‘कुछ लोग’ निडर होते हैं। किसी से कुछ भी कह डालते हैं। अपने कहे पर उन्हें अफसोस कतई नहीं होता। उनका काम ही दरअसल कहना होता है। वे कुछ न कहेंगे तो उनकी दिन-रात की रोटी हजम न होगी। उन्होंने धरती पर जन्म ही ‘कुछ कहने’ के लिए लिया होता है। अब उनके कहे को आप ‘ताना’ मानो या ‘तारीफ’ यह निर्भर आप पर।

‘कुछ लोग’ बिन बुलाए मेहमान की तरह होते हैं। जो आसानी से जाते नहीं। उनकी, सिर से लेकर पैर तक, चाहे कितनी ही खातिरदारी कर लीजिए पर किसी काम में नुसक न निकालें, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। बात-बात में तुनक जाना उनकी सदियों पुरानी आदत है। शादियों में जो नकचढ़े फूफा होते हैं न, कोई और नहीं, वे यही कुछ लोग ही होते हैं।

अगला जन्म मैं ‘कुछ लोग’ के रूप में ही लेना चाहता हूं। उन्हीं के जैसा होना-बनना चाहता हूं। जब भी कोई बात करे उसमें, बतौर ‘कुछ लोग’, मैं अवश्य शामिल होऊं। इस बहाने ‘कुछ लोग’ होने का ‘सुख’ तो भोग पाऊंगा।

  • चिकोटी से  

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