डूबती नावं और पीके से दूरी

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जी के चक्रवर्ती

देश की एक मात्र सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस एक लम्बे समय से शासन सत्ता से दूर है और देश के कुछ राज्यों से तो कांग्रेस लगभग सिमट चुकी है। यदि हम बात करें तो कांग्रेस पार्टी का प्रभाव रातों रात ही समाप्त नही हुआ है बल्कि कांग्रेस पार्टी के आलाकमान ने जैसे-जैसे ढिलाई बरतना शुरु किया वैसे- वैसे पार्टी सिमटती गयी। जब भारत के 14वें प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार चल रही थी उस दौरान भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड ही ध्वस्त हो गए थे।

किसी समय भारत की शासन सत्ता पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस पार्टी वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ और राजस्थान के सत्ता पर ही काबिज है तो वहीं पर वह झारखण्ड एवं महाराष्ट्र के सरकर में गठबंधन के घटक दल की भूमिका निभा रही है। आज सोनिया गांधी और राहुल गांधी अपने जिन सलाहकार रूपी बैसाखियों के माध्यम से पार्टी का संचालन कर रहे हैं वह निश्चित रूप से अक्षम है। जहां तक मेरी राय में कांग्रेस को प्रदेश स्तर से लेकर ब्लाक स्तर के सभी संगठनों की भूमिका पर भी पुनः नजरें दौड़ाना चाहिये।

अभी हाल ही में सोनिया गांधी और प्रशांत किशोर के मध्य हुई बैठकों की खबरें खूब प्रचारित हुई जिससे ऐसा कहा जाने लगा कि प्रशांत किशोर के माध्यम से कांग्रेस को एक बार पुनः उबारने के प्रयास में सोनिया गांधी जुटी हुई है, तो सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस में अब प्रभावकारी नेतृत्व की कमी हो गई है?

निसंदेह यदि कांग्रेस को पुनर्जीवित करना है तो उसे सर्वप्रथम विपक्ष के भूमिका की जिम्मेदारी गम्भीरता से निभाने की जरूरत है इसके साथ ही उसे जिले, तहसील व ब्लाक स्तर के सभी स्थानीय मुद्दों को जोर शोर से उठाना पड़ेगा।

बाहर छन कर आयी खबरों के अनुसार पीके के द्वारा लोकसभा की 543 सीटों के स्थान पर 350 सीटों के आसपास अपना लक्ष्य निर्धारित करने की बात की जा रही है। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी की प्रमुख्य समस्या यह है की उसके गले मे परिवार वाद का तगमा तो लगा हुआ है एसे ऐसे में पार्टी के अंदर इसका अहसास तनिक मात्र भी नही होना चाहिये क्योंकि बार-बार ऐसा आभास किया गया है कि जब-जब पार्टी कार्यकर्ताओं को अपना भविष्य खतरे मे दिखाई देने लगता है तो वह पूरी तरह अर्थात सम्पूर्ण समर्पित भावना से पार्टी के साथ नही जुड़ पाती है और यही कारण है कि पार्टी में कभी भी एकता कायम नही हो पाती है इस कमी के द्वारा अक्सर ऐसा देखने मे आया है कि जब जब राहुल गांधी पर सोशल मीडिया के माध्यम से तीखे हमले हुए हैं तब तब कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश और जिले स्तर की आईटी सेल के कार्यकर्ताओं द्वारा इसके विरोध स्वरूप प्रतिकार करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पायी है सवाल उठता है कि आखिरकार ऐसा क्या है कि राहुल गांधी के मामले में उनका आईटी सेल चुप्पी साधे क्यों है?

वैसे यदि पीके कांग्रेस पार्टी में प्रवेश कर भी लेते हैं या कांग्रेस पार्टी से उनका गठबंधन भी हो जाता है तो क्या उनकी टीम कितना प्रबल शक्ति से जोर मार पाएगी यह कहना बहुत कठिन है। वैसे सही अर्थों में कहा जाये तो पीके को कांग्रेस में लाने का अर्थ क्या समझा जाये कि इस समय कांग्रेस में प्रभावशाली नेतृत्व का घोर अभाव है?

अभी पिछले दिनों हुये चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी ने एक दो स्थानों पर यह कहा भी था कि लोग कांग्रेस को ढूंढते रह जाएंगे। आज उनका कथन फलीभूत होते दिखाई देने लगा हैं।

वर्तमान समय में कांग्रेस यदि मात्र दो राज्यों तक सिमट कर रह गई है तो कांग्रेस के नेतृत्व से लेकर आला दर्जे के नेताओं को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कहीं न कहीं उनकी रणनीति में चूक अवश्य हुई है तो वहीं आज युवा वर्ग देश मे परिवर्तन चाहती है और आज के युवा नये भारत के नव निर्माण करने के लिये लालायित दिखती है। आज सत्तर दशकों पुरानी नीतियों पर चलकर नव भारत का निर्माण करना शायद ही संभव हो पाए।

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